Parliament T-Shirt Controversy: एक बार फिर सदन में राहुल गांधी की टीशर्ट को लेकर सियासी बयानबाजी देखने को मिली। दरअसल केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संसद में टी-शर्ट पहनकर आने पर सवाल उठाए हैं। उनके इस बयान के बाद ड्रेस कोड को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
Parliament T-Shirt Controversy: अखिलेश यादव का जवाब
इस विवाद पर जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से सवाल किया गया तो उन्होंने अलग अंदाज में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कपड़ों को लेकर इस तरह की पाबंदी लगाना सही नहीं है। उनके मुताबिक, “क्या पहनकर संसद जाना चाहिए, यह तय करना जरूरी क्यों है?” उन्होंने यह भी कहा कि टी-शर्ट पर रोक लगाने की बात समझ से परे है। अखिलेश यादव ने किरन रिजिजू को समझदार नेता बताते हुए कहा कि वे अच्छे इंसान हैं, लेकिन ड्रेस कोड लागू करने का अधिकार और जरूरत दोनों पर सवाल उठते हैं।
‘निक्कर’ वाला बयान बना चर्चा का केंद्र
अखिलेश यादव ने अपने बयान में व्यंग्य करते हुए कहा कि क्या अब संसद में निक्कर को ड्रेस कोड बना दिया जाएगा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जो लोग पहले निक्कर पहनते थे, अब खुद पैंट पहन रहे हैं। अगर सभी भाजपा नेता फिर से वही पुराना ड्रेस अपनाते हैं, तो समाजवादी पार्टी भी इसके लिए तैयार है। उनका यह बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तेजी से चर्चा का विषय बन गया है।
राहुल गांधी के समर्थन में सपा
अखिलेश यादव, राहुल गांधी के समर्थन में अक्सर मुखर नजर आते हैं। वह विपक्षी गठबंधन का हिस्सा भी हैं और कई मौकों पर कांग्रेस नेता का खुलकर बचाव करते रहे हैं। हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू में भी उन्होंने कहा था कि समाजवादी विचारधारा के लोग अपने सहयोगियों के साथ मजबूती से खड़े रहते हैं।
रिजिजू की टिप्पणी क्या थी?
किरण रिजिजू ने संसद में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा था कि एक जिम्मेदार पद पर बैठे नेता को सदन की गरिमा के अनुरूप कपड़े पहनने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी को निजी तौर पर लेकर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जब वे नेता प्रतिपक्ष के रूप में बोलते हैं, तो उन्हें नियमों और परंपराओं का पालन करना चाहिए। रिजिजू ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल गांधी पर उनके सलाहकारों का प्रभाव ज्यादा है, जिसकी वजह से वे इस तरह के फैसले लेते हैं।
ड्रेस कोड पर बढ़ती बहस
इस पूरे विवाद ने संसद में ड्रेस कोड को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। कुछ लोग मानते हैं कि सार्वजनिक पदों पर बैठे नेताओं को औपचारिकता बनाए रखनी चाहिए, वहीं दूसरी ओर कई नेता इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला बता रहे हैं। फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक तकरार का हिस्सा बन चुका है और आने वाले समय में इस पर और बयानबाजी देखने को मिल सकती है।


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