Justice Yashwant Verma Resigns: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना अपना इस्तीफा भेजा है। उनके घर पर कथित तौर पर कैश मिलने के विवाद के बाद उनके खिलाफ महाभियोग की तैयारी चल रही थी। उन्होंने 5 अप्रैल, 2025 को शपथ ली थी और अभी उन पर इन-हाउस जांच चल रही है। आरोपों को लेकर उनके खिलाफ संसद में हटाने की प्रक्रिया चल सकती है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई है। समिति की रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।
न्यायाधीश के पद से दिया इस्तीफा
अपने पत्र में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने कहा, “मैं आपके इस गरिमामय पद पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहता, जिन्होंने मुझे यह पत्र लिखने के लिए बाध्य किया,” और यह भी जोड़ा कि गहरे दुख के साथ वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दे रहे हैं। पत्र में लिखा है, “इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है।” इस्तीफे की एक प्रति भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भी भेजी गई है।
संसद उनके खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव
न्यायमूर्ति वर्मा मार्च 14 2025 को कथित तौर पर उनके दिल्ली उच्च न्यायालय के कार्यकाल के दौरान आवंटित सरकारी आवास के परिसर में स्थित एक आउटहाउस में जली हुई नकदी मिलने के बाद से विवादों के केंद्र में रहे हैं। जुलाई 2025 में लोकसभा के 145 और राज्यसभा के 63 सदस्यों के समर्थन से संसद के दोनों सदनों में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाए गए थे। इसके बाद, लोकसभा अध्यक्ष ने जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट,1968 के तहत आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया।
वर्मा की दलीलें नहीं मानी गईं
इस वर्ष की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के इस निर्णय को चुनौती देने वाली न्यायमूर्ति वर्मा की याचिका खारिज कर दी थी। शीर्ष अदालत की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे, ने अपने फैसले में कहा “हम मानते हैं कि याचिकाकर्ता इस मामले में किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं।”
न्यायमूर्ति वर्मा ने जांच समिति के गठन को प्रक्रियात्मक आधार पर चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि दोनों सदनों में एक साथ लाए गए महाभियोग प्रस्तावों के लिए जांच समिति गठित करने से पहले लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के बीच संयुक्त परामर्श आवश्यक था।
सुप्रीम कोर्ट से झटका
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय आंतरिक जांच समिति के निष्कर्षों को भी चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि कथित नकदी पर उनका “गुप्त या सक्रिय नियंत्रण” था। शीर्ष अदालत ने इस चुनौती को भी खारिज करते हुए कहा कि आंतरिक जांच प्रक्रिया “निष्पक्ष और न्यायसंगत” थी और इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती।
आंतरिक जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने उनके खिलाफ हटाने की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की थी, जिसके बाद एक संसदीय जांच समिति का गठन किया गया। बाद में मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनींदर मोहन श्रीवास्तव के सेवानिवृत्त होने के बाद इस समिति की संरचना में हाल ही में बदलाव किया गया।
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