राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी चर्चा के बीच बॉलीवुड की दिग्गज एक्ट्रेस शर्मिला टैगोर के एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। शर्मिला टैगोर ने इस गीत के अंदर कुछ पेराग्राफ में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र करते हुए कहा था कि सभी धर्मों के लोगों को साथ लेकर चलने के लिए शुरुआती दो पेराग्राफ तक सीमित रहना बेहतर हो सकता है। ऐसे में उनके इस बयान के बाद उन्हें हर तरफ से बैकलेश देखने को मिल रहा है।
Sharmila Tagore Controversial Statement On Vande Matram: शर्मिला टैगोर ने क्या कहा?
She is Begum Ayesha Sultana:
• Before marriage, she was Sharmila Tagore.
• She is a direct descendant of Rabindranath Tagore.
• Rabindranath Tagore sang Vande Mataram at the Congress session in 1896.
• Rabindranath Tagore composed the tune for Vande Mataram.
• Now, his…
— Facts (@BefittingFacts) August 21, 2026
हाल ही में एक मीडिया हाउस को दिए गए एक इंटरव्यू में शर्मिला टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ की एक धार्मिक लाइन पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि जो लोग एक ही ईश्वर में विश्वास करते हैं, उनके लिए इस गीत के कुछ बाद वाले वर्स को गाना सिंपल नहीं हो सकता। शर्मिला के मुताबिक, ‘वंदे मातरम्’ के कुछ हिस्सों में काली और दुर्गा जैसी देवियों को मेंशन किया गया है। ऐसे में अगर देश के अलग-अलग धार्मिक कम्यूनिटी को साथ लेकर चलना है, तो गीत के शुरुआती दो वर्स ज्यादा सही हो सकते हैं।
आपको बता दें कि इस इंटरव्यू में जो भी बातें कही गई है वो बेगम आयशा सुल्ताना ने कही है, जो कि शादी से पहले शर्मिला टैगोर थीं। लेकिन आपको ये बात जाकर काफी हैरान होगी कि ये रबींद्रनाथ टैगोर की सीधी वंशज हैं। रबींद्रनाथ टैगोर वहीं हैं जिन्होंने 1896 में कांग्रेस सेशन में ‘वंदे मातरम’ गाया था, रबींद्रनाथ टैगोर ने ही ‘वंदे मातरम’ की धुन भी बनाई थी। लेकिन अब, उनकी वंशज बेगम आयशा सुल्ताना का ये कहना है कि पूरा ‘वंदे मातरम’ नहीं गाया जाना चाहिए क्योंकि बहुत से लोग कई देवताओं में विश्वास नहीं करते हैं। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि कन्वर्ट होने के बाद ये टैगोर परिवार के लिए कितनी शर्म की बात है।
शर्मिला टैगोर की बेटी सबा पटौदी ने बताई धर्म परिवर्तन के बाद की सच्चाई
Saba Pataudi, daughter of Sharmila Tagore –
“My mother Sharmila Tagore converted to Islam and guided us in Islam.
My religion is Islam and I feel spiritually connected to it.
I respect all religion. There was no temple and that there was no Hindu religion that we practiced in… https://t.co/tWIvuG8rpm
— News Algebra (@NewsAlgebraIND) August 20, 2026
हालांकि इसी बीच शर्मिला टैगोर की बेटी सबा पटौदी का भी एक वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जिसमें वो खुद इस बात को बता रही हैं कि “मेरी माँ शर्मिला टैगोर ने इस्लाम अपना लिया था और हमें भी इस्लाम के रास्ते पर चलने के लिए मोटीवेट किया। मेरा धर्म इस्लाम है और मैं इससे आध्यात्मिक रूप से जुड़ाव महसूस करती हूँ। मैं सभी धर्मों का सम्मान करती हूं, लेकिन हमारे परिवार में कोई मंदिर नहीं था और न ही हम हिंदू धर्म का पालन करते थे।”
इन सारी बातों से ये साफ पता चलता है कि धर्म बदलने के बाद किस तरह इस परिवार का दिमाग मेनीप्यूलेट किया गया है। क्योंकि शर्मिला की बेटी खुद इस बात को एक्सेप्ट कर चुकी है कि वो पहले एक हिंदु फैमिली से बिलॉन्ग करती थी, लेकिन शादी के बाद धर्म बदलने की वजह से उन्होंने इस्लाम अपना लिया और वो अभी भी उस बड़ी ही कट्टरता के साथ फॉलो करत हैं।
इसी बीच शर्मिला के इस बयान पर एक्ट्रेस और सांसद कंगना रनौत ने भी अपना रिएक्शन दिया है। कंगना ने शर्मिला टैगोर की अपनी राय रखने के अधिकार की तारीफ करी, लेकिन साथ ही कहा कि एक कलाकार द्वारा कविता और कला की इतनी सीमित डेफिनेशन करना, उन्हें हैरान करता है।
कंगना रनौत ने किया विरोध

शर्मिला टैगोर के कमेंट पर कंगना रनौत ने सोशल मीडिया पर अपना रिएक्शन शेयर किया। उन्होंने कहा कि कविता और गीतों में साइन, इमेजीनेशन और मेटाफर्स का इस्तेमाल किसी सोच को इम्प्रेसिव ढंग से प्रेजेंट करने के लिए किया जाता है। इसलिए किसी रचना को सिर्फ धार्मिक नजरिए से देखना उसकी कलात्मकता को मिमिटेड करना है। कंगना ने ‘वंदे मातरम्’ को भारतीय फ्रीडम आंदोलन के इमोशन से जोड़ते हुए कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस रचना के जरिए देशवासियों के अंदर की ताकत और राष्ट्रभावना को जगाने की कोशिश की थी। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी जरूरी साहित्यिक और ऐतिहासिक रचना को सिर्फ धार्मिक रीति-रिवाज के नजरिए से कैसे देखा जा सकता है?
स्वामी विवेकानंद का भी किया जिक्र

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कंगना ने स्वामी विवेकानंद के विचारों का एक्ज़ाम्पल भी दिया। उन्होंने कहा कि ‘शक्ति’ को सिर्फ धार्मिक मतलब में नहीं, बल्कि ऊर्जा, सामर्थ्य और ताकत के रूप में भी समझा जा सकता है। कंगना ने युवाओं की ताकत और देश की ताकत को आगे बढ़ाने वाले स्वामी विवेकानंद के विचारों का भी उल्लेख किया और कहा कि मेटाफर्स को उनके व्यापक मतलब में समझना चाहिए। उन्होंने शर्मिला टैगोर से अपील करते हुए ये भी कहा कि कला और साहित्य को ‘हिंदू-मुस्लिम’ के नजरिए से देखने के बजाय इसे एकता और अपनत्व के इमोशन से समझना चाहिए। कंगना ने अपने मैसेज के आखिर में शर्मिला के लिए स्नेह भी जताया और उनके साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों के बारे में भी बात करी।
क्यों जरूरी है ‘वंदे मातरम्’?

‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं सदी में की थी और बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। गीत के शुरुआती दो वर्स में भारत की प्राकृतिक सुंदरता, धरती और समृद्धि को बताया गया है। वहीं आगे के वर्स में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों के संदर्भ आते हैं। इन्हीं धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों की वजह से ‘वंदे मातरम्’ को लेकर समय-समय पर वैचारिक बहस होती रही है।
ऐसे में शर्मिला टैगोर के कमेंट और कंगना रनौत के रिएक्शन ने इसी पुरानी बहस को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। ऐसे में ये देखना बेहद ही दिलचस्प होगा कि ये बहस कहा जाकर खत्म होती है।
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