नई दिल्ली, 16 सितंबर (आईएएनएस)। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर केंद्र पर निशाना साधा। उन्होंने गृह मंत्री के उस ऐलान पर सवाल उठाया है जिसमें कहा गया था कि 2029 से पहले एनडीए शासित सभी राज्यों में यूसीसी लागू कर दी जाएगी।
अरशद मदनी ने ‘एक्स’ पर लिखा कि गृह मंत्री अमित शाह का यह ऐलान एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है कि देश संविधान से चलेगा या किसी राजनीतिक दल के वैचारिक एजेंडे से?
उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता लागू करना संविधान की सर्वोच्चता और नागरिकों को प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता को समाप्त करने की एक सुनियोजित कोशिश है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन को कायम रखना चाहती है। इसलिए उसने यूसीसी के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख किया है और उम्मीद है कि न्याय मिलेगा।
अरशद मदनी ने बताया कि उत्तराखंड हाईकोर्ट में अब तक छह सुनवाई हो चुकी हैं और जमीयत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहित अन्य वकील अदालत में पेश हो चुके हैं।
अरशद मदनी ने साफ कहा कि हम ऐसा कोई कानून स्वीकार नहीं कर सकते जो शरीयत के खिलाफ हो। मुसलमान हर चीज से समझौता कर सकता है लेकिन अपने धर्म और दीन से हरगिज़ कोई समझौता नहीं कर सकता। यह सवाल मुसलमानों के वजूद का नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों का है। सरकार यूसीसी के माध्यम से मुसलमानों से वे अधिकार छीनना चाहती है, जो देश के संविधान ने उन्हें दिये हैं।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम पारिवारिक कानून मनुष्यों द्वारा बनाए गए कानून नहीं हैं बल्कि कुरआन मजीद और हदीस से लिए गए हैं। जो लोग किसी धार्मिक पर्सनल लॉ के तहत अपने मामलों का संचालन नहीं करना चाहते, उनके लिए देश में पहले से ही वैकल्पिक नागरिक कानून मौजूद हैं। ऐसे में अनिवार्य समान नागरिक संहिता की आवश्यकता क्यों है।
अरशद मदनी ने एक और बड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि संविधान के प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजातियों को इस कानून से छूट दी जा सकती है, तो संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मुसलमानों को प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान क्यों नहीं किया जा सकता? यूसीसी के नाम पर यह भेदभाव क्यों।
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ का नहीं बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान को उसकी मूल भावना के साथ बनाए रखने का है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यही है कि सरकार का अपना कोई धर्म नहीं होता तथा देश के नागरिक अपने धार्मिक मामलों में स्वतंत्र होते हैं। इसलिए ऐसा यूसीसी, जो धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करे, मुसलमानों के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।
सरकार के ‘एक देश, एक कानून’ जैसे नारों पर अरशद मदनी ने कहा कि भारत का कानूनी ढांचा स्वयं विभिन्न राज्यों में अनेक मामलों में अलग-अलग कानूनों की अनुमति देता है। आपराधिक कानूनों में भी राज्य स्तर पर अंतर और विशेष प्रावधान मौजूद रहे हैं, जबकि गोहत्या से संबंधित कानून भी पूरे देश में एक समान नहीं हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद की तो पुरानी मांग रही है कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देकर पूरे देश में उसकी सुरक्षा को यकीनी बनाया जाये।
उन्होंने कहा कि यूसीसी लागू करने का उद्देश्य नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक लगाना और उनके संवैधानिक अधिकारों को सीमित करना है।
–आईएएनएस
वीकेयू/पीएम
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