मेडिकल कॉलेज ‘MAMC’ बदहाल, डिजिटल दौर में भी ऑफलाइन व्यवस्था से जूझ रहे छात्र

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MAMC : देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों में शामिल मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (MAMC) में पढ़ने वाले छात्र आधुनिक चिकित्सा शिक्षा के अनुरूप सुविधाएं न मिलने से निराश हैं। छात्रों का कहना है कि देश तेजी से डिजिटल हो रहा है, लेकिन मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था आज भी वर्षों पुरानी प्रक्रियाओं पर टिकी हुई है। परीक्षा फॉर्म भरने से लेकर जमा करने तक की पूरी प्रक्रिया ऑफलाइन है और इसके लिए छात्रों को स्वयं दिल्ली विश्वविद्यालय के परीक्षा विभाग तक जाना पड़ता है। ऑनलाइन फीस भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है, जबकि परीक्षा शुल्क लगातार बढ़ाया जा रहा है।…

MAMC : देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों में शामिल मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (MAMC) में पढ़ने वाले छात्र आधुनिक चिकित्सा शिक्षा के अनुरूप सुविधाएं न मिलने से निराश हैं। छात्रों का कहना है कि देश तेजी से डिजिटल हो रहा है, लेकिन मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था आज भी वर्षों पुरानी प्रक्रियाओं पर टिकी हुई है। परीक्षा फॉर्म भरने से लेकर जमा करने तक की पूरी प्रक्रिया ऑफलाइन है और इसके लिए छात्रों को स्वयं दिल्ली विश्वविद्यालय के परीक्षा विभाग तक जाना पड़ता है।

ऑनलाइन फीस भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है, जबकि परीक्षा शुल्क लगातार बढ़ाया जा रहा है। एमएएमसी के अंतिम वर्ष के एक छात्र ने बताया कि लाइब्रेरी के अधिकांश कंप्यूटर काम नहीं करते, परिसर में बेहतर वाई-फाई की सुविधा नहीं है, लेक्चर हॉल छोटे हैं और कई इमारतें जर्जर हो चुकी हैं। उनका कहना है कि देशभर के नीट टॉपर यहां दाखिला लेते हैं, लेकिन उन्हें आधुनिक मेडिकल शिक्षा के अनुरूप संसाधन नहीं मिल पा रहे हैं।

एमएएमसी के छात्रों को प्रशिक्षण के लिए लोक नायक अस्पताल, जीबी पंत अस्पताल, गुरु नानक आई सेंटर और मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज़ (मेड्स) जाना पड़ता है। छात्रों का आरोप है कि जहां निजी अस्पताल रोबोटिक सर्जरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, वहीं इन सरकारी अस्पतालों में अब भी पुरानी तकनीक से काम चल रहा है। हालांकि इस वर्ष जनवरी में दिल्ली विश्वविद्यालय ने एमएएमसी और लोक नायक अस्पताल में मेडिकल जेनेटिक्स विभाग शुरू करने के लिए आवश्यक शैक्षणिक और नियामकीय मंजूरी दे दी है।

छात्रों की संख्या बढ़ने के बावजूद आधारभूत ढांचे का अपेक्षित विस्तार नहीं

साल 1958 में स्थापित एमएएमसी में हर वर्ष 250 एमबीबीएस छात्रों का प्रवेश होता है, लेकिन छात्रों का कहना है कि पिछले दो दशकों में छात्र संख्या बढ़ने के बावजूद आधारभूत ढांचे का अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ। एक छात्र के मुताबिक, कई वर्षों तक 10-10 छात्रों को एक ही कमरे में रहना पड़ा, जहां पढ़ाई के लिए पर्याप्त टेबल तक उपलब्ध नहीं थीं। 18 हजार रुपये हॉस्टल शुल्क देने वाले पीजी छात्रों को भी कॉमन वॉशरूम का इस्तेमाल करना पड़ता है। हॉस्टल और मेस की व्यवस्थाओं को लेकर भी छात्रों ने असंतोष जताया।

MAMC परिसर के पुनर्विकास की योजना को मंजूरी, धरातल पर काम नहीं

हालांकि अप्रैल में दिल्ली सरकार ने 137 एकड़ में फैले एमएएमसी परिसर के पुनर्विकास की योजना को मंजूरी देते हुए दो नए हॉस्टलों के निर्माण के लिए 573.41 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। परिसर में कुछ हॉस्टलों के नवीनीकरण का कार्य भी शुरू हो चुका है, लेकिन छात्रों का कहना है कि योजनाओं के धरातल पर उतरने के बाद ही वास्तविक बदलाव महसूस होगा। कॉलेज के लेक्चर हॉल और फैकल्टी रूम भी खराब हालत में हैं।

कई कमरों में बारिश के दौरान पानी टपकता है और शिकायतों के बावजूद लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) समय पर मरम्मत नहीं करता। कॉलेज का स्विमिंग पूल वर्ष 2018 से बंद पड़ा है। वहीं लगभग दो हजार एमबीबीएस और पीजी छात्रों के लिए बनी लाइब्रेरी में एक समय में मुश्किल से एक-तिहाई छात्र ही बैठ पाते हैं। छात्रों का कहना है कि यदि देश के अग्रणी मेडिकल संस्थानों में भी आधुनिक सुविधाओं और डिजिटल व्यवस्थाओं का अभाव रहेगा तो इसका असर भविष्य के डॉक्टरों की गुणवत्ता और प्रशिक्षण पर पड़ना तय है।

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Avinay