यूएन सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग तेज, भारत ने कहा- 1945 के ढांचे पर नहीं चल सकती आज की दुनिया

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संयुक्त राष्ट्र, 27 मई (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी), जो 1945 की दुनिया में अटकी हुई है, अपनी विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रही है। भारत ने कहा है कि ‘जमे हुए हित’ सुधारों को रोक रहे हैं, जबकि ये सुधार आज की चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी हैं। भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने मंगलवार को कहा, “अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) में सुरक्षा परिषद सुधारों पर कोई प्रगति न होना इस बात का संकेत है कि कई सदस्य देश यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं और आठ दशक पुराने यूएनएससी ढांचे को बदलना नहीं चाहते।” सुधारों को…

संयुक्त राष्ट्र, 27 मई (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी), जो 1945 की दुनिया में अटकी हुई है, अपनी विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रही है। भारत ने कहा है कि ‘जमे हुए हित’ सुधारों को रोक रहे हैं, जबकि ये सुधार आज की चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी हैं।

भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने मंगलवार को कहा, “अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) में सुरक्षा परिषद सुधारों पर कोई प्रगति न होना इस बात का संकेत है कि कई सदस्य देश यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं और आठ दशक पुराने यूएनएससी ढांचे को बदलना नहीं चाहते।”

सुधारों को मुख्य रूप से कुछ देशों का एक छोटा समूह रोकता है, जिसे ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (यूएफसी) कहा जाता है। इसका नेतृत्व इटली करता है और इसमें पाकिस्तान भी शामिल है। यह समूह प्रक्रिया से जुड़े नियमों का इस्तेमाल करके बातचीत को आगे बढ़ने से रोकता है।

हरीश मंगलवार को ‘संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों को बनाए रखने और यूएन-केंद्रित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने’ पर हुई बहस में बोल रहे थे।

भारत के सुधार प्रस्तावों का मुख्य हिस्सा सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता को बढ़ाना है।

हरीश ने कहा, “हमें स्थायी सदस्यता श्रेणी को बढ़ाना ही होगा, क्योंकि इससे ही इस परिषद के फैसले लेने के तरीके में असली बदलाव आएगा।”

उन्होंने कहा, “अगर बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को नहीं ढाला गया, तो इससे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ताकत, विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता और कम हो जाएगी।”

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी परिषद की विश्वसनीयता के संकट पर ध्यान दिलाया।

उन्होंने कहा क‍ि ऐसी सुरक्षा परिषद जो आज की भू-राजनीतिक हकीकत को नहीं दिखाती, वह अपने दायित्वों को पूरी तरह निभा नहीं सकती। वैश्विक संस्थाओं को आज की वास्तविकताओं को दिखाना चाहिए, न कि 1945 की दुनिया को। और सबसे ज्यादा जरूरत इसी परिषद में है।

अफ्रीका को खास तौर पर स्थायी सदस्यता से बाहर रखे जाने की बात करते हुए गुटेरेस ने कहा, “सुधार का मतलब है इस परिषद की विश्वसनीयता को वापस लाना और इसे और बेहतर तरीके से सक्षम बनाना, ताकि यह चार्टर के अनुसार निर्णायक और समावेशी तरीके से काम कर सके।”

हरीश ने कहा, “आज संयुक्त राष्ट्र की समस्याओं के केंद्र में एक ऐसा ढांचा है जो 1940 के दशक में ही अटका हुआ है। यह ऐसा है जैसे हम 1945 के इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर ‘एनिएक’ पर आज की एडवांस एआई तकनीक चलाने की कोशिश कर रहे हों।”

उन्होंने कहा कि मानवता ने अपनी प्रगति और जीवित रहने में सबसे बड़ा योगदान अपनी अनुकूलन क्षमता से दिया है, और संयुक्त राष्ट्र भी इससे अलग नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा, “संयुक्त राष्ट्र को भी इस बुनियादी विकास सिद्धांत को समझना होगा। इसे लचीला और बदलने योग्य होना चाहिए, ताकि यह चार्टर के उद्देश्यों को सही तरीके से पूरा कर सके।”

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत का पक्ष रखते हुए हरीश ने शांति और सुरक्षा में भारत के योगदानों का भी जिक्र किया, जो यूएन बनने से पहले और उसके शुरुआती दौर से जुड़े हैं।

सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता देश हैं, और उनकी स्थायी सदस्यता का आधार युद्ध में उनकी भूमिका रही है। हरीश ने कहा कि भारत ने भी उसी दौर में बड़ी कुर्बानियां दी थीं, इसलिए भारत का भी वैसा ही दावा बनता है।

उन्होंने बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध में 25 लाख से ज्यादा भारतीय सैनिकों ने मित्र देशों के साथ लड़ाई लड़ी थी और 87,000 से ज्यादा सैनिकों ने अपनी जान दी थी। यही वह समय था जिसने आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र के गठन में भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा क‍ि यह हमारा युद्ध नहीं था, लेकिन हमने इसकी भारी कीमत चुकाई। इसलिए हमारे लिए संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य बनना स्वाभाविक था। उन्होंने आगे कहा कि यह शांति की ओर भारत की इच्छा को दिखाता है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को आगे भी जारी रखा, खासकर शांति स्थापना अभियानों में, जैसे कोरिया, इंडोचाइना, कांगो और गाजा में योगदान।

हरिश ने कहा, “हम एक ऐसे सुरक्षा परिषद में हैं जो स्थायी वीटो शक्ति वाले सदस्यों के स्तर पर बंटी हुई है। यूएन में दक्षता और कामकाज सुधारने की बातें आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई हैं।”

–आईएएनएस

एवाई/एएस

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