Dr. Rajbhushan Choudhary: चुनौती एल नीनो की, संकल्प जल संचय का: मंत्री डॉ. राजभूषण चौधरी

Summary :

Dr. Rajbhushan Choudhary: आधुनिक युग में पृथ्वी का पर्यावरण एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ प्रकृति के संकेत अत्यधिक मुखर हो रहे हैं और ऋतुओं का पारंपरिक चक्र पूरी तरह प्रभावित होता दिख रहा है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपनी दूरदर्शिता से मई माह के अंत में ही स्पष्ट संकेत दिए थे कि इस बार गर्मी बहुत अधिक पड़ने वाली है। उन्होंने संपूर्ण देशवासियों से पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और जल स्रोतों के संरक्षण के प्रति सजग रहने की भावपूर्ण अपील की थी। प्रधानमंत्री जी का यह आह्वान आज के इस अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट में…

Dr. Rajbhushan Choudhary: आधुनिक युग में पृथ्वी का पर्यावरण एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ प्रकृति के संकेत अत्यधिक मुखर हो रहे हैं और ऋतुओं का पारंपरिक चक्र पूरी तरह प्रभावित होता दिख रहा है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपनी दूरदर्शिता से मई माह के अंत में ही स्पष्ट संकेत दिए थे कि इस बार गर्मी बहुत अधिक पड़ने वाली है। उन्होंने संपूर्ण देशवासियों से पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और जल स्रोतों के संरक्षण के प्रति सजग रहने की भावपूर्ण अपील की थी। प्रधानमंत्री जी का यह आह्वान आज के इस अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट में देश को एक सुरक्षित दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक सिद्ध हो रहा है। वर्तमान समय में पृथ्वी का निरंतर बढ़ता तापमान और ऋतु चक्र में आ रहे तीव्र उतार-चढ़ाव इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की दूरस्थ आशंका मात्र रहने के बजाय हमारे आज की सबसे बड़ी प्रशासनिक और सामाजिक चुनौती बन चुका है।

असमय होने वाली भारी वृष्टि, लंबे समय तक खिंचने वाला सूखा और ग्रीष्मकाल का यह उग्र स्वरूप आज संपूर्ण विश्व समुदाय के लिए गहरी चिंता का विषय है। इस वैश्विक वायुमंडलीय उथल-पुथल के ठीक केंद्र में प्रशांत महासागर से उत्पन्न होने वाली एक अत्यंत जटिल जल-मौसम वैज्ञानिक परिघटना है, जिसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में ‘अल नीनो’ (El Niño) के नाम से जाना जाता है। भारत जैसे विशाल, सघन जनसंख्या वाले और मूलतः खेती पर निर्भर देश के लिए अल नीनो का यह चक्र केवल किसी प्रयोगशाला के शोध का विषय भर हो ही नहीं सकता। यह सीधे तौर पर देश के करोड़ों किसान परिवारों के जीवन, उनकी आजीविका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हमारी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ अत्यंत गंभीर और व्यावहारिक प्रश्न है।

अल नीनो के प्रभाव

समुद्र विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में पूरब से पश्चिम की ओर चलने वाली तेज व्यापारिक पवनें गर्म सतही जल को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। इसके प्रभाव से दक्षिण अमेरिका के पेरू तट के पास समुद्र की गहराइयों से पोषक तत्वों से युक्त ठंडा पानी ऊपर की ओर आता है, जो वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को संतुलित रखने में सहायक सिद्ध होता है और हमारे भारतीय मॉनसून को एक सकारात्मक संबल प्रदान करता है। परंतु, अल नीनो के प्रभाव काल में ये व्यापारिक पवनें अचानक शिथिल पड़ जाती हैं और कभी-कभी इनकी दिशा भी पूरी तरह विपरीत हो जाती है।

इसके परिणामस्वरूप, समुद्र का वह गर्म सतही जल पश्चिम की ओर बढ़ने के बजाय वापस दक्षिण अमेरिका के तटीय क्षेत्रों की ओर लौटने लगता है। समुद्र की सतह का यह असामान्य तापन संपूर्ण वायुमंडलीय दबाव के क्षेत्रों को उलट-पुलट कर देता है, जिससे वैश्विक स्तर पर बादलों के बनने और उनके बरसने का पूरा भूगोल ही बदल जाता है। जहाँ पेरू के क्षेत्रों में इसके कारण अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की स्थितियां निर्मित होती हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के क्षेत्रों में हवा का दबाव बढ़ जाता है, जो हमारे मॉनसून की मानसूनी हवाओं की गति को कमजोर कर देता है।

ग्रीष्मकाल में रिकॉर्ड तोड़ती गर्मी

भारत के धरातल पर इसका सीधा असर वर्षा की भारी कमी, खंडित मानसून और ग्रीष्मकाल में रिकॉर्ड तोड़ती गर्मी के रूप में परिलक्षित होता है। यह एक ऐसी वैज्ञानिक विभीषिका है जो देश के संपूर्ण जल विज्ञान चक्र (Hydrological Cycle) और वाटर सर्कुलेशन को असंतुलित करने की पूरी क्षमता रखती है। इसके साथ ही, भूगोलीय स्तर पर पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के बदलते स्वरूप और अल नीनो के इस प्रभाव ने मिलकर देश के सम्मुख एक आसन्न जल संकट और मौसमी विक्षोभ की स्थिति उत्पन्न कर दी है।

प्रधानमंत्री जी ने जल सुरक्षा को हमेशा से राष्ट्र की संप्रभुता और रक्षा सुरक्षा के समान ही सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की है। उनका स्पष्ट मत रहा है कि जल संरक्षण को प्रत्येक नागरिक के दैनिक जीवन का एक स्वाभाविक संस्कार और एक विराट जन आंदोलन बनना होगा। इसी सोच के आधार पर उन्होंने ‘कैच द रेन’ अभियानों की शुरुआत की थी, जिसका मूल मंत्र यही है कि आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके हमें वर्षा के जल की एक-एक बूंद को वहीं सहेजना होगा जहाँ वह धरती पर गिरती है। वर्तमान सरकार ने देश के इतिहास में पहली बार ‘जल शक्ति मंत्रालय’ के रूप में एक एकीकृत और शक्तिशाली प्रशासनिक ढांचे का सृजन किया, जो देश के जल नियोजन (वाटर प्लानिंग) को एक नई, वैज्ञानिक और सुसंगत दिशा देने का एक अत्यंत युगांतकारी प्रयास साबित हुआ है।

वर्तमान समय में कंक्रीटीकरण और अनियोजित दोहन के कारण पृथ्वी का जो जल स्तर लगातार कम होते जा रहा है, उस पर नियंत्रण पाने और जल स्रोतों को दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार ने नीतियों और कार्यक्रमों का एक अत्यंत व्यापक व अंतर-संबंधित ढांचा तैयार किया है। देश में ‘जल जीवन हरियाली मिशन’ के माध्यम से पर्यावरण संतुलन और जल संचयन को एक नया संबल मिला है। ‘जल जीवन मिशन’ के माध्यम से आज देश के प्रत्येक ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों तक ‘हर घर जल’ के संकल्प के साथ शुद्ध, परीक्षित और निरंतर पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।

‘अटल भूजल योजना’

वहीं दूसरी ओर, ‘अटल भूजल योजना’ के अंतर्गत अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देकर भूजल स्तर का वैज्ञानिक प्रबंधन और पुनर्भरण किया जा रहा है। कृषि क्षेत्र की स्थिरता के लिए ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ के तहत ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ के सिद्धांत पर ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का देशव्यापी विस्तार किया जा रहा है ताकि पानी के एक-एक अंश का सर्वोत्तम उपयोग हो सके। इसके साथ ही, जल निकायों के संरक्षण के लिए शुरू किया गया ‘अमृत सरोवर मिशन’ अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रहा है, जिसके तहत देश के प्रत्येक जिले में न्यूनतम ७५ ऐतिहासिक और नए तालाबों का निर्माण व जीर्णोद्धार करके स्थानीय जल स्रोतों को एक नया जीवन प्रदान किया जा रहा है।

इन तमाम राष्ट्रीय पहलों के साथ-साथ सरकार ‘रिवर इंटरलिंकिंग’ (नदियों को आपस में जोड़ने) के साहसिक प्रोजेक्ट्स और समुद्र के खारे पानी को शुद्ध करने की आधुनिक ‘डीसेलिनेशन’ तकनीकों पर भी पूरी गति से काम कर रही है ताकि देश का कोई भी हिस्सा जल संकट से प्रभावित न रहे।

जैविक संतुलन प्रभावित

अत्यधिक उच्च तापमान और तीव्र ग्रीष्म लहरें (Heat Waves) मानव शरीर के आंतरिक जैविक संतुलन को भी पूरी तरह प्रभावित कर देती हैं। हमारा शरीर मूल रूप से जल के एक निश्चित और अनिवार्य अनुपात पर संचालित होता है। जब बाहरी तापमान शरीर के आंतरिक सामान्य तापमान से अधिक होने लगता है, तो शरीर पसीने के माध्यम से स्वयं को ठंडा रखने का प्रयास करता है। इस लगातार चलने वाली स्वेदन प्रक्रिया के कारण शरीर में जल और आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट्स की भारी कमी हो जाती है, जिसे चिकित्सा की भाषा में निर्जलीकरण कहा जाता है।

जब यह स्थिति गंभीर रूप ले लेती है, तो शरीर का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित होने लगता है, जो अंततः हीट स्ट्रोक या लू लगने का कारण बनता है। इस मौसमी विभीषिका का सबसे अधिक असर हमारे समाज के सबसे संवेदनशील हिस्सों जैसे वृद्धों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और विशेषकर उन कर्मठ किसान-मजदूर भाइयों पर पड़ता है जो चिलचिलाती धूप में देश के नवनिर्माण के लिए खुले आसमान के नीचे निरंतर श्रम करते हैं। इस स्थिति में इन सभी वर्गों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। शरीर में तरल पदार्थों की प्रचुरता बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ जल, ओआरएस, नींबू पानी और ताजी छाछ का नियमित सेवन करना सभी के लिए आवश्यक है। दोपहर के समय जब सूर्य की किरणें अत्यंत तीक्ष्ण होती हैं, तब अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से सर्वथा बचना चाहिए।

वृद्धों और बच्चों के कमरों में शीतलता और वेंटिलेशन की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, जबकि खेतों और निर्माण स्थलों पर कार्यरत किसानों और श्रमिकों को सिर को सूती कपड़े से ढककर रखना चाहिए और बीच-बीच में छायादार स्थानों पर विश्राम करते हुए जल ग्रहण करते रहना चाहिए। किसी भी प्रकार की शारीरिक अस्वस्थता जैसे चक्कर आना या तेज सिरदर्द होने पर तुरंत योग्य चिकित्सकीय सहायता प्राप्त करनी अनिवार्य होती है।

प्राच्य जल संरक्षण विधियों को भी स्मरण करना होगा

जब हम आधुनिक विज्ञान के इन गूढ़ सिद्धांतों पर विचार कर रहे हैं, तब हमें अपनी उस प्राचीन भारतीय सभ्यता की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्राच्य जल संरक्षण विधियों को भी स्मरण करना होगा जिसने सदियों पहले ही जल के इस शाश्वत और जीवनदायी महत्व को पूरी तरह पहचान लिया था। हमारे प्राचीन ग्रंथों और वेदों में जल को केवल एक उपभोग्य संसाधन के रूप में कभी स्वीकार किया ही गया, बल्कि इसे साक्षात औषधि माना गया था। राजस्थान में एक विजिट के दौरान वहां की जल-संस्कृति से यह अनुपम सीख देखने को मिलती है कि कैसे भीषण मरुस्थलीय परिस्थितियों में भी वहां के समाज ने अपनी पारंपरिक तरीको के बल पर पानी की एक-एक बूंद को सहेजने का अद्भुत तंत्र विकसित किया।

राजस्थान की कलात्मक और विशाल बावड़ियाँ, कुंड और कुइयाँ इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि विपरीत मौसम में भी समाज अपनी सांस्कृतिक चेतना और सूझबूझ से जल संपन्न बना रह सकता है। इसी प्रकार बुंदेलखंड के चंदेलकालीन तालाब, दक्षिण भारत की एरी प्रणालियाँ और उत्तर भारत व बिहार के मैदानी भागों में सदियों से काम कर रही आहर-पाइन जैसी सिंचाई पद्धतियाँ केवल इंजीनियरिंग के उत्कृष्ट उदाहरण मात्र रहने के बजाय वास्तव में हमारी सामाजिक और सामूहिक चेतना के जीवंत केंद्र थीं। जल का आदर करना, जलाशयों को पूरी तरह पवित्र रखना और उनका सामूहिक रख-रखाव करना हमारे समाज का एक स्वाभाविक और सहज संस्कार था। आज के इस आधुनिक और कंक्रीट प्रधान युग में सबसे बड़ी आवश्यकता हमारी इसी पारंपरिक युक्ति को आधुनिक विज्ञान के उन्नत उपकरणों के साथ पूरी तरह समन्वित करने की है।

जलवायु परिवर्तन और जल संकट की यह विकराल मार केवल मानव समाज की सीमाओं तक ही सीमित रहने वाली है। प्रकृति का यह उग्र स्वरूप हमारे आसपास विचरने वाले उन बेजुबान जीवों के लिए भी उतना ही प्राणघातक साबित हो रहा है जो अपनी प्यास और वेदना को शब्दों में व्यक्त करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। जब हम अपने सुरक्षित और छायादार भवनों में बैठकर इस संकट के वैश्विक आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं, तब हमें अपने आंगनों, छतों और बागीचों की ओर भी देखना होगा जहाँ चहकने वाले पक्षी, गिलहरियां, सड़कों पर घूमने वाला गौवंश और अन्य छोटे-मोटे जीव-जंतु पानी की एक-एक बूंद के लिए व्याकुल दिखाई देते हैं।

हमारी सनातन संस्कृति ने सदैव संपूर्ण चराचर जगत के प्रति अगाध करुणा और सह-अस्तित्व का संदेश दिया है। प्रकृति का संपूर्ण संतुलन इसी अंतःनिर्भरता पर टिका हुआ है। इस भीषण ग्रीष्म ऋतु में अपने घरों की छतों पर, बालकनियों में, खेतों की मेढ़ों पर या अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बाहर एक छोटे से मिट्टी के पात्र में स्वच्छ और शीतल जल रखना हमारा सबसे बड़ा मानवीय और नैतिक दायित्व है। जीव-जंतुओं के प्रति अपनी करुणा को अपने व्यावहारिक आचरण में उतारते हुए यह छोटा सा प्रयास चिलचिलाती धूप में उड़ते हुए किसी प्यासे पक्षी के लिए एक अमूल्य जीवनदान साबित होता है। जब इस प्रकार की संवेदनशीलता समाज के प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक आचरण का हिस्सा बन जाती है, तब वह राष्ट्र केवल आर्थिक रूप से ही समृद्ध होने के बजाय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी विश्व का नेतृत्व करने के योग्य बनता है।

जल संकट की यह गूंज

अखबारों के पुराने पन्नों से लेकर आज की समसामयिक पत्रकारिता के लेखों तक, जल संकट की यह गूंज हमें निरंतर सचेत कर रही है। जलवायु परिवर्तन के इस अभूतपूर्व दौर में जल का संरक्षण और उसका विवेकपूर्ण संवर्धन केवल पर्यावरणविदों की गोष्ठियों की अमूर्त चर्चा का विषय रहने वाला विमर्श है। यह सीधे तौर पर हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा, हमारी कृषि व्यवस्था की आत्मनिर्भरता, हमारे उद्योगों की गतिशीलता और हमारी आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की एकमात्र गारंटी है। विकसित भारत बनने की राह में जल सुरक्षा और जल स्रोतों का संरक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत पहल सिद्ध होगी।

“जल है तो कल है” का यह कालजयी उद्घोष मात्र एक साधारण नारा रहने के बजाय मानव सभ्यता के अस्तित्व का सबसे बड़ा और अटल सत्य है। आज समय का यही तकाजा है कि हम सब मिलकर यह अटूट संकल्प लें कि हम पानी की प्रत्येक बूंद का संपूर्ण आदर करेंगे, इसके अनावश्यक अपव्यय को पूरी तरह रोकेंगे और अपने आसपास के पारंपरिक जल स्रोतों को प्रदूषण मुक्त रखकर उन्हें पुनर्जीवित करेंगे। बेजुबान जीव-जंतुओं के प्रति अपनी करुणा को अपने व्यवहार में उतारते हुए प्रकृति के साथ एक संतुलित, मर्यादित और आत्मीय संबंध स्थापित करना आज के समय की सबसे बड़ी पुकार है।

आज सामूहिक रूप से लिया गया हमारा यह छोटा सा संकल्प ही आने वाले समय में एक अत्यंत सशक्त, समृद्ध, आत्मनिर्भर, सुरक्षित और जल-सुरक्षित भारत के रूप में ‘विकसित भारत’ की सबसे सुदृढ़ नींव रखने में पूरी तरह सफल सिद्ध होगा।

 

Himanshu Negi

हिमांशू नेगी को देश-विदेश, बिजनेस, ऑटो, टेक और गैजेट्स से जुड़ी खबरें लिखने का अच्छा अनुभव है। उन्होंने GGSIPU से संबद्ध LLDIMS कॉलेज से बैचलर ऑफ मास कम्युनिकेशन (BJMC) की पढ़ाई की है। इसके बाद HNBGU Central University से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MAJMC) पूरा किया और पत्रकारिता की शुरुआत की। दैनिक जागरण और IJCP Pvt Ltd. में इंटर्नशिप करने के बाद उन्होंने सुदर्शन टीवी चैनल में 9 PM शो के लिए प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया। वर्तमान में वह पंजाब केसरी, दिल्ली में हिंदी सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं।