राम मंदिर ट्रस्ट की धार्मिक समिति का गठन नया प्रभुत्व स्थापित करने की साजिश : महंत धर्म दास

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अयोध्या, 23 जुलाई (आईएएनएस)। राम मंदिर केस के पूर्व पक्षकार महंत धर्म दास ने हाल ही में गठित धार्मिक समिति को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे अनावश्यक बताया और आरोप लगाया कि यह केवल नया प्रभुत्व स्थापित करने और शोषण का माध्यम बनाने की कोशिश है। जब तक राम जन्मभूमि से जुड़े सभी मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रिया और ट्रस्ट की व्यवस्था मौजूद है, तब तक किसी नई समिति की आवश्यकता नहीं है। महंत धर्म दास ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि राम जन्मभूमि से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका सर्वोपरि है और न्यायालय ने…

अयोध्या, 23 जुलाई (आईएएनएस)। राम मंदिर केस के पूर्व पक्षकार महंत धर्म दास ने हाल ही में गठित धार्मिक समिति को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे अनावश्यक बताया और आरोप लगाया कि यह केवल नया प्रभुत्व स्थापित करने और शोषण का माध्यम बनाने की कोशिश है। जब तक राम जन्मभूमि से जुड़े सभी मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रिया और ट्रस्ट की व्यवस्था मौजूद है, तब तक किसी नई समिति की आवश्यकता नहीं है।

महंत धर्म दास ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि राम जन्मभूमि से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका सर्वोपरि है और न्यायालय ने पहले भी शांति बनाए रखने की बात कही है। ऐसे में नई समिति बनाना उचित नहीं है। यह कोई सामान्य विषय नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा मामला है। इस तरह के फैसले सोच-समझकर होने चाहिए। अयोध्या की परंपरा और महत्व को समझे बिना निर्णय लिए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे कदमों से रामलला की सेवा नहीं होगी, बल्कि भ्रम और विवाद बढ़ेंगे। उन्होंने रामचरितमानस की चौपाई का उल्लेख करते हुए कहा कि जब बुद्धि भ्रमित हो जाती है तो व्यक्ति सही-गलत का अंतर भूल जाता है। इसी तरह के फैसले वर्तमान में लिए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अयोध्या में भगवान राम की पूजा-अर्चना पहले से ही प्रभावित हो रही है और नई समिति केवल बाधाएं उत्पन्न करेगी। यह समिति किसी सकारात्मक उद्देश्य के बजाय नए विवाद खड़े करने का माध्यम बन सकती है।

धार्मिक समिति में अयोध्या के संतों को शामिल किए जाने के दावों पर भी महंत धर्म दास ने सवाल उठाए और कहा कि उन्हें जानकारी नहीं है कि किन संतों को समिति में शामिल किया गया है। यदि किसी एक-दो व्यक्ति ने स्वयं को समिति का सदस्य बता दिया है तो इससे पूरी संत परंपरा का प्रतिनिधित्व नहीं माना जा सकता। महंत ने दावा किया कि इसमें अयोध्या के कोई संत नहीं हैं। जो लोग खुद को संत बताकर समिति में शामिल होने की बात कर रहे हैं, उनसे ही पूछ लीजिए कि उनका प्रतिनिधित्व किस आधार पर है।

महंत धर्म दास ने 1949 में रामलला के प्राकट्य का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय जिन परंपराओं और संतों की भूमिका थी, आज उनकी उपेक्षा की जा रही है। पुरानी परंपराओं और धार्मिक व्यवस्था का सम्मान नहीं किया जा रहा। समिति की वैधता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि वह इस समिति को मान्यता नहीं देते। यह किसने बनाई, किस अधिकार से बनाई, इसका कोई औचित्य नहीं है। पहले जो ट्रस्ट है, वही अपने अस्तित्व और जिम्मेदारियों को ठीक से निभाए।

महंत धर्म दास ने कहा कि नई समिति बनाकर कुछ लोगों को अधिकार देने की कोशिश की जा रही है, जबकि उनके पास ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने इसे एक नया धंधा बताते हुए कहा कि इस तरह की व्यवस्था से केवल भ्रम और विवाद बढ़ेंगे।

उन्होंने धार्मिक समिति को रामलला की सेवा, पूजा-पाठ और उत्सवों की देखरेख के उद्देश्य से गठित किए जाने के सवाल पर कहा कि उन्हें इस पूरी प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी नहीं है, लेकिन इसका कोई विशेष महत्व नहीं है। मौजूदा ट्रस्ट की नीयत पर पहले से सवाल उठते रहे हैं और नई समिति से भी स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। यदि समिति बना भी दी गई है तो पहले उसे अपने कार्य और जिम्मेदारियों को साबित करना चाहिए। राम जन्मभूमि और रामलला की सेवा सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि नई-नई समितियों के गठन के माध्यम से अधिकारों का बंटवारा।

–आईएएनएस

पीएसके/एबीएम

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