मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के 23वें सम्मेलन में पेश की जाने वाली राजनीतिक संगठनात्मक रिपोर्ट में कहा गया है कि देशभर में पार्टी लगातार कमजोर हुई है और 1964 में स्थापना के बाद से यह सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है।
सबरीमाला केस पर न्यायलय के साथ खड़े होने पर पारंपरिक मतदाता की नाराजगी झेलनी पड़ी
इस रिपोर्ट को शुक्रवार को होने वाले सम्मेलन में पेश किया जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया कि केरल एक अपवाद है और पार्टी तथा वाम मोर्चे को भाजपा-आरएसएस के विरुद्ध लड़ना होगा। लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान पार्टी को हुए नुकसान के विश्लेषण पर माकपा की राजनीतिक संगठनात्मक रिपोर्ट में कहा गया कि सबरीमला के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय के साथ खड़े होने के कारण एलडीएफ सरकार को पारंपरिक मतदाताओं के एक वर्ग की नाराजगी झेलनी पड़ी।
अपनी स्थापना के बाद से ही वामपंथी पार्टीया लगातार अपना प्रसार कर रही थी । लेकिन उत्तर भारत में कम्युनिस्ट अपने पैर नही ्जमा सके । लेकिन इस रिपोर्ट के अनुसार वामपंथी दल अपनी नाराजगी जरूर जाहिर करेंगे । क्योंकि एक समय कम्युनिस्टो के समर्थन के बिना केंद्र में सरकार बनाना संभव नही था । आज की दलगत राजनीति में राष्ट्रवाद हावी हो गया हैं । जो माओवाद व कम्युनिस्टों को बिल्कुल भी पसंद नही हैं। यही कारण हैं कि इस रिपोर्ट में केरल को छोड़कर अपने स्थापना के बाद वर्तमान काल को सबसे चुनौती पूर्ण माना जा रहा हैं
बंगाल व त्रिपुरा से भी वामपंथ का आधार खारिज
पूर्वा भारत में बंगाल कम्युनिस्टों का गढ कहा जाता था । लेकिन आज बंगाल व त्रिपुरा में वामपंथ अपनी आखिरी सांस गिन रहा हैं । पिछले वर्ष चुनाव में कभी बंगाल में 32 साल तक सत्ता का संचालन करने वाले वामपंथ अपनी विधानसभा में एक सीट भी जीत नही पाया ।


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