Bashar Nawaz Poetry: “ज़ख़्म तो भर जाएँगे…” पढ़िए बशर नवाज़ के सदाबहार शेर

Summary :

Bashar Nawaz Poetry: घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं, मैं किसी पत्थर किसी…

तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं

जलते लम्हे रफ़्ता रफ़्ता दिल को भी झुलसाएँगे

घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं

मैं किसी पत्थर किसी दीवार का साया नहीं

वही है रंग मगर बू है कुछ लहू जैसी

ये अब की फ़स्ल में

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया

मिरे दुख से किसी आवाज़ का रिश्ता निकल आया

वही है रंग मगर बू है कुछ लहू जैसी

ये अब की फ़स्ल में खिलते गुलाब कैसे हैं

जाने किन रिश्तों ने मुझ को बाँध रक्खा है कि मैं

मुद्दतों से आँधियों की ज़द में हूँ बिखरा नहीं

कहते कहते कुछ बदल देता है क्यूँ बातों का रुख़

क्यूँ ख़ुद अपने-आप के भी साथ वो सच्चा नहीं

कहते कहते कुछ बदल देता है क्यूँ बातों का रुख़

क्यूँ ख़ुद अपने-आप के भी साथ वो सच्चा नहीं

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

गुज़रते वक़्त की हर मौज ठहर जाएगी

Khushi Srivastava

खुशी श्रीवास्तव मीडिया इंडस्ट्री में करीब 3 साल का अनुभव रखती हैं। वायरल कंटेंट, लाइफस्टाइल, हेल्थ और वास्तु शास्त्र टिप्स पर प्रमुखता से काम किया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज से मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के बाद पहली बार पत्रकारिता के श्रेत्र में कदम रखा। इसके बाद अमर उजाला प्रिंट (प्रयागराज) में इंटर्नशिप की। फिलहाल खुशी, पंजाब केसरी दिल्ली के डिजिटल प्लैटफॉर्म के लिए कंटेंट राइटिंग का काम करती हैं।