क्वेटा, 27 जनवरी (आईएएनएस)। एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन ने मंगलवार को बताया कि बलूचिस्तान प्रांत में पाकिस्तानी सेना ने कम से कम तीन और बलूच नागरिकों को जबरन गायब कर दिया है।
ये ताजा घटनाएं प्रांतभर में जबरन गायब करने और गैर-न्यायिक हत्याओं की बढ़ती लहर के बीच हुई हैं।
इन घटनाओं की निंदा करते हुए बलूच नेशनल मूवमेंट के मानवाधिकार विभाग, पांक ने बताया कि प्रांत के सुराब जिले के 40 वर्षीय शिक्षक अली अहमद रेकी को 24 जनवरी को प्रांतीय राजधानी क्वेटा के गंज चौक इलाके से पाकिस्तान के काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट (सीटीडी) के कर्मियों ने अगवा कर लिया था। तब से उनका कोई पता नहीं चला है।
अधिकार संगठन ने आगे कहा कि सुराब के 25 वर्षीय डॉक्टर शाहजैन अहमद को भी उसी दिन और उसी जगह से सीटीडी ने अगवा कर लिया था।
बलूचिस्तान में नागरिकों के खिलाफ अत्याचारों को उजागर करते हुए पांक ने सुराब के 22 वर्षीय छात्र जुनैद अहमद के गायब होने की घटना को भी सामने लाया। उन्हें 23 जनवरी को क्वेटा के चिल्ड्रन हॉस्पिटल, क्वारी रोड से सीटीडी ने किडनैप कर लिया था।
बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (बीएसओ), आजाद ने सोमवार को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं को पत्र लिखकर बलूचिस्तान में नागरिकों के खिलाफ हो रहे गंभीर और लगातार मानवाधिकार उल्लंघनों की ओर ध्यान दिलाया, जो बलूच नरसंहार दिवस के मौके पर किया गया।
छात्र संगठन के अनुसार, 25 जनवरी को मनाए जाने वाले बलूच नरसंहार दिवस पर उन हजारों बलूच पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को याद किया जाता है, जिन्होंने बलूचिस्तान में पाकिस्तान के ‘औपनिवेशिक शासन’ के तहत कई दशकों तक व्यवस्थित उत्पीड़न, जबरन गायब होने, गैर-न्यायिक हत्याओं और सामूहिक सजा का सामना किया है।
पत्र में विस्तार से बताया गया है, “मानवाधिकार रक्षकों, स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और पीड़ितों के परिवारों की कई रिपोर्टें गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के लगातार और स्थायी पैटर्न को दस्तावेज करती हैं। इनमें जबरन गायब करना शामिल है, जिसमें लंबे और अनिश्चित समय के लिए बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में रखा जाता है। गैर-न्यायिक ‘मारो और फेंको’ प्रथाएं जिनमें महीनों या सालों तक गायब रहने के बाद क्षत-विक्षत शव बरामद होते हैं। हिरासत में यातना और अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार और छात्रों, पत्रकारों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों को निशाना बनाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन।
इसमें आगे कहा गया है, “महिलाएं और बच्चे खास तौर पर प्रभावित हुए हैं। जबरन गायब किए गए लोगों के परिवार सालों से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, और अक्सर उन्हें डराने-धमकाने, परेशान करने और बदले की कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। शिक्षा संस्थान और रोजगार बाधित हुए हैं, जिससे बलूच आबादी का बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर जाना बढ़ा है। बार-बार अपील के बावजूद, स्वतंत्र, निष्पक्ष जांच और प्रभावी जवाबदेही तंत्र की लगातार कमी बनी हुई है।”
बीएसओ ने वैश्विक मानवाधिकार संगठनों से बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच का समर्थन करने और संयुक्त राष्ट्र सहित संबंधित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन चिंताओं को उठाने का आग्रह किया।
–आईएएनएस
डीकेपी/
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