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पुतिन का पावर पंच

वैश्विक स्तर के नेता रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के या तो आलोचक हो सकते हैं या फिर प्रशंसक लेकिन उन्हें नजरंदाज करना बहुत मुश्किल है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि तमाम विरोध और चुनौतियों के बावजूद पुतिन की ताकत कम नहीं हुई है और रूस आज भी शक्तिशाली है। पुतिन के अचानक सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के दौरे से हलचल मच गई है। अमेरिका के करीबी माने जाने वाले इन देशों में पुतिन का भव्य स्वागत अमेरिका को अखर रहा है। पुतिन का स्वागत कर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने क्या संदेश दिया है, इसके अर्थ बड़े गहरे हैं। पुतिन सुखोई विमानों के घेरे में पूरे दबदबे के साथ शेर की तरह पहुंचे। यह अपने आप में खाड़ी देश में पावरफुल पंच है।
यूक्रेन के साथ युद्ध के बाद पुतिन ने अपने विदेशी दौरे सीमित कर दिए हैं। इससे पहले अक्टूबर में उन्होंने चीन का दौरा किया था और हाल के महीनों में उन देशों की यात्राएं की जो कभी सोवियत संघ का हिस्सा थे। उन्हें यूक्रेन में युद्ध अपराधों के मामले में इंटरनेशनल क्रमिनल कोर्ट से जारी गिरफ्तारी वॉरंट का सामना करना पड़ रहा है। आईसीसी ने पुतिन पर यूक्रेन के रूसी कब्जे वाले इलाक़ों में बच्चों को गैर-क़ानूनी तरीक़े से बाहर ले जाने के आरोप लगाए हैं। हालांकि रूस ने हमले के दौरान अत्याचार के सभी आरोपों का खंडन किया है।
संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब, दोनों ऐसे देश हैं, जिन्होंने आईसीसी की स्थापना संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इसका मतलब यह है कि इन देशों पर राष्ट्रपति पुतिन को हिरासत में लेने की बाध्यता नहीं है। इन्हीं अटकलों के बीच पुतिन, दक्षिण अफ्रीका में हुए एक शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुए थे। दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स समिट हुआ था और पुतिन इसमें शामिल नहीं हुए थे। इसके बाद सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित जी-20 समिट में भी राष्ट्रपति पुतिन नहीं आए थे। यूएई और सऊदी अरब दोनों ही रूस के अहम भागीदार हैं और दोनों ही देशों ने यूक्रेन युद्ध में तटस्थ रुख अपनाया है। ये देश रूस पर अमेरिका और उसके ​पिट्ठू देशों के प्रतिबंधों को मानने से इंकार करते आए हैं। दोनों देशों की यात्रा के बाद मास्को में पुतिन की ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी से मुलाकात के भी अपने अर्थ हैं। यूक्रेन से जंग के दौरान ईरान रूस का प्रमुख व्यापार भागीदार और हथियारों का आपूर्तिकर्ता बन चुका है।
पुतिन ने सऊदी अरब और यूएई के नेताओं के साथ आपसी संबंधों के अलावा इजराइल-हमास युद्ध और र कई संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत की। इजराइल-हमास में बातचीत के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों में यूएई और सऊदी अरब की महत्वपूर्ण भूमिका है। रूस इजराइल-हमास युद्ध में मध्यस्थता करने की पेशकश कर चुका है। पुतिन ने मध्यपूर्व के संघर्ष में अपने देश की छवि पावर ब्रोकर की तरह मजबूत करने और युद्ध में अमेरिकी कूटनीति की​ विफलता के तौर पर पेश करके अमेरिका को सीधे चुनौती दे दी है।
दुनिया के तीनों शीर्ष तेल उत्पादक देशों से रूस की नजदीकियों का अर्थ यही है कि पुतिन ने अमेरिका विरोधी नया गठबंधन बना ​लिया है। रूस की तेल उत्पादक देशों से करीबी का अर्थ तेल बाजार में भी महसूस की जा रही है। रूस आपेक ग्रुप में है आैर यह तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए तेल उत्पादक देशों के साथ मिलकर काम करता है। इस ग्रुप ने हाल ही में तेल उत्पादन में कटौती का फैसला लिया है।
यूक्रेन से युद्ध के 23 महीने बीत जाने पर भी पुतिन की अपने देश में ताकत कम नहीं हुई। उनके तंत्र में कोई दरार नहीं आई। अभूतपूर्व आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद रूसी अर्थव्यवस्था टिकी हुई है और ऊर्जा का उत्पादन व निर्यात जारी है। 17 मार्च को होेने वाले राष्ट्रपति चुनाव में पुतिन का पद पर बरकरार रहना लगभग तय है। यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया भले ही रूस पर हमलावर हुई लेकिन पुतिन ने अपने राजनीतिक कौशल से तेल उत्पादक देशों के बीच व्यापार और मजबूत करके अमेरिका को बड़ा झटका दिया है। पुतिन ने यह दिखा दिया कि उनका दखल हर जगह बराबर है। पुतिन ने यह दिखाया है कि दुनिया की राजनीति में अभी भी उनका दबदबा है और अमेरिका का उन पर कोई असर नहीं है और न ही उनके दोस्तों पर।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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