Delhi: जंतर-मंतर वेधशाला के राम यंत्र का होगा जीर्णोद्धार, भारतीय खगोल विज्ञान की विरासत को मिलेगा नया जीवन

Delhi Jantar Mantar Ram Yantra Conservation
Delhi Jantar Mantar Ram Yantra Conservation: दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर परिसर में स्थित प्राचीन खगोलीय राम यंत्र अब अपने जीर्णोद्धार की ओर बढ़ रहा है। सदियों पुराना यह उपकरण भारतीय खगोल विज्ञान की समृद्ध परंपरा और वैज्ञानिक सोच का जीवंत प्रतीक माना जाता है। सूर्य की छाया के आधार पर समय, दिशा और आकाशीय पिंडों की स्थिति का सटीक अनुमान लगाने वाला यह यंत्र बिना किसी आधुनिक तकनीक या बिजली के काम करता था। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इसके संरक्षण और पुनर्स्थापन की जिम्मेदारी को लेकर कार्य करेगी। विभाग का उद्देश्य इस ऐतिहासिक धरोहर को उसके मूल स्वरूप में वापस लाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना है।
अधिकारियों के अनुसार, यह केवल एक स्थापत्य संरचना नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों का महत्वपूर्ण प्रमाण है। राम यंत्र का निर्माण 18वीं शताब्दी में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने कराया था। इसका नाम अपन दादा राजा राम सिंह की स्मृति में रखा। यह यंत्र मुख्य रूप से खगोलीय पिंडों की ऊंचाई और दिशा को मापने के लिए बनाया गया था। उस समय यह खगोलविदों के लिए आकाशीय घटनाओं को समझने का एक अत्यंत उपयोगी साधन था।

बड़ी अनोखी संरचना है जंतर-मंतर की राम यंत्र

इसकी संरचना बेहद अनोखी है। यह दो विशाल गोलाकार खुले ढांचों से मिलकर बना है, जिनके केंद्र में ऊंचे स्तंभ स्थित हैं। सूर्य की किरणें जब इन स्तंभों पर पड़ती थीं, तो उनकी छाया मापांकित दीवारों और फर्श पर पड़ती थी, जिससे खगोलीय गणनाएं की जाती थीं। राम यंत्र की आंतरिक दीवार लगभग 7.5 मीटर ऊंची है, जबकि इसका व्यास करीब 16.6 मीटर है। केंद्र का स्तंभ भी लगभग इसी ऊंचाई का है, जिससे सटीक मापन संभव होता था। पत्थर से बने त्रिज्यीय खंडों पर अंकित निशान समय, कोण और दिशा की गणना में सहायता करते थे। इसकी खुली संरचना खगोलविदों को आकाश का विभिन्न कोणों से अवलोकन करने की सुविधा देती थी।

समय के साथ हुई जीर्ण-शीर्ण तो अब होगा कायाकल्प

हालांकि समय के साथ यह यंत्र क्षतिग्रस्त हो गया है। पिलरों पर बनी रेखाएं मिट चुकी हैं और कई गणनात्मक आकृतियां घिस गई हैं। एएसआई की वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, मरम्मत से पहले इसका विस्तृत दस्तावेजीकरण किया जाएगा। उनका कहना है कि घिसे हुए चिन्हों को वैज्ञानिक तरीके से पुनः उकेरना आवश्यक है, ताकि इसकी ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रामाणिकता बनी रहे। यह जीर्णोद्धार न केवल एक स्मारक को संरक्षित करने का प्रयास है, बल्कि भारत की प्राचीन खगोलीय परंपरा को फिर से जीवंत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।
रिपोर्ट-आशुतोष शांडिल्य

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