बोस्टन, 1 मई (आईएएनएस)। भारत का वैश्विक फार्मास्यूटिकल हब के रूप में उभार अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जो नवाचार, वैक्सीन नेतृत्व और बढ़ती क्लिनिकल क्षमताओं से संचालित है। यह बात ‘नेशनल इंस्टिट्यूट्स ऑफ हेल्थ’ के पूर्व निदेशक और ओपीकेओ हेल्थ के उपाध्यक्ष एलियास जेरहौनी ने कही।
जेरहौनी ने कहा कि भारत–अमेरिका के बीच स्वास्थ्य और बायोटेक्नोलॉजी सहयोग पिछले वर्षों में लगातार मजबूत हुआ है, और अब यह केवल मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित न रहकर नवाचार-आधारित साझेदारी में बदल रहा है।
उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “भारतीय कंपनियों की मौजूदगी तेजी से बढ़ रही है—ल्यूपिन लिमिटेड, सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज और कई अन्य। यह संबंध अब और बेहतर हो रहा है क्योंकि भारत को केवल मैन्युफैक्चरिंग हब नहीं, बल्कि एक इनोवेटिव देश के रूप में भी देखा जा रहा है।”
उन्होंने कहा कि जेनेरिक दवाओं और एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) के क्षेत्र में भारत की पकड़ बेहद मजबूत है और यह वैश्विक दवा आपूर्ति की रीढ़ बना हुआ है। उन्होंने कहा, “एपीआई के क्षेत्र में भारत की ताकत बहुत बड़ी है… ये भारत या चीन से ही आते हैं।”
हालांकि, जेरहौनी ने जोर दिया कि भारत की भूमिका अब जेनेरिक से आगे बढ़ चुकी है। उन्होंने वैक्सीन निर्माण में भारत की क्षमता को वैश्विक स्तर पर निर्णायक बताया और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “भारत के योगदान के बिना दुनिया भर में टीकाकरण करना बेहद कठिन होता।”
उन्होंने “फ्रुगल इनोवेशन” यानी कम लागत में प्रभावी समाधान विकसित करने की भारतीय सोच को बड़ी ताकत बताया। बोले, “ऐसा नवाचार जो इतना महंगा न हो कि लोगों की पहुंच से बाहर हो जाए—यह भारत की संस्कृति का हिस्सा है।”
कोविड-19 महामारी से मिले सबक पर उन्होंने कहा कि इसने वैश्विक सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर किया और देशों को स्वास्थ्य सुरक्षा पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया। उन्होंने कहा, “हमने पाया कि हम वैश्विक स्वास्थ्य आपात स्थिति के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे।”
भारत और अमेरिका, दोनों बड़े लोकतंत्र होने के कारण, इन चुनौतियों से निपटने में सरकारी योजनाओं से अधिक निजी क्षेत्र की भूमिका पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा, “कोई बड़ा मास्टर प्लान नहीं है… सहयोग को सद्भावना और आर्थिक प्रोत्साहन आगे बढ़ाते हैं।”
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि दोनों देशों में नौकरशाही प्रक्रियाएं अभी भी चुनौती बनी हुई हैं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ग्रांट अप्रूवल में देरी के मुद्दे पर हुई चर्चा को याद किया। उन्होंने कहा, “हम लोकतांत्रिक हैं, लेकिन नौकरशाही की भी अपनी भूमिका है।”
क्लिनिकल ट्रायल्स पर उन्होंने कहा कि भारत अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन स्थिति में सुधार हो रहा है। उन्होंने कहा, “क्लिनिकल ट्रायल्स बेहद संवेदनशील होते हैं… इसके लिए सक्षम साइट्स और मजबूत नियामक ढांचा जरूरी है।”
उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक स्तर पर चीन से बाहर निवेश का रुख बढ़ रहा है, जिससे भारत को फायदा मिल रहा है। मेडिकल टेक्नोलॉजी और बायोमेडिकल रिसर्च में भारत के साथ सहयोग बढ़ रहा है।
स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियों पर उन्होंने कहा कि अमेरिका में दवाओं की ऊंची कीमत बड़ी समस्या है, जबकि भारत का फोकस अभी भी अधिक से अधिक लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका पर उन्होंने कहा कि इससे शोध की गति और गुणवत्ता में सुधार हुआ है, लेकिन यह अभी तक पूरी तरह नए खोज करने में निर्णायक साबित नहीं हुआ है।
जेरहौनी ने बायोटेक्नोलॉजी को “मल्टीपोलर” दौर में प्रवेश करता हुआ बताया, जहां भारत, चीन और अन्य देश नवाचार में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने कहा, “मुझे फर्क नहीं पड़ता कि इलाज कहां से आता है; मेरा लक्ष्य है कि मरीज ठीक हों।”
–आईएएनएस
केआर/
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