चुनाव आयोग ने देश के तीस राज्यों व केन्द्र शासित क्षेत्रों में जिस तरह मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण किया उसमें अभी तक 13 करोड़ 27 लाख मतदाताओं के नाम काट दिये गये हैं। यह संख्या दुनिया के बहुत से देशों की उनकी अपनी-अपनी कुल जनसंख्या से भी अधिक है। जाहिर है कि ये आंकड़े चौंकाने वाले थे क्योंकि ‘अवैध’ मतदाताओं की इतनी बड़ी संख्या का मतलब होता है कि चुनाव आयोग अभी तक कानों में तेल डाले सो रहा था परन्तु हकीकत इसके पूरी तरह उलट है क्योंकि अधिकतर राज्यों में मतदाता सूची से नाम काटने का षड्यन्त्र या घपला किया जा रहा था। इस बाबत चुनाव आयोग को देश की कुछ राजनीतिक पार्टियां लगातार आगाह भी कर रही थीं परन्तु उसने कुछ ध्यान नहीं दिया जिससे लगता था कि चुनाव आयोग के समक्ष भारत के लोगों को मिले एक वोट के पवित्र व संवैधानिक अधिकार का कोई महत्व ही नहीं था। चुनाव आयोग की तभी आंखें खुल जानी चाहिए थीं जब उत्तराखंड की कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने कुमारी शैलजा के नेतृत्व में दिल्ली आकर ज्ञापन दिया था और कहा था कि राज्य के विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में एक विशेष राजनीतिक दल से जुड़े लोग झूठे फार्म-7 भर कर सैकड़ों की संख्या में वैध मतदाताओं के नाम काटने के आवेदन दे रहे हैं और इलाके के चुनाव अधिकारियों (बीएलओ) पर दबाव बना रहे हैं। इसी प्रकार की शिकायतें कर्नाटक व अन्य राज्यों से भी आयीं जिसे देखकर अब यह कहा जा सकता है कि विशेष गहन पुनरीक्षण क्या नाम काटने की मुहीम थी ?
भारत में कुल 99 करोड़ के लगभग मतदाताओं के नाम सूचीबद्ध हैं। इनमें से 13 करोड़ के नाम जिस तरह गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण के नाम पर काटे गये उससे एेसा लगा कि आजादी के बाद भारत के लोगों को मिला ‘एक वोट’ का अधिकार कोई तोहफा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को यह मालूम होना चाहिए कि यह वयस्क आधार पर एक वोट का अधिकार भारत की पुरानी पीढि़यों ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ दशकों तक महात्मा गांधी के नेतृत्व में संघर्ष करते हुए हजारों कुर्बानियां देकर प्राप्त किया है। बिना किसी सामाजिक, आर्थिक, लिंग व क्षेत्र आदि के भेदभाव के मिले एक वोट के अधिकार की वजह से ही भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहलाता है। मगर ज्ञानेश कुमार ने इसी अधिकार पर चोट करके न केवल भारत के आम आदमी का अपमान किया बल्कि पूरे स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रतिफल में भी ‘अमानत में खयानत’ करने की भयंकर गलती की।
बाबा साहेब अम्बेडकर ने जब स्वतन्त्र भारत को इसका दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान दिया तो साफ कर दिया था कि इसके प्रावधानों से भारत के गरीब से गरीब व्यक्ति को भी राजनीतिक स्वतन्त्रता मिलेगी क्योंकि उसके एक वोट और टाटा, बिड़ला जैसे उद्योगपति के एक वोट की कीमत में कोई अन्तर नहीं होगा। दरअसल महात्मा गांधी ने अपने अहिंसा के औजार से भारत में एेसी क्रान्ति की थी जिसकी मिसाल केवल भगवान बुद्ध के अनुयाइयों के शासनकाल में ही मिलती है। अतः जब ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग के अपने दो साथियों को अंधेरे में रखकर मतदाता सूची पुनरीक्षण की नियमावली जारी की तो पूरे भारत के गरीब-गुरबा लोगों पर उनके वोट कटने की तलवार लटक गई। मगर भला हो ज्ञानेश कुमार के दो चुनाव आयुक्त साथियों सर्वश्री सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी का कि उन्होंने ज्ञानेश कुमार के तुगलकी अन्दाज के खिलाफ विद्रोह किया और दस महीने में 14 बार मुख्य चुनाव आयुक्त के तुगलकी फरमानों का विरोध किया। बाबा साहेब अम्बेडकर चुनाव आयोग को इसी वजह से स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था बना कर गये थे जिससे भारत के लोगों के एक वोट के अधिकार की इस प्रकार रक्षा हो सके कि चुनाव के समय हर मतदाता ‘स्वयंभू’ बन सके और अपनी मनमर्जी की सरकारें चुन सके परन्तु ज्ञानेश कुमार ने इस समीकरण को ही उल्टा करने की कोशिश की और वह मतदाताओं को ही चुनने लगे। बेशक संविधान में यह व्यवस्था है कि केवल जायज भारतीय नागरिक ही मतदाता बन सकता है मगर यह कार्य देश के गृह मन्त्रालय का है कि वह नागरिकों की राष्ट्रीयता चिन्हित करे।
चुनाव आयोग केवल मतदाताओं के भारतीय वयस्क होने का प्रमाण मांग सकता है मगर क्या कयामत है कि चुनाव आयोग ने उन नागरिकों के नाम भी उड़ा डाले जिनके पास भारतीय पासपोर्ट था। एेसे तुगलकी अन्दाज का भारत जैसे लोकतन्त्र में विरोध होना स्वाभाविक था अतः लोग व राजनीतिक दल सड़कों पर आ गये जिसकी वजह से ज्ञानेश कुमार को निर्देश देना पड़ा कि जिन 20 राज्यों में पुनरीक्षण का काम पूरा हो चुका है उनमें काटे गये या हटाये गये मतदाताओं के नाम पुनः जोड़ने का अभियान चलाया जाये। इसके बहुत गंभीर मायने निकलते हैं कि जो पुनरीक्षण का कार्य किया गया वह उचित नहीं था। साथ ही ज्ञानेश कुमार ने 18 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद युवाओं के मतदाता बनने की फार्म-6 प्रक्रिया पर भी लगाम लगाने की कोशिश की। उनसे यह नया अहद लिया जाने लगा कि उनके माता- पिता भी मतदाता रहे हैं जबकि पहले एेसा कोई नियम नहीं था, बल्कि केवल यह शपथ लेनी होती थी कि वह युवा भारत का नागरिक है और अब से पहले उसने कभी वोट नहीं डाला है। यह कार्य कितना असंवैधानिक था, इस पर उन्हीं के साथी आयुक्तों सर्वश्री संधू व जोशी ने आपत्ति की। अब 20 राज्यों में हटाये गये मतदाताओं से फार्म-6 भरने को कहा जा रहा है। इसके अलावा ज्ञानेश कुमार ने तहसील व जिला और प्रदेश स्तर के अधिकारियों की पहुंच से चुनाव आयोग का पोर्टल ‘ईसीआई नेट’ भी दूर कर दिया था जबकि मतदाता सूची में नाम जोड़ने व काटने का संवैधानिक तौर पर अधिकार तहसील स्तर के अधिकारी ईआरओ का ही होता है। ईसीआई नेट की प्रणाली को दिल्ली में केन्द्रीकृत करके उन्होंने संविधान के विपरीत कार्य किया जिसके प्रमाण गोवा सहित कई अन्य राज्यों से भी मिल रहे हैं। इससे साबित हो रहा है कि ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग को मिली संवैधानिक स्वतन्त्रता को तुगलकी अन्दाज में ले रहे थे। मैं यह लगातार लिख रहा हूं कि चुनाव आयोग सरकार का अंग नहीं होता है और सीधे संविधान से ताकत लेकर अपना काम करता है। किसी राज्य या केन्द्र में किस पार्टी की सरकार है इससे उसे कोई मतलब नहीं होता है। उसका काम हर राजनीतिक दल को निरपेक्ष भाव से नियमानुसार एक समान रूप से देखने का होता है।
13 करोड़ वोटरों का भविष्य
Summary :
चुनाव आयोग ने देश के तीस राज्यों व केन्द्र शासित क्षेत्रों में जिस तरह मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण किया उसमें अभी तक 13 करोड़ 27 लाख मतदाताओं के नाम काट दिये गये हैं। यह संख्या दुनिया के बहुत से देशों की उनकी अपनी-अपनी कुल जनसंख्या से भी अधिक है। जाहिर है कि ये आंकड़े चौंकाने वाले थे क्योंकि ‘अवैध’ मतदाताओं की इतनी बड़ी संख्या का मतलब होता है कि चुनाव आयोग अभी तक कानों में तेल डाले सो रहा था परन्तु हकीकत इसके पूरी तरह उलट है क्योंकि अधिकतर राज्यों में मतदाता सूची से नाम काटने का षड्यन्त्र…


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