सुप्रीम कोर्ट ने आज 5 नवंबर 2026 को बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ-साफ शब्दों में कहा है कि किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में लेने और उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार करने के बीच का अंतर, उस व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार को कम नहीं कर सकता। अदालत के अनुसार, 24 घंटे की समय-सीमा उसी समय से शुरू हो जाती है जब पुलिस किसी व्यक्ति को अपने हिरासत में लेती है। यह फैसला उन लोगों को बड़ी राहत दे सकता है जिन्हें पुलिस पूछताछ के बहाने लंबे समय तक हिरासत में रखती है, और बाद में उनकी औपचारिक गिरफ्तारी का समय कुछ और बता देती है। ऐसे में चलिए समझते है आज कोर्ट रूम में क्या-क्या हुआ?
गिरफ्तारी का समय हिरासत से तय होगा
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में आज एक मामले में सुनवाई हुई, इस दौरान अपने फैसले में, अदालत ने कहा कि पुलिस पूछताछ के लिए किसी व्यक्ति को हिरासत में ले और कई घंटों बाद उसकी गिरफ्तारी दर्ज करे, इस तरीके से 24 घंटे की कानूनी समय-सीमा को बढ़ाया नहीं जा सकता। अगर पुलिस किसी व्यक्ति को अपने हिरासत में लेती है, यानी उसे अपनी मर्जी से कहीं आने-जाने या वहां से चले जाने की आजादी नहीं देती, तो यह उसकी स्वतंत्रता पर रोक लगाने के बराबर है। ऐसी स्थिति में, गिरफ्तारी को आधिकारिक तौर पर दर्ज करने में देरी करने से, उस व्यक्ति की हिरासत की असली समय में कोई बदलाव नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ हाई कोर्ट्स के उस नजरिए पर भी सवाल उठाया, जिन्होंने ‘हिरासत’ (कस्टडी) और ‘गिरफ्तारी’ (अरेस्ट) के बीच फर्क किया था। अदालत ने जोर देकर कहा कि कानून का मकसद व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, न कि कागजी कार्रवाई के जरिए पुलिस को अतिरिक्त समय देना।
संविधान देता है 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने का अधिकार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत, गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। इस समय-सीमा में, व्यक्ति को पुलिस हिरासत से अदालत तक ले जाने में लगने वाला यात्रा का समय शामिल नहीं होता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 में भी इस संबंध में प्रावधान दिए गए हैं। सरल शब्दों में कहें तो, मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस किसी व्यक्ति को तय समय-सीमा से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रख सकती। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने पुलिस की जिम्मेदारी और बढ़ा दी है। अब केवल गिरफ्तारी मेमो (arrest memo) में दर्ज समय पर निर्भर रहना काफी नहीं है; बल्कि, वह वास्तविक समय भी ध्यान में रखा जाएगा जब व्यक्ति को पहली बार पुलिस के नियंत्रण में लिया गया था।


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