इस समय देश के कोने-कोने में सीएए, एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन चल रहा है तो दूसरी तरफ कुछ लोग इसके समर्थन में भी प्रदर्शन कर रहे हैं। नए कानून के खिलाफ सबसे लंबा और महिलाओं की बड़ी तादाद वाला प्रदर्शन अभी भी यहां के शाहीनबाग में देखा जा रहा है, जो राष्ट्रीय राजधानी में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
क्या सिर्फ विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग ही शाहीनबाग पहुंचते हैं? आइए, इस सवाल का जवाब तलाशा जाए। शाहीनबाग में विरोध प्रदर्शन को करीबन 2 महीने हो गए और यहां हजारों की तादाद में लोग आ रहे हैं, लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो न कानून के विरोध में हैं और न ही पक्ष में, लेकिन शाहीनबाग को देखने जरूर आ रहे हैं।
उनका कहना है कि ये एक नया आंदोलन बन चुका है, जिसकी गूंज पूरे देश में है और यहां जिस तरह प्रदर्शन किया जा रहा है, इससे लोगों के मन मे एक उत्सुकता है। जिस तरह यहां की दीवारों पर कलाकारी देखने को मिल रही है, पोस्टरों के जरिये लोग अपनी भावनाओं को सामने रख रहे हैं, ये खुद में एक बहुत बड़ा आंदोलन है।
कुछ लोग तो यहां देश की एकता की मिसाल देखने आते हैं। यहां सभी धर्मो के लोग बैठे हैं, और यह उनके मन में अच्छी भावना पैदा करता है।
एक डिजिटल कंपनी में काम करने वाली एकता का कहना है, ‘यहां आकर मैंने देखा कि छोटे-छोटे बच्चे हाथ में भारत का झंडा लिए हुए हैं और कुछ झंडा बना भी रहे हैं। मैंने जब उनसे पूछा कि कब तक यहां आते रहोगे और ये सब करोगे? तब बच्चों ने कहा कि उन्हें नहीं पता, वे तो मम्मी के साथ यहां आते हैं और कुछ घंटे रहकर चले जाते हैं।’
एकता ने कहा, ‘मैंने एक चीज अपनी जिंदगी में नोटिस किया है कि हम छोटी-छोटी बातों को लेकर शिकायत करते हैं कि तनखा इतनी कम है, कपड़े अच्छे नहीं हैं और आप इन बच्चों से मिलिए, आपको पता लगेगा कि इनकी कोई शिकायत नहीं, इनकी आंखों में एक चमक देखने को मिलेगी। इनको नहीं पता कि जूते किस कंपनी के पहने हैं, इनको यहां रखी हुईं किताबों से भी कोई मतलब नहीं है। जो पढ़ना चाहते हैं, वे पढ़कर फिर वहीं रख देते हैं।’
उन्होंने कहा,’एक बच्ची कागज पर पेंसिल से एक तस्वीर बना रही थी। मैंने पूछा, क्या बना रही हो तो उसने कहा कि भीमराव आंबेडकर की तस्वीर बना रही हूं। आप नाक बना दोगे, तो मैंने कहा, मुझसे नहीं होगा।’


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