Allahabad High Court : ‘धर्म परिवर्तन या शादी से नहीं बदलती जाति’, जस्टिस अनिल कुमार दशम ने क्यों सुनाया ये अहम फैसला

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Allahabad High Court on Caste System: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल कुमार दशम ने एक अहम फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति का धर्म बदलना या दूसरी जाति के व्यक्ति से शादी करना उसका जन्मसिद्ध अधिकार नहीं खत्म करता है। इसका मतलब है कि न तो धर्म बदलने से और न ही दूसरी जाति के व्यक्ति से शादी करने से किसी व्यक्ति की जाति बदल सकती है। कोर्ट ने यह बात SC/ST एक्ट के तहत एक क्रिमिनल अपील खारिज करते हुए कही। अपने फैसले में जस्टिस अनिल कुमार दशम ने अपील करने वाले दिनेश और आठ अन्य लोगों की…

Allahabad High Court on Caste System: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल कुमार दशम ने एक अहम फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति का धर्म बदलना या दूसरी जाति के व्यक्ति से शादी करना उसका जन्मसिद्ध अधिकार नहीं खत्म करता है। इसका मतलब है कि न तो धर्म बदलने से और न ही दूसरी जाति के व्यक्ति से शादी करने से किसी व्यक्ति की जाति बदल सकती है। कोर्ट ने यह बात SC/ST एक्ट के तहत एक क्रिमिनल अपील खारिज करते हुए कही। अपने फैसले में जस्टिस अनिल कुमार दशम ने अपील करने वाले दिनेश और आठ अन्य लोगों की याचिका खारिज कर दी।

Allahabad High Court on marriage: क्या है पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2022 में अलीगढ़ के खैर थाने में दर्ज एक FIR से जुड़ा है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपियों ने एक महिला के साथ मारपीट की, गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया। इस आधार पर IPC की धारा 323, 506, 452, 354 तथा SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत केस दर्ज किया गया। इसके बाद अलीगढ़ के स्पेशल जज (SC/ST एक्ट) ने 27 जुलाई 2022 को आदेश पारित किया, जिसे आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

Allahabad High Court: अपीलकर्ताओं की दलील क्या थी?

आरोपियों का तर्क था कि शिकायतकर्ता मूल रूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली है और SC/ST समुदाय से संबंध रखती है, लेकिन उसने जाट समुदाय के एक व्यक्ति से विवाह कर लिया है। उनका कहना था कि विवाह के बाद महिला की जाति बदल जाती है, इसलिए वह SC/ST श्रेणी में नहीं आती और उस पर SC/ST एक्ट लागू नहीं हो सकता। इसके अलावा आरोपियों ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ दर्ज मामला पहले से चली आ रही रंजिश और ‘जवाबी कार्रवाई’ का हिस्सा है।

सरकार और शिकायतकर्ता का पक्ष

सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि FIR और शिकायत में एक ही दिन की घटना का उल्लेख है, जिसमें आरोपियों द्वारा हमला और जातिसूचक गालियां देने की बात दर्ज है। मेडिकल रिपोर्ट में चोटों की पुष्टि भी हुई है, जो आरोपों को मजबूत करती है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि विवाह के कारण किसी व्यक्ति की जाति स्वतः नहीं बदल जाती, इसलिए SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मामला वैध है।

कोर्टरूम में हाईकोर्ट ने और क्या-क्या कहा?

विवाह से जाति नहीं बदलती

कोर्ट ने साफ कहा कि किसी महिला का दूसरी जाति में विवाह करने से उसकी जन्मजात जाति समाप्त नहीं होती।

धर्म परिवर्तन से भी जाति पर असर नहीं

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म बदल लेने से भी मूल जाति नहीं बदलती, जब तक कि राज्य द्वारा विधिवत रूप से कोई मान्यता न दी जाए।

ट्रायल कोर्ट की प्रक्रिया सही

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायत, गवाहों के बयान और मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर सही प्रक्रिया अपनाई है। इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

क्रॉस-FIR से शिकायत रद्द नहीं होती

दोनों पक्षों की ओर से दर्ज क्रॉस FIR को शिकायत खारिज करने का आधार नहीं माना जा सकता। अंततः हाईकोर्ट ने आरोपियों की आपराधिक अपील खारिज कर दी और उनके तर्कों को कानूनी रूप से अस्थिर बताया।

Allahabad High Court on Caste System: फैसले का महत्व

यह निर्णय सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने दोबारा स्पष्ट किया कि जाति जन्म आधारित पहचान है, जिसे विवाह या धर्म परिवर्तन से बदला नहीं जा सकता। इस फैसले से SC/ST एक्ट के तहत शिकायतकर्ता की पहचान और अधिकारों की वैधता पुनः स्थापित होती है।

Allahabad High Court के प्रमुख हालिया फैसले (फरवरी 2026):

  1. जाति प्रमाण पत्र और धर्म परिवर्तन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति धर्म बदल सकता है, लेकिन जाति जन्म से ही तय होती है, जो विवाह या धर्मांतरण से नहीं बदलती।
  2. पत्नी का भरण-पोषण: यदि पत्नी या उसके परिवार की हरकतों के कारण पति आजीविका कमाने में असमर्थ हो जाता है, तो पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं है।
  3. नाबालिग की आयु निर्धारण: जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत, आयु निर्धारण में स्कूल प्रमाण पत्र को प्राथमिकता मिलनी चाहिए; अस्थि-परीक्षण (Ossification test) सटीक नहीं है।
  4. धार्मिक स्वतंत्रता: अपने निजी परिसर में धार्मिक प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए प्रशासन की अनुमति आवश्यक नहीं है, यह एक अधिकार है।
  5. संभल हिंसा मामला: हाई कोर्ट ने संभल की CJM कोर्ट द्वारा पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।

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Shivangi Shandilya

शिवांगी शांडिल्य पत्रकारिता में पिछले 2 वर्षों से सक्रिय हैं। राजनीति, विदेश, क्राइम के अलावा आद्यात्मिक खबरें लिखना पसंद हैं। गलगोटिया विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई पूरी की है। IGNOU से मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई जारी है। इस दौर में वेबसाइट पर लिखने का कार्य जारी है। पत्रकारिता की शुरुआत इंडिया न्यूज़ (इनखबर) से हुई, जहां बत्तौर हिन्दी सब-एडिटर के रूप में वेबसाइट पर काम किया। वर्तमान में पंजाब केसरी दिल्ली में हिन्दी सब-एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में जन्म लेने वाली शिवांगी की शिक्षा उनके गृह जिले में ही हुई है। शिवांगी को राजनीतिक घटनाक्रम पर आलेख लिखना बेहद पसंद है।