बिन मोबाइल टावर के आपको लिंक मिलेगा

Summary :

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के नेतृत्व में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने देश को वैश्विक अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है। 1975 में भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट के ऐतिहासिक प्रक्षेपण से लेकर, देश ने पीएसएलवी के ज़रिए लागत-प्रभावी उपग्रह प्रक्षेपणों में अग्रणी भूमिका निभाई है और 400 से अधिक विदेशी उपग्रहों को कक्षा में पहुंचाया है। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक अहम मोड़ 2014 में प्रमुख अंतरिक्ष सुधारों की शुरुआत के साथ आया। सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए खोलने के…

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के नेतृत्व में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने देश को वैश्विक अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है। 1975 में भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट के ऐतिहासिक प्रक्षेपण से लेकर, देश ने पीएसएलवी के ज़रिए लागत-प्रभावी उपग्रह प्रक्षेपणों में अग्रणी भूमिका निभाई है और 400 से अधिक विदेशी उपग्रहों को कक्षा में पहुंचाया है। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक अहम मोड़ 2014 में प्रमुख अंतरिक्ष सुधारों की शुरुआत के साथ आया। सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए खोलने के मकसद से कई नीतिगत बदलाव शुरू किए हैं। ये सुधार क्रांतिकारी बदलाव साबित हुए हैं, जिन्होंने भारत की अंतरिक्ष क्षमता को उजागर किया है और भारत के लिए एक बड़ी छलांग के लिए एक मंच तैयार किया है। इसरो संचार, नेविगेशन, आपदा न्यूनीकरण और संसाधनों की निगरानी के लिए उपग्रहों पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है। कुल मिलाकर प्रयोगों के लिए एक अंतरिक्ष स्टेशन और चंद्रमा पर भारतीयों को उतारने सहित अंतरग्रहीय अन्वेषण के लिए एक प्रवेश द्वार का निर्माण करना एक प्रमुख लक्ष्य है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में भारत की प्रगति, इसरो द्वारा संचालित, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और निजी नवप्रवर्तकों द्वारा समर्थित, तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक एकीकृत राष्ट्रीय प्रयास को दर्शाती है। विश्वस्तरीय अंतरिक्ष प्रणालियों को स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और तैनात करके राष्ट्र न केवल अपनी रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष समुदाय में अपना गौरवपूर्ण स्थान भी मज़बूत कर रहा है, जो आत्मनिर्भर भारत की सच्ची भावना को साकार करता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने बुधवार को ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से इसरो ने ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 मिशन लॉन्च किया। इस मिशन में बाहुबली एलवीएम3-एम6 रॉकेट ने अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेस मोबाइल की ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट को सफलतापूर्वक ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ में स्थापित कर दिया। इसरो की 100 फीसदी सफलता वाली एलवीएम3 सीरीज की छठी उड़ान है जो पहले चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और वनवैब के 72 सैटेलाइट्स लॉन्च कर चुकी है। इसरो की ये कामयाबी इसलिए भी खास है क्योंकि कई और देशों ने इस तरह के अंतरिक्ष मिशन के दौरान तगड़े झटके लगे थे। उन्होंने स्पेस मिशन को लेकर तैयारी तो बहुत की थी लेकिन प्रक्षेपण के समय तगड़ा झटका लगा था। इसमें ब्राजील, जापान, दक्षिण कोरिया के नाम प्रमुख हैं।
बिना मोबाइल टावर के आपको लिंक मिलेगा, यह कोई साधारण सैटेलाइट नहीं है। एक बार जब यह अपनी कक्षा में पहुंच जाएगा तो इसमें लगा एक विशाल एंटीना खुलेगा। ब्लू बर्ड ब्लाक-2 कोई मामूली सैटेलाइट नहीं है, यह लो अर्थ आबिंट यानी लो अर्थ में भेजा जाने वाला अब तक का सबसे बड़ा कमर्शियल कम्युनिकेशंस सैटेलाइट होगा। इसका सबसे खास फीचर इसका एंटीना है। इसमें 223 वर्ग मीटर विशाल एंटीना है। इसमें 223 वर्ग मीटर विशाल ‘फेज्ड एरे’ लगा है, जिसका आकार 2400 स्क्वायर फीट होगा।
आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कितना विशाल होगा। यह कंपनी के पुराने ब्लू बर्ड 1-5 सैटेलाइट्स के मुकाबले साढ़े तीन गुना बड़ा है। कंपनी का दावा है कि इसकी डेटा कैपेसिटी 10 गुना ज्यादा होगी। इसका मकसद दुनिया का पहला स्पेस-बेस्ड सेल्युलर ब्रॉडबैंड नेटवर्क बनाना है। यह सीधे आम लोगों के स्मार्ट फोन्स से कनेक्ट होगा। यानी बिना मोबाइल टावर के आपको नेटवर्क मिलेगा। इसका मुख्य काम मोबाइल फोन को डायरेक्ट ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी देना है, यानी बिना किसी एक्स्ट्रा डिवाइस के स्पेस से ही तेज इंटरनेट, वॉयस और वीडियो कॉलिंग। इससे उन इलाकों में मदद मिलेगी जहां ग्राउंड नेटवर्क कमजोर है या बिल्कुल नहीं है। इस मिशन का सीधा फायदा आम मोबाइल यूजर्स को मिलेगा। यह सैटेलाइट स्पेस से सीधे आपके मोबाइल पर 4जी और 5जी की सुविधा देगा। आप दुनिया के किसी भी कोने में हों, आपको नेटवर्क मिलेगा। इससे वॉयस कॉल और वीडियो कॉल करना आसान हो जाएगा। साथ ही टेक्स्ट मैसेज और स्ट्रीमिंग भी बिना किसी रुकावट के हो सकेगी। यह सैटेलाइट एक ग्लोबल एलईओ कॉन्स्टेलेशन का हिस्सा है जिसका मकसद हर जगह और हर समय कनेक्टिविटी देना है। एनसिल और अमेरिकी कंपनी एएसटी एंड साइंस के बीच यह डील कमर्शियल स्पेस मार्केट में भारत का कद बढ़ाएगी। स्पेस इंडस्ट्री में एएसटी स्पेस मोबाइल बड़ा नाम है। यह कंपनी अब तक अपने कई लॉन्च के लिए एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का इस्तेमाल करती आई है। यह भारत के लिए गर्व की बात है कि दुनिया की सबसे बड़ी और आधुनिक सैटेलाइट तकनीक को अंतरिक्ष तक पहुंचाने के लिए विदेशी कंपनियां भारत के ‘बाहुबली’ रॉकेट एलवीएम3 पर भरोसा कर रही हैं। इसका सफल रिकार्ड 100 प्रतिशत होने के कारण ही अमेरिकी कंपनी ने इस पर भरोसा जताया है। इस लॉन्च के जरिए भारत ग्लोबल स्पेस मार्केट में अपनी पहचान को और मजबूत करेगा। यह मिशन भारत-अमेरिका अंतरिक्ष सहयोग को और मजबूत करेगा। इसरो अब विदेशी कॉमर्शियल सैटेलाइट्स लॉन्च करने के लिए एक विश्वसनीय साझेदार बन चुका है। यह लॉन्च इसरो की कॉमर्शियल क्षमता को बढ़ाएगा और भारत को वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में मजबूत स्थिति प्रदान करेगा।
वनवेब के बाद एएसटी स्पेस मोबाइल दूसरी बड़ी ब्रॉडबैंड कंपनी है जो एलवीएम3 की सवारी कर रही है। इससे पहले इसरो ने वनवेब के 72 सैटेलाइट्स को दो बार में सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। अमेरिकी कंपनी के सीईओ हाबेल एवेलेन का कहना है कि वे स्पेस कनेक्टिविटी में अमेरिका का नेतृत्व दिखाना चाहते हैं लेकिन इसके लिए उन्होंने भारतीय रॉकेट पर भरोसा जताया। यह भारत की ‘हेवी-लिफ्ट’ क्षमता का लोहा मनवाता है। एएसटी स्पेस मोबाइल का प्लान बहुत बड़ा है। कंपनी तेजी से अपने सैटेलाइट्स की संख्या बढ़ा रही है। 2026 की शुरुआत तक 40 सैटेलाइट्स के बराबर हार्डवेयर तैयार हो जाएगा। कंपनी ने 2026 की पहली तिमाही के अंत तक पांच और ऑर्बिटल लॉन्च की योजना बनाई है। हालांकि वे लॉन्च फिलहाल स्पेसएक्स के रॉकेट से होने की उम्मीद है लेकिन इस पहले और सबसे भारी सैटेलाइट की जिम्मेदारी इसरो के कंधों पर है।

Aakash Chopra