यह एक कड़वा सच है कि आज भी बेटियां दहेज दानव की ज्वाला में धूं-धूं कर जल रही हैं। बात पिछले दिनों दहेज हत्याओं का शिकार हुई बेटियों से जुड़ी घटनाएं की है। बेटियों या बहुओं को किसी भी किस्म के मानसिक दबाव और तनाव के द्वंद्व के चलते आत्महत्या करनी पड़े या फिर कोई बेटी रेप का शिकार हो जाए या फिर कोई बेटा ससुराल से तंग आकर या अपनी पत्नी से दुखी होकर आत्महत्या कर लें और उसे इंसाफ न मिले तो इसे क्या कहेंगे? आखिरकार इसका समाधान क्या है? क्योंकि मैं बुजुर्गों के लिए, उनके सम्मान के लिए काम कर रही हूं और जो चीजें सामने आती हैं उसके मुताबिक कहा जा सकता है कि कहीं तो माता-पिता बहुओं के उत्पीडऩ का शिकार हैं और कहीं बेटे भी इस मामले में बहुत पीडि़त हैं। बेटा या बेटी कहीं न कहीं, किसी न किसी किस्म की पारिवारिक पीड़ा से परेशान हैं। ऐसी घटनाएं पहले कभी-कभी ही सुनने को मिलती थी परंतु अब यह आए दिन हो रही हैं। मेरा मानना है कि बेटियां और बेटे सब सुखी रहें और माता-पिता को जीवन में किसी भी किस्म का तनाव न झेलना पड़े। आओ इसके लिए हम सब हल ढूंढें। लेकिन यह भी सच है कि जब सोशल मीडिया पर दर्दनाक घटनाएं वायरल होने लगीं या फिर मीडिया की सुर्खियां बनने लगीं, तो सोचो उन माता-पिता पर क्या गुजरती होगी जिन्होंने अपनी बेटियों को खो दिया। ऐसे समाज को बदल डालना होगा। आज के सभ्य समाज में आखिरकार गलती किसकी है? दहेज लेना और देना दोनों ही पाप है, इस दृष्टि से भारत की युवा पीढ़ी यानि कि बेटियां और बेटे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। माता-पिता अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर और शिक्षित बनाना चाहते हैं ताकि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई जा सके। वहीं बेटों के परिवारोंं को भी सबके आत्मसम्मान के लिए आवाज उठानी चाहिए। दहेज रोकने के लिए कानून का प्रभाव तभी सख्ती से लागू हो सकता है जब युवा वर्ग दहेज विरोधी अभियान को एक मिशन की तरह चलाए। इन दु:खद घटनाओं से हमें यही सीख मिलती है कि केवल कानून नहीं सोच बदलना भी जरूरी है।
इस कड़ी में मेरा यह मानना है कि परिवारों के लिए सबसे बड़ी जिम्मेवारी यह होनी चाहिए कि बेटों को बचपन से ही महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाए। विवाह कोई व्यापार नहीं बल्कि दो परिवारों और दो व्यक्तियों के बीच रिश्तों का सम्मान और विश्वास का मजबूत संबंध है। अगर समाज दहेज के मामले में चुप रहकर किसी भी घटना को देखता है या अपनी सामाजिक इज्जत के डर से बेटियों की पीड़ा को छुपा लेता है तो उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए।
अगर आपको लगता है कि आपके पास समाधान है तो हमें तीन से चार मिनट का वीडियो बनाकर या अपनी बात लिखकर प्रेषित कर सकते हैं। अगर लिखकर भेजना है तो आपके शब्द अधिकतम 100 से 125 होने चाहिएं। सुझाव देश के बेटे-बेटियां या बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि कोई भी पाठक प्रेषित कर सकता है। कृपया किसी का नाम लिख कर कोई उदाहरण न दें। हल ढूंढने के लिए हमारी यह छोटी सी पहल है जो हमें एक निश्चित और स्थाई समाधान की ओर जरूर ले जाएगी, ऐसा विश्वास है। विचार यहां भेज सकते हैं।
दैनिक पंजाब केसरी
बदलता समाज-आओ हल ढूंढें
प्रेस कॉम्पलेक्स नं. 2, नियर एनएसपी डीटीसी डिपो, वजीरपुर दिल्ली
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या फिर निम्नलिखित नम्बरों पर वीडियो भेज सकते हैं, जो कि 3 से 4 मिनट के बीच होनी चाहिए।
मोबाइल नं.-9811030309, 9871598497
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यह एक कड़वा सच है कि आज भी बेटियां दहेज दानव की ज्वाला में धूं-धूं कर जल रही हैं। बात पिछले दिनों दहेज हत्याओं का शिकार हुई बेटियों से जुड़ी घटनाएं की है। बेटियों या बहुओं को किसी भी किस्म के मानसिक दबाव और तनाव के द्वंद्व के चलते आत्महत्या करनी पड़े या फिर कोई बेटी रेप का शिकार हो जाए या फिर कोई बेटा ससुराल से तंग आकर या अपनी पत्नी से दुखी होकर आत्महत्या कर लें और उसे इंसाफ न मिले तो इसे क्या कहेंगे? आखिरकार इसका समाधान क्या है? क्योंकि मैं बुजुर्गों के लिए, उनके सम्मान के…


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