कहते हैं कि समुद्र की गहराई को कोई माप नहीं सकता, बस उसकी शीतलता और प्रवाह को महसूस किया जा सकता है। कुछ वैसा ही अनुभव मेरे जीवन में तब हुआ जब मुझे अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काम करने का अवसर मिला। उनके सान्निध्य में रह कर यह महसूस होता था कि आप किसी साधारण राजनेता के नहीं, बल्कि एक ऐसे युगपुरुष के सामने हैं, जिनमें सौम्यता, स्नेह, विनोद, दृढ़ता और राष्ट्रभक्ति, सब एक साथ प्रवाहित होते हैं। वे जितने कोमल हृदय के कवि थे, उतने ही अडिग और निर्णायक राष्ट्रनायक।
देशहित की बात आती तो उनके भीतर का कवि योद्धा में बदल जाता था। पोखरण परमाणु परीक्षण इसका जीवंत उदाहरण है। अंतर्राष्ट्रीय दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों की आशंका और वैश्विक आलोचनाओं की परवाह किए बिना उन्होंने देश के स्वाभिमान और सुरक्षा को सर्वोपरि रखा। उस निर्णय में न तो दिखावा था, न ही आवेश, बल्कि एक शांत, पर अटल संकल्प था। यही अटलता उन्हें “अटल” बनाती थी।
मेरा यह सौभाग्य रहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री रहते हुए मुझे उनके साथ लंबे समय तक काम करने का अवसर मिला। यात्राओं, बैठकों और अनौपचारिक संवादों में उन्हें नजदीक से देखने-समझने का अवसर मिला। एक बार विमान यात्रा के दौरान उनसे हल्की-फुल्की बातचीत हुई। उन्होंने हंसते हुए बताया कि वे खाने के बड़े शौकीन हैं,वेज और नॉनवेज दोनों। चांदनी चौक की चाट के तो वे विशेष प्रशंसक थे। एक बार मैंने उनसे पूछा,“आपने विवाह क्यों नहीं किया?” मुस्कराकर बोले,“समय ही नहीं मिला।”
अटल जी के व्यक्तित्व में एक सहज फक्कड़पन था, जो उन्हें बाकी नेताओं से अलग करता था। प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार मैंने उनसे पूछा,“आप क्या चीज़ मिस करते हैं ?” उन्होंने बिना सोचे जवाब दिया,“फक्कड़पन।” सत्ता से उन्हें कोई मोह नहीं था। 1996 में जब उनकी सरकार मात्र 13 दिनों में गिर गई तब उन्होंने सत्ता से चिपकने का प्रयास नहीं किया। बल्कि संसद में खड़े होकर आत्मविश्वास से कहा,“हम फिर लौटेंगे।” और वे लौटे भी पूरे जनादेश के साथ। उसके बाद पांच वर्षों तक उन्होंने स्थिर, सशक्त और सुशासन देने वाली सरकार चलाई, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है।
प्रधानमंत्री के रूप में मैंने उन्हें सदैव धैर्यशील, संयमी और सहज मुस्कान से युक्त पाया। कठिन से कठिन निर्णयों के क्षणों में भी वे कभी भावनाओं में नहीं बहते थे, बल्कि परिस्थितियों का ठंडे मन से मूल्यांकन कर राष्ट्रहित में निर्णय लेते थे। संसद पर हमले का दिन आज भी स्मृतियों में अंकित है। जब मैंने उन्हें उस भयावह घटना की सूचना दी तो वे तनिक भी विचलित नहीं हुए, बल्कि पूरे संयम और गंभीरता के साथ स्थिति को संभालने में जुट गए। पाकिस्तान के साथ शांति की पहल करते समय वे संभावित खतरों से भली-भांति अवगत थे, फिर भी उन्होंने साहस और उदारता के साथ संवाद का मार्ग चुना। दिल्ली–लाहौर बस सेवा और लाहौर घोषणापत्र उनकी इसी दूरदर्शी और मानवतावादी सोच के प्रतीक बने।
पोखरण परमाणु परीक्षण अटल जी की अडिग दृढ़ता और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता का सर्वोच्च उदाहरण है। 1998 में भारत द्वारा किए गए इस परीक्षण ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसके बाद आर्थिक प्रतिबंध लगे, अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ा, किंतु इन सबके बावजूद विश्व में भारत की प्रतिष्ठा सुदृढ़ हुई। यह निर्णय न केवल साहसिक था, बल्कि भारत को सामरिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हुआ। उनके कार्यकाल में देश ने विकास के अनेक नए अध्याय देखे। टेलिकॉम क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात हुआ, ट्राई की सिफारिशों के प्रभावी कार्यान्वयन, स्पेक्ट्रम के पारदर्शी आवंटन और त्वरित निर्णयों ने मोबाइल क्रांति की मजबूत नींव रखी। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के माध्यम से देश के प्रमुख शहरों को आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ा गया, जबकि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना ने गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा। वर्ष 2001 में प्रारंभ किया गया सर्व शिक्षा अभियान बुनियादी शिक्षा के सार्वभौमिक लक्ष्य की दिशा में एक ऐतिहासिक और दूरगामी पहल सिद्ध हुआ।
वाजपेयी जी वास्तव में राजनीति के “अजातशत्रु” थे, जिनका कोई स्थायी शत्रु नहीं रहा। विपक्षी दलों के नेता भी उनके व्यक्तित्व के प्रशंसक थे। संसद में अक्सर यह सुनने को मिलता,“अटल जी अच्छे आदमी हैं, बस गलत पार्टी में हैं।” जब वे बोलते थे, तो पूरा सदन ‘पिन ड्रॉप साइलेंस’ में बदल जाता था। उनकी वाणी में आक्रोश नहीं, तर्क था,’ कटुता नहीं, संवेदना थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनके पहले संसदीय भाषण के बाद ही भविष्यवाणी कर दी थी, “यह युवक एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।” समय ने इस भविष्यवाणी को अक्षरशः सत्य सिद्ध किया।
गठबंधन की राजनीति को मर्यादा और गरिमा के साथ निभाने की कला देश ने उनसे ही सीखी। एनडीए का गठन उनके नेतृत्व में हुआ, जिसमें वैचारिक रूप से भिन्न दलों को भी साथ लेकर चला गया। सबको साथ लेकर चलने की क्षमता, संवाद की शक्ति और आपसी सम्मान का भाव—ये गुण वाजपेयी जी को विशिष्ट बनाते थे। उन्होंने “रिमोट कंट्रोल” की राजनीति की संस्कृति को समाप्त कर सहयोग और सहमति पर आधारित राजनीतिक परंपरा की नींव रखी। उनका व्यवहार कभी पद, प्रतिष्ठा या व्यक्ति की ऊंच-नीच से प्रभावित नहीं हुआ। छोटा कार्यकर्ता हो या देश का राष्ट्रपति, सबके प्रति वही आदर, वही अपनापन। मंत्री बनने से पहले भी जब मैं उन्हें सुझाव भेजता था, वे उन्हें गंभीरता से पढ़ते और प्रतिक्रिया देते थे। एक बार प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर भाषण की तैयारी के दौरान मैंने उन्हें एक कविता दी। उन्होंने उसे अलग रख दिया। मुझे लगा शायद उन्हें पसंद नहीं आई। लेकिन कार्यक्रम से ठीक पहले उन्होंने अपने सचिव से कहा,“गोयल जी की वह कविता लाना।” और वही कविता उन्होंने मंच से पढ़ी। छोटे-बड़े हर व्यक्ति के योगदान को महत्व देना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में था।
अटल जी के जीवन से जुड़ी स्मृतियां असंख्य हैं-कभी मजाकिया प्रसंग, कभी गंभीर राजनीतिक क्षण, कभी कविताओं की पंक्तियां। वे राजनीतिज्ञ, कवि और ओजस्वी वक्ता, तीनों का दुर्लभ संगम थे। उनके बारे में लिखना सचमुच सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। दिल्ली में उनकी समाधि “सदैव अटल” के नाम से जानी जाती है और यह नाम मात्र प्रतीक नहीं, एक सत्य है। वे सदैव अटल रहेंगे, हमारी स्मृतियों में और हमारे हृदयों में भी।
गरिमामयी राजनीति के ‘अटल’ प्रतीक
Summary :
कहते हैं कि समुद्र की गहराई को कोई माप नहीं सकता, बस उसकी शीतलता और प्रवाह को महसूस किया जा सकता है। कुछ वैसा ही अनुभव मेरे जीवन में तब हुआ जब मुझे अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काम करने का अवसर मिला। उनके सान्निध्य में रह कर यह महसूस होता था कि आप किसी साधारण राजनेता के नहीं, बल्कि एक ऐसे युगपुरुष के सामने हैं, जिनमें सौम्यता, स्नेह, विनोद, दृढ़ता और राष्ट्रभक्ति, सब एक साथ प्रवाहित होते हैं। वे जितने कोमल हृदय के कवि थे, उतने ही अडिग और निर्णायक राष्ट्रनायक। देशहित की बात आती तो उनके भीतर का…


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