कैसे मोदी ने पुनर्स्थापित की संविधान की आत्मा

Summary :

भारतीय लोकतंत्र की इस महान यात्रा में संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि इस देश का नैतिक दिशा सूचक और राष्ट्र की आत्मा भी रहा है। संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शी सोच के साथ संविधान की रचना कर निरंकुशता के विरुद्ध एक ढाल, स्वतंत्रता की एक निर्भीक गाथा और सामाजिक न्याय के एक सतत् मार्गदर्शक दस्तावेज की स्थापना की थी लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब इस पवित्र संविधान की हत्या की गई और वो भी किसी विदेशी आक्रांता द्वारा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित एक प्रधानमंत्री ने यह कार्य किया था। सन् 1975 से 1977 के बीच लगा…

भारतीय लोकतंत्र की इस महान यात्रा में संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि इस देश का नैतिक दिशा सूचक और राष्ट्र की आत्मा भी रहा है। संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शी सोच के साथ संविधान की रचना कर निरंकुशता के विरुद्ध एक ढाल, स्वतंत्रता की एक निर्भीक गाथा और सामाजिक न्याय के एक सतत् मार्गदर्शक दस्तावेज की स्थापना की थी लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब इस पवित्र संविधान की हत्या की गई और वो भी किसी विदेशी आक्रांता द्वारा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित एक प्रधानमंत्री ने यह कार्य किया था। सन् 1975 से 1977 के बीच लगा आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय रहा है। जनता की रक्षा का माध्यम होने वाले संविधान को ही इंदिरा गांधी के शासनकाल में नियंत्रण और दमन का हथियार बना दिया गया। नागरिकों के अधिकार छीन लिए गए, मीडिया की आवाज दबा दी गई, विपक्ष के नेताओं को जेल में डाल दिया गया और न्यायपालिका पर इस कदर दबाव डाला गया कि वह सरकार के सामने झुक गई।

इंदिरा गांधी ने 42वें संशोधन के माध्यम से संविधान की मूल आत्मा को ही बदलने का प्रयास किया और सत्ता का केंद्र बिंदु खुद बनकर सभी प्रकार की निगरानी की सभी व्यवस्थाओं को कमजोर कर दिया। वह ऐसा दौर था जब लोकतंत्र की हत्या हो रही थी और तानाशाही संविधान की चादर ओढ़ सत्ता के गलियारों में प्रवेश कर गई थी। यह केवल सत्ता की लोलुपता नहीं थी, बल्कि गणराज्य की मूल विचारधारा के साथ एक गहरा विश्वासघात था। इंदिरा गांधी द्वारा किए गए सत्ता के केंद्रीकरण के परिणामस्वरूप राष्ट्र का अंधकार में धकेला जाना आज भी चेतावनी के रूप में जीवित है कि जब कोई नेता वंशवाद को लोकतंत्र के ऊपर रखता है तो देश किस तरह विनाशकारी राह पर चलने को मजबूर हो सकता है। इंदिरा गांधी के शासनकाल के बाद भी संविधान की मूल भावना का अनादर करने की प्रवृत्ति रुकी नहीं।

राजीव से लेकर सोनिया और राहुल गांधी तक, गांधी परिवार ने बार-बार अपने राजनीतिक हितों के लिए संवैधानिक मर्यादाओं की उपेक्षा की है। राजीव गांधी ने अपनी माता की राह पर चलते हुए सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो फैसले को पलट दिया और अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के लिए न्याय की बलि चढ़ा दी। सोनिया गांधी ने यूपीए सरकार के दौरान निर्वाचित प्रधानमंत्री के ऊपर हावी रहकर संस्थागत अखंडता को कमजोर किया और संवैधानिक मूल्यों को तार-तार कर दिया। राहुल गांधी ने तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अवहेलना करते हुए सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार के पारित अध्यादेश को फाड़ डाला। दरअसल, यह वंशवादी अहंकार का एक प्रदर्शन था, जिसने सरकार की गरिमा को ठेस पहुंचाई और संवैधानिक शासन व्यवस्था का उपहास उड़ाया।

पीढ़ी दर पीढ़ी इस परिवार ने संविधान को एक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि अपनी सत्ता-लालसा की राह में बाधा के रूप में देखा है। आज भी कांग्रेस शासित राज्यों में संवैधानिक मूल्यों का निरादर किया जाता है। कांग्रेस शासन में तुष्टिकरण की राजनीति संवैधानिक सिद्धांतों पर हावी हो जाती है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस के लिए वोट बैंक संविधान से भी ऊपर है। वहीं इसके विपरीत पिछले एक दशक में भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान को केवल एक राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का जीवंत और गतिशील माध्यम माना है। मोदी सरकार ने डॉ. भीमराव अंबेडकर को केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं दी, बल्कि उनकी विरासत को संस्थागत स्वरूप में सहेजा है, जो भाजपा सरकार से पहले किसी सरकार ने नहीं किया। बाबा साहब के जीवन से जुड़े पांच महत्वपूर्ण स्थलों को “पंच तीर्थ” के रूप में विकसित कर सरकार ने संविधान निर्माण और सामाजिक न्याय में उनके योगदान को अमर कर दिया है।

नई दिल्ली में डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र और लंदन में अंबेडकर स्मारक, दोनों ही बाबा साहब की दूरगामी सोच को वैश्विक सम्मान देने वाले प्रतीक हैं। वर्ष 2015 में भाजपा सरकार ने 26 नवंबर को औपचारिक रूप से ‘संविधान दिवस’ घोषित किया, यह कोई प्रतीकात्मक निर्णय नहीं था, बल्कि संविधान की समझ और नागरिक चेतना को जन-आंदोलन बनाने का राष्ट्रीय आह्वान था। आज देशभर के स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी संस्थानों और सामाजिक मंचों पर यह दिवस गंभीर शैक्षिक उद्देश्य के साथ मनाया जाता है। यह निर्णय मोदी सरकार की लोकतांत्रिक शिक्षा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। चाहे अनुच्छेद 370 की समाप्ति से लेकर तीन तलाक का उन्मूलन हो और नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पारित होने तक मोदी सरकार के प्रमुख विधायी सुधार सभी संसदीय प्रक्रिया का पूर्ण पालन करते हुए किए गए हैं।

हर निर्णय में संविधान के प्रति निष्ठा झलकती है, साथ ही न्याय और समानता को सुदृढ़ किया गया है। जहां एक ओर इंदिरा गांधी ने संविधान को अपने वंशवादी सत्ता की महत्वाकांक्षा के अनुरूप मोड़ने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने उसे राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन बनाया है। प्रधानमंत्री मोदी संविधान को बाधा नहीं, बल्कि भारत की प्रगति का मार्गदर्शक मानते हैं। अनुच्छेद 370 को निरस्त करना मात्र एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक संवैधानिक सुधार था। इसने जम्मू-कश्मीर को दशकों से चली आ रही कानूनी अस्थिरता से मुक्त किया। स्वतंत्रता के बाद पहली बार, “एक राष्ट्र, एक संविधान” की भावना को साकार करते हुए वहां के नागरिकों को पूरे संविधानिक अधिकार और सुविधाएं प्राप्त हुईं। मोदी युग में ऐसे कई बड़े संरचनात्मक सुधार हुए हैं जिनमें संवैधानिक मूल्यों की सुदृढ़ता की गूंज स्पष्ट सुनाई देती है।

डिजिटल इंडिया, जन-धन-आधार-मोबाइल की ट्रिनिटी और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी पहलों के चलते शासन प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। इन सुधारों ने शासन को जनता के लिए आसान एवं सुलभ बनाया, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया और अंत्योदय के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए अंतिम पंक्ति के नागरिक को गरिमा प्रदान की और साथ ही समानता और भेदभाव-रहित व्यवस्था के संवैधानिक संकल्प को साकार किया। अक्सर कई आलोचक अक्सर मोदी सरकार को “अत्यधिक सशक्त” कहकर उसकी निर्णायक नेतृत्व क्षमता की तुलना तानाशाही से कर देते हैं लेकिन यह लोकतांत्रिक ताकत की मूल भावना की पूर्णतयाः गलत समझ है। एक सशक्त नेतृत्व, यदि वह संवैधानिक नैतिकता में रचा-बसा हो तो वह वर्षों से प्रतीक्षित न्याय और समानता को साकार कर सकता है।

चाहे तीन तलाक जैसी लैंगिक सुधार की पहल हो या विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व जैसा लंबे समय से उपेक्षित मुद्दा हो, मोदी सरकार ने अपने विधायी जनादेश का प्रयोग सत्ता की जड़ें मजबूत करने के लिए बल्कि जनता और लोकतंत्र के सशक्तिकरण के लिए किया है। इसके साथ ही संविधान के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने और नागरिक सहभागिता को मजबूत करने के सरकार के निरंतर प्रयास इसे पूर्ववर्ती सरकारों से अलग बनाते हैं। जहां पहले की सरकारें संविधान को मात्र एक औपचारिक दस्तावेज की तरह प्रस्तुत करती थीं, वहीं मोदी सरकार संवैधानिक संस्कृति को सजीव और सक्रिय रूप में स्थापित कर रही है। मोदी सरकार की विरासत यही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने संवैधानिक नैतिकता को केवल अदालतों और पाठशालाओं तक सीमित न रखते हुए शासन के प्रत्येक कार्य में जीवंत किया है।

लंबित न्यायिक मामले, चुनावी सुधार और नौकरशाही में बदलाव जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं लेकिन दिशा स्पष्ट है और इनके समाधान के रास्ते पूरी तरह संविधान में निहित हैं। इतिहास इंदिरा गांधी को संविधान की आवाज दबाने के लिए याद रखेगा और नरेंद्र मोदी को उसे और बुलंद करने के लिए। इंदिरा गांधी ने संविधान को अपने रास्ते की बाधा माना, जबकि नरेंद्र मोदी ने उसे राष्ट्र की संभावनाओं को दिशा देने वाला माध्यम समझा। आखिरकार, भारत की गाथा दरअसल उसके संविधान की ही गाथा है और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह गाथा अब भय या पक्षपात से नहीं, बल्कि स्पष्टता, दृढ़ विश्वास और संवैधानिक साहस के साथ दोबारा लिखी जा रही है।

Team Desk