पूर्व अमेरिकी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट की चेतावनी, ‘रणनीतिक विफलता’ की ओर बढ़ रहा है अमेरिका

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वाशिंगटन, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। वाशिंगटन की हालिया सैन्य सफलता भविष्य में बड़ी रणनीतिक समस्या बन सकती है। अमेरिका के पूर्व सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि अभी संयम बरतने और बातचीत का रास्ता अपनाने की जरूरत है, क्योंकि फिलहाल एक नाजुक युद्धविराम बना हुआ है। सीएनएन के कार्यक्रम में फरीद जकारिया को दिए इंटरव्यू में ब्लिंकन ने कहा कि हाल की घटनाएं “तुरंत की जीत, लेकिन लंबे समय की हार” साबित हो सकती हैं। उनका कहना है कि सैन्य दबाव के बावजूद ईरान की कई अहम क्षमताएं अभी भी बची हुई हैं। उन्होंने कहा, “मान लीजिए अभी…

वाशिंगटन, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। वाशिंगटन की हालिया सैन्य सफलता भविष्य में बड़ी रणनीतिक समस्या बन सकती है। अमेरिका के पूर्व सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि अभी संयम बरतने और बातचीत का रास्ता अपनाने की जरूरत है, क्योंकि फिलहाल एक नाजुक युद्धविराम बना हुआ है।

सीएनएन के कार्यक्रम में फरीद जकारिया को दिए इंटरव्यू में ब्लिंकन ने कहा कि हाल की घटनाएं “तुरंत की जीत, लेकिन लंबे समय की हार” साबित हो सकती हैं। उनका कहना है कि सैन्य दबाव के बावजूद ईरान की कई अहम क्षमताएं अभी भी बची हुई हैं।

उन्होंने कहा, “मान लीजिए अभी कुछ सफलता मिली है, लेकिन आखिर में हमारे पास क्या बचेगा?” उन्होंने बताया कि ईरान के पास अब भी “उच्च स्तर का समृद्ध यूरेनियम, सेंट्रीफ्यूज और मिसाइलें” मौजूद हैं।

ब्लिंकन के अनुसार, तेहरान के पास अब एक बड़ा नया फायदा भी है- होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण। उन्होंने इसे ऐसा मोड़ बताया, जिससे ईरान की ताकत और बढ़ सकती है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे की बातचीत के बाद भी कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। फिलहाल सिर्फ एक युद्धविराम ही बना हुआ है। ब्लिंकन ने कहा कि अगर बातचीत सफल नहीं होती है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने मुश्किल फैसला होगा, जिसमें या तो संघर्ष बढ़ाना पड़ेगा या समझौता करना होगा।

उन्होंने कहा कि युद्ध दोबारा शुरू करना एक विकल्प तो है, लेकिन यह “बहुत जोखिम भरा और बहुत महंगा” साबित हो सकता है। उन्होंने सरकार से अपील की कि आगे सैन्य कार्रवाई से बचा जाए। उन्होंने कहा, “फिर से लड़ाई शुरू मत कीजिए… दूसरे तरीकों से दबाव बनाए रखें… और समझौते तक पहुंचने के लिए जितना समय लगे, बातचीत जारी रखें।”

ब्लिंकन ने साफ कहा कि किसी भी समझौते में दोनों पक्षों को कुछ न कुछ छोड़ना होगा। “समझौता हमेशा समझौते से ही बनता है। आपको तय करना होगा कि आप कहां तक झुक सकते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और पहुंच बातचीत का अहम मुद्दा होना चाहिए।

2015 के परमाणु समझौते के अपने अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ईरान के साथ समझौता करना आसान नहीं होता और इसमें काफी समय लगता है। उन्होंने बताया कि ईरान ने अपने पूरे इतिहास में सिर्फ दो बार बड़े समझौते किए हैं- पहला, ईरान-इराक युद्ध का अंत और दूसरा है परमाणु समझौता।

ब्लिंकन ने कहा कि ईरान के अंदर भी अलग-अलग विचारधाराएं हैं। इसे एक जैसा सोचने वाला देश मानना गलती होगी। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि ईरान के बातचीत करने वाले लोग बेहद कुशल होते हैं। उन्होंने कहा, “ये बहुत अनुभवी और मजबूत वार्ताकार हैं, जिनसे निपटना आसान नहीं होता।” कई बार तो बातचीत समझौते के करीब पहुंचने के बाद भी लंबी खिंच जाती है।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) पर कुछ समझौते की गुंजाइश हो सकती है। जैसे ईरान को बहुत कम स्तर पर और सीमित मात्रा में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी जा सकती है, ताकि उसकी प्रतिष्ठा भी बनी रहे और औपचारिक अधिकार भी न दिया जाए।

ब्लिंकन ने जो बाइडेन सरकार के उस प्रयास का भी जिक्र किया, जिसमें अमेरिका ने परमाणु समझौते को फिर से शुरू करने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा कि बातचीत इसलिए अटक गई क्योंकि ईरान चाहता था कि भविष्य में कोई भी अमेरिकी सरकार इस समझौते से बाहर न निकले।

उन्होंने कहा कि अमेरिका की राजनीति में ऐसा भरोसा देना बेहद मुश्किल है। इसके अलावा, ईरान के बढ़ते परमाणु कार्यक्रम और दोनों देशों की घरेलू राजनीति ने भी बातचीत को और जटिल बना दिया।

ब्लिंकन ने कहा कि कूटनीति ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है। उन्होंने कहा, “आपको रणनीतिक धैर्य रखना होगा… इतिहास गवाह है कि ऐसा किया जा सकता है।”

–आईएएनएस

एएस/

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