बीजिंग, 29 मार्च (आईएएनएस)। चीन की राजधानी पेइचिंग में शनिवार को भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित डांस-ड्रामा ‘आदि काव्य’ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि कहानियां सीमाओं में नहीं बंधतीं। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’, जिसे दुनिया की सबसे प्राचीन और प्रभावशाली महाकाव्यों में गिना जाता है, को इस मंचन में एक नए अंदाज में प्रस्तुत किया गया। खास बात यह रही कि इस पूरी प्रस्तुति में सभी कलाकार चीनी नागरिक थे, और संवाद भी पूरी तरह चीनी भाषा में थे।
करीब दो घंटे की यह प्रस्तुति दर्शकों को गहरी भावनाओं की यात्रा पर ले गई। राम के वनवास की पीड़ा, उनके धैर्य, सीता की दृढ़ता, हनुमान की भक्ति और राम की अयोध्या वापसी की खुशी… हर भाव को नृत्य, संगीत और अभिव्यक्ति के जरिए इतने सुंदर ढंग से दिखाया गया कि भाषा की कोई दीवार महसूस ही नहीं हुई। सच कहें तो यह वही पुराना सत्य फिर सामने आया कि कला की अपनी एक अलग भाषा होती है, जिसे हर कोई समझ सकता है।
चीन में भारत के राजदूत प्रदीप कुमार रावत ने अपने संबोधन में कहा कि ‘रामायण’ दुनिया के सबसे पुराने महाकाव्यों में से एक है। संस्कृत में इसे ‘आदि काव्य’ यानी पहली कविता कहा जाता है। उन्होंने बताया कि यह 2 हजार साल से भी ज्यादा पुरानी रचना आज भी लोगों को कर्तव्य, करुणा और साहस जैसे मूल्यों की सीख देती है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘रामायण’ का असर चीन तक भी देखा जा सकता है, जैसे ‘मंकी किंग’ यानी सुन वुखोंग की कहानियों में।
इस डांस-ड्रामा का नेतृत्व किया सुप्रसिद्ध चीनी नृत्यकार, भरतनाट्यम नृत्यांगना चिन शानशान ने। उन्होंने न केवल इस प्रोजेक्ट को दिशा दी, बल्कि करीब 70 कलाकारों की टीम को तैयार भी किया। इन कलाकारों की उम्र, पेशा और पृष्ठभूमि अलग-अलग थी, लेकिन मंच पर सब एक ही धारा में बहते नजर आए। यह अपने आप में एक मिसाल है कि जब जुनून हो, तो सांस्कृतिक दूरी भी छोटी लगने लगती है। उनका यह जुनून प्रस्तुति में साफ दिखाई भी दिया। खासकर राम-सीता के वनवास का दृश्य इतना भावुक था कि दर्शक उससे जुड़ गए। कार्यक्रम के दौरान कई बार तालियों की गूंज सुनाई दी।
चिन शानशान ने सीजीटीएन हिंदी को बताया कि इस प्रस्तुति को तैयार करने में लगभग चार महीने का समय लगा। रोजाना कड़ी प्रैक्टिस, नए हाव-भाव सीखना, भारतीय शास्त्रीय नृत्य की बारीकियों को समझना… यह सब आसान नहीं था। खासकर तब, जब कलाकारों के लिए यह परंपरा पूरी तरह नई हो। लेकिन, मेहनत रंग लाई। मंच पर उनकी पकड़ और आत्मविश्वास साफ दिख रहा था।
यहां एक दिलचस्प पहलू और भी है। इस प्रस्तुति की नींव जिस स्रोत पर टिकी थी, वह थी चीनी भाषा में ‘रामायण’ का अनुवाद। यह अनुवाद किया था दिवंगत चीनी प्रोफेसर ची श्येनलिन ने, जो चीन के एक बेहद सम्मानित विद्वान थे। अगर आज चीन में रामायण घर-घर तक पहुंची है, तो उसका श्रेय प्रो. ची को ही जाता है। उन्होंने ‘रामायण’ को सिर्फ एक ग्रंथ की तरह नहीं देखा, बल्कि उसे एक सांस्कृतिक पुल के रूप में प्रस्तुत किया।
प्रो. ची श्येनलिन (1911–2009) का नाम भारत-चीन सांस्कृतिक संबंधों के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। वे भाषाविद्, इतिहासकार और भारतविद् थे, जिन्होंने प्राचीन भारतीय भाषाओं और बौद्ध धर्म पर गहन अध्ययन किया। उनका ‘रामायण’ अनुवाद केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं था, बल्कि उसमें भारतीय संस्कृति की आत्मा को भी संजोया गया था। यही वजह है कि उनकी कृति आज भी चीन में भारतीय साहित्य को समझने का एक प्रमुख माध्यम बनी हुई है। उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें साल 2008 में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया।
‘आदि काव्य’ केवल एक डांस-ड्रामा प्रस्तुति नहीं थी। यह एक ऐसा सांस्कृतिक अनुभव बन गई, जिसने यह सिखाया कि कहानियां, भावनाएं और मानवीय मूल्य किसी भी सीमा से परे होते हैं। यह हमें याद दिलाती है कि भारत और चीन केवल पड़ोसी देश नहीं, बल्कि दो प्राचीन सभ्यताओं के वाहक हैं, जिनकी जड़ें कहीं न कहीं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
‘आदि काव्य’ का यह दूसरा सफल संस्करण इस बात का प्रमाण है कि लोग सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ना चाहते हैं। यह सफल प्रस्तुति बताती है कि जब कला के जरिए रिश्ते बनते हैं, तो वे सीधे दिल तक पहुंचते हैं।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
–आईएएनएस
एबीएम/
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