पटना, (पंजाब केसरी) : वंचित समाज पार्टी के चुनाव अभियान समिति के प्रमुख ललित मोहन सिंह ने कहा कि किसानों के बही खाते में नफा-नुकसान का कोई कॉलम ही नहीं होता,आखिरकार ऑडिट करने कौन आएगा, उसके खाते में एक ही कॉलम है घाटे वाला क्योंकि उसके उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य, तय करने वाले कभी खेतों की मेड़ों पर नहीं घूमे,कोई जोंक भरे, उनकी परवाह किए बिना पानी कीचड़ में खड़े होकर धान की रोपाई नहीं करवाई। वैसे अधिकारीगण भाव तय करते हैं मानो किसानों को मुआवजा, मेहनत की नहीं, बल्कि खैरात बांट रहे हों।
श्री सिंह ने कहा कि हमारे बिहार में, बहुतायत में, संतोष धन पाया जाता है, कोई किसान खुदकुशी नहीं करता, वह जानता है कि जो होता है अच्छा होता है। दिनकर की कविता की पंक्तियां को अंगोछा के किनारे खैनी के साथ गांठ बांध, दिनकर जी को खैनी बहुत प्रिय था, चलता है सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें आगे क्या होता है। होहियें वही जे राम रुचि राखा। क्या वे वास्तव में न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते हैं, जिसका अर्थ होना चाहिए कि इस मूल्य से नीचे कोई भी ग्राहक खरीद नहीं सकता हो, पर असलियत में यह एमएसपी का मायने है ,अर्थात् अधिकतम विक्रय मूल्य किसानों को किसी भी हाल में इस भाव से ऊपर माल विक्रय करने की अनुमति कदाचित नहीं है। और सरकारी खरीद तो हमारे यहां जनाब एक मजाक सा बन कर रह गया है। जो भी अधिकारी को खरीदने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है वह मिल मालिकों से तथा पैक्स के सभापति की मिली भगत में कम-से-कम रू 3.00 से लेकर रू 3.50 प्रति किलो ग्राम या रू 300/- से रू 350/- प्रति क्विंटल चाहिए चाहिए। जिस फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य ? 1500/- प्रति क्विंटल रखा गया हो उस फसल का 20 से 25प्रतिशत तो सरकार के अधिकारियों को जाता है। और किसानों को तत्काल भुगतान के विपरीत कई महीने बाद पैसे मिलते हैं।


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