बदलता समाज…आओ हल ढूंढें

Summary :

आज हमारे सामने दिल दहला देने वाली घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। चाहे वह मध्य प्रदेश की बेटी के साथ हुई दर्दनाक घटना या नोएडा जैसे शहरों में लड़कियों पर अत्याचार और आत्महत्या के मामले या एक जवान जज बेटे की आत्महत्या का केस। यह केवल अपराध नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक गहरी चेतावनी है। हर दिन कहीं दहेज के कारण बहू प्रताड़ित हो रही है, कहीं किसी लड़की का मानसिक दबाव इतना बढ़ जाता है कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती है। वहीं कुछ मामलों में झूठे आरोपों और पारिवारिक तनाव के कारण सास, ससुर…

आज हमारे सामने दिल दहला देने वाली घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। चाहे वह मध्य प्रदेश की बेटी के साथ हुई दर्दनाक घटना या नोएडा जैसे शहरों में लड़कियों पर अत्याचार और आत्महत्या के मामले या एक जवान जज बेटे की आत्महत्या का केस। यह केवल अपराध नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक गहरी चेतावनी है। हर दिन कहीं दहेज के कारण बहू प्रताड़ित हो रही है, कहीं किसी लड़की का मानसिक दबाव इतना बढ़ जाता है कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती है। वहीं कुछ मामलों में झूठे आरोपों और पारिवारिक तनाव के कारण सास, ससुर और परिवार भी पीड़ा झेलते हैं।
आखिर कहां गलती है? इतनी घिनौनी घटनाएं क्यों बढ़ती जा रही हैं। हमें जरूरत है अपने परिवारों और समाज में हो रही घटनाओं पर ​िचंतन और मंथन करने की। मुझे लगता है कि आज परिवारों के साथ बैठकर बात करने की परम्परा कम होती जा रही है। बच्चे अपने दुख, डर और तनाव को साझा नहीं कर पा रहे हंै। मोबाइल भी बहुत बड़ा कारण बन रहा है। यही नहीं शादी के बाद लड़की से हर चीज परफैक्ट करने की उम्मीद की जाती है। कहीं दहेज का दबाव, कहीं नौकरी और घर दोनों को सम्भालने का बोझ, कहीं तुलना। यह सब मानसिक दबाव पैदा करते हैं, कई लड़कियां ससुराल से भी सपनों की दुनिया की उम्मीद रखती हैं। जब जिन्दगी की वास्तविकता का सामना करती हैं तो सहन नहीं कर पातीं।
यही नहीं आज यूथ में क्रोध, अहंकार बढ़ रहा है। सहनशक्ति भी कम हो रही है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट रहे हैं। लोग समझौता आैर धैर्य भूलते जा रहे हैं। ‘‘मैं ही सही हूं’’ की भावना परिवारों को तोड़ रहा है। डिप्रेशन, अकेलापन, तनाव यह शब्द बहुत सुनने को आ रहे हैं और हो भी रहे हैं। कुछ लोग अपराध करने से भी नहीं डरते। समाज में नैतिक शिक्षा, मानवता, संस्कारों की कमी आ रही है। यही नहीं फेसबुक पर दिखावा यानी शो ऑफ भी एक जानलेवा कारण बन रहा है। सोशल मीडिया की दिखावटी जिन्दगी भी कारण बन रही है। माता-पिता की शिक्षा में भी कमियां आ रही हैं।
आज जरूरत है बेटियों को केवल सहन करना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाना चाहिए। लड़कियों को मानसिक रूप से मजबूत बनाना जरूरी है। शादी को केवल सामाजिक प्रतिष्ठा न बनाएं, बल्कि अच्छे संस्कार और समझ को महत्व दें। यही नहीं बहू को बेटी जैसा सम्मान दें। आने वाली लड़की (बहू) को समय और अपनापन दें। दहेज जैसी बुराई को पूरी तरह खत्म करें। लड़कियों के अन्दर एक विश्वास, एक समझ डालनी जरूरी है। हर परिस्थिति में आत्महत्या समाधान नहीं है। जीवन बहुत अनमोल है। यदि कोई समस्या है तो परिवार, मित्र, कानून या समाज से सहायता लें। अपने गुस्से या गलत सलाह में आकर पूरे परिवार को झूठे मामलों में फंसाना भी उचित नहीं है। रिश्ते हमेशा आपसी सहयोग, सहनशीलता, एडजस्टमेंट से चलते हैं।
एक बेटी केवल किसी घर की बहू नहीं होती, वह दो परिवारों की इज्जत, भावनाएं आैर भविष्य होती है। परिवार कानून से नहीं प्यार और संवाद सम्मान से चलते हैं। आज आवश्यकता है हम दोष देने की बजाय समाधान ढूंढें, बेटियों को सुरक्षा, माता-पिता को सम्मान और परिवारों में प्रेम और विश्वास बढ़े।

Kiran Chopra