भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 3,346 करोड़ रुपए का निवेश किया, जिससे बाजार में सकारात्मक माहौल बना। विशेषज्ञ इसे आर्थिक विकास को समर्थन देने वाला कदम मानते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बाद निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ और इसी के साथ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने इस सप्ताह भारतीय शेयर बाजारों में 3,346.94 करोड़ रुपए का निवेश किया। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) के आंकड़ों के अनुसार, एफपीआई सप्ताह के पहले तीन कारोबारी सत्रों, 9 जून से 13 जून के दौरान भारतीय इक्विटी बाजार में सक्रिय खरीदार रहे।बाजार में सकारात्मक माहौल मुख्य रूप से आरबीआई द्वारा रेपो दर को 50 आधार अंकों से घटाकर 5.5 प्रतिशत करने के फैसले से जुड़ा था, जिसे कई लोगों ने आर्थिक विकास को समर्थन देने और बाजार में लिक्विडिटी में सुधार के स्पष्ट संकेत के रूप में देखा।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ब्याज दरों में इस आश्चर्यजनक कटौती ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने में बड़ी भूमिका निभाई है, क्योंकि यह केंद्रीय बैंक के विकास समर्थक दृष्टिकोण को दर्शाता है। 6 जून को मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के निर्णय का निवेशकों ने स्वागत किया है। निवेशकों ने इसे अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और कॉर्पोरेट आय में सुधार के लिए समय पर उठाया गया महत्वपूर्ण कदम माना। एक ओर जहां वैश्विक कारक बाजार की गतिविधियों को प्रभावित करना जारी रखते हैं, वहीं दूसरी ओर भारत अपनी मजबूत बुनियादी बातों, नीति समर्थन और बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण विदेशी निवेश के लिए एक आकर्षक गंतव्य बना हुआ है।
विदेशी निवेशकों ने मई में भारतीय शेयर बाजार में 19,860 करोड़ रुपए निवेश किए, जिससे यह विदेशी निवेश के लिए साल का अब तक का सबसे अच्छा महीना बन गया। इस बीच, बाजार विश्लेषकों के अनुसार, इस सप्ताह भारतीय इक्विटी बाजार में उतार-चढ़ाव देखा गया और यह आखिरी कारोबारी दिन लाल निशान पर समाप्त हुआ। हालांकि सप्ताह की शुरुआत अमेरिका-चीन व्यापार वार्ता में प्रगति के कारण सकारात्मक रही, लेकिन इजरायल द्वारा ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर हमले करने के बाद यह आशावाद जल्दी ही खत्म हो गया।
GDP per capita के आधार पर दुनिया के सबसे गरीब देश
इस घटना ने वैश्विक निवेशकों के बीच सतर्कता की लहर पैदा कर दी, जिससे वे सोने और अमेरिकी बॉन्ड जैसी सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर बढ़ गए। तेल की कीमतें भी 76 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गईं, जिससे महीनों की स्थिरता टूट गई, क्योंकि आपूर्ति में व्यवधान को लेकर नई चिंताएं सामने आईं।


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