पराली रोकने के लिए जागरूकता नहीं; सही समय पर सही संवाद जरूरी…’,जानें CEEW के नए अध्ययन में और क्या पता चला?

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Delhi : दिल्ली में वायु प्रदूषण के लिए पराली एक बड़ा कारक है। इसे नियंत्रित करने के अनेक उपाय किए गए हैं। बड़े पैमाने पर किसानों को जागरूक भी किया गया है, लेकिन ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर’ (CEEW) के एक नए स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, पंजाब में पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं। किसानों को सही समय पर उनकी जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जानकारी और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना अधिक प्रभावी साबित हो सकता है। यह निष्कर्ष एक नए अध्ययन में सामने आया है, जिसमें किसानों के व्यवहार और…

Delhi : दिल्ली में वायु प्रदूषण के लिए पराली एक बड़ा कारक है। इसे नियंत्रित करने के अनेक उपाय किए गए हैं। बड़े पैमाने पर किसानों को जागरूक भी किया गया है, लेकिन ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर’ (CEEW) के एक नए स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, पंजाब में पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं।

किसानों को सही समय पर उनकी जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जानकारी और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना अधिक प्रभावी साबित हो सकता है। यह निष्कर्ष एक नए अध्ययन में सामने आया है, जिसमें किसानों के व्यवहार और निर्णय लेने की प्रक्रिया का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2022 के बाद पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है, लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। पंजाब के चार जिलों में 102 किसानों पर किए गए सर्वेक्षण, समूह चर्चाओं और अधिकारियों से बातचीत में पाया गया कि जानकारी की कमी के साथ-साथ अविश्वास, सामाजिक मान्यताएं और आर्थिक चुनौतियां भी किसानों के फैसलों को प्रभावित करती हैं।

सर्वेक्षण में शामिल 78 प्रतिशत किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अनजान

रिपोर्ट में ‘4 सी फ्रेमवर्क’ कवरेज, क्लैरिटी, क्रेडिबिलिटी और कन्वर्जन के आधार पर मौजूदा सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) गतिविधियों का मूल्यांकन किया गया। सर्वेक्षण में शामिल 78 प्रतिशत किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अनजान थे, जबकि 63 प्रतिशत किसानों को उस समय जानकारी नहीं मिली, जब उन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत थी। हालांकि 63 प्रतिशत किसानों ने पराली जलाना पूरी तरह छोड़ दिया है, लेकिन 31 प्रतिशत किसान अभी भी आंशिक रूप से पराली जलाते हैं।

62 प्रतिशत किसानों ने कृषि विस्तार अधिकारियों को सबसे विश्वसनीय सूचना स्रोत बताया

अध्ययन में पाया गया कि किसान पर्चों और सरकारी वेबसाइटों की तुलना में साथी किसानों, कृषि अधिकारियों और सोशल मीडिया पर अधिक भरोसा करते हैं। 62 प्रतिशत किसानों ने कृषि विस्तार अधिकारियों को सबसे विश्वसनीय सूचना स्रोत बताया। वहीं प्रशिक्षण कार्यक्रमों में व्यावहारिक प्रदर्शन की कमी भी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई।

रिपोर्ट के मुताबिक, कई किसान कीटों के हमले के डर से आंशिक रूप से पराली जलाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकांश ने स्वयं ऐसा कोई नुकसान नहीं देखा, बल्कि सुनी-सुनाई बातों के आधार पर यह धारणा बना ली। अध्ययन ने सुझाव दिया है कि खेतों में प्रदर्शन, सरल संदेशों और लक्षित व्यवहार परिवर्तन अभियानों के माध्यम से इस समस्या को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है।

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Avinay