‘पिछले सप्ताह समाप्त हुआ तीन सप्ताह का संसद सत्र अनुमान के अनुरूप ही रहा: हंगामा, तीखी नोकझोंक, बार-बार व्यवधान और अंततः स्थगन। आज के दौर में संसदीय कार्यवाही की यह स्थिति लगभग स्थायी हो चुकी है। सत्र के दौरान विपक्ष और सत्तापक्ष आमने-सामने रहे। विपक्ष स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) अभ्यास पर चर्चा की मांग पर अड़ा रहा, जबकि सरकार का कहना था कि यह विषय भारत निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसलिए सरकार के दायरे से बाहर है।
लंबे गतिरोध के बाद मामला तब सुलझा जब, विपक्ष के शब्दों में, सरकार ने एसआईआर पर चर्चा की मांग “मान ली”, हालांकि कुछ शर्तों के साथ। पहली शर्त यह थी कि चर्चा एसआईआर के नाम से नहीं, बल्कि ‘चुनाव सुधारों’ के अंतर्गत होगी। दूसरी यह कि इस बहस से पहले वंदे मातरम् पर चर्चा कराई जाएगी। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है लेकिन वंदे मातरम् पर होने वाली बहस से पहले इसे रखना उचित नहीं होगा।
इस बहस की अगुवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने तुष्टिकरण की राजनीति के दबाव में राष्ट्रीय गीत को “विभाजित करने” पर सहमति जताई। नेहरू को निशाने पर लेते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने जानबूझकर वंदे मातरम् के उन अंतरों को हटाया जिनमें देवी की वंदना की गई थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इससे भी आगे बढ़ते हुए जवाहरलाल नेहरू को सीधे तौर पर राष्ट्रीय गीत को केवल दो अंतरों तक सीमित करने के लिए जिम्मेदार ठहराया और इसे तुष्टिकरण की नीति (जिसे उन्होंने “तुष्टिकरण की नीति” कहा) का परिणाम बताया। बिना किसी लाग-लपेट के अमित शाह ने कहा कि यदि कांग्रेस ने तुष्टिकरण की नीति के तहत वंदे मातरम् को विभाजित न किया होता तो देश का विभाजन नहीं हुआ होता।
विपक्ष ने आरोप लगाया कि भाजपा वंदे मातरम् को केंद्र में इसलिए ला रही है ताकि पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक लाभ साधा जा सके। हालांकि सत्तापक्ष ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया। तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा ने बहस के समय और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में, जब युवाओं में वास्तविक बेरोजगारी 20 प्रतिशत से अधिक है, जब दिल्ली में औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 800 के पार पहुंच चुका है और लोग दम घुटने की स्थिति में हैं, जब भाजपा विपक्ष शासित राज्यों को मनरेगा के धन से वंचित कर रही है और जब सत्र दर सत्र विपक्षी सदस्यों को डराया-धमकाया जाता है तथा राष्ट्रीय मुद्दे उठाने से रोका जाता है, तब इस तरह की बहस कराई जा रही है। उन्होंने वंदे मातरम् को लेकर भाजपा की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाते हुए इसे “खराब ढंग से लिखी गई एक कॉमेडी” करार दिया। इसके बावजूद जो भाषण सबसे अधिक चर्चा में रहा, वह कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी का था।
अपने तीखे और आक्रामक अंदाज में प्रियंका गांधी ने नेहरू पर सत्तापक्ष के लगातार हमलों को लेकर कड़ा पलटवार किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सलाह दी कि वे जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ किए जाने वाले आरोपों और अपमानों की एक सूची बना लें। उन्होंने कहा, चाहे वह संख्या 999 हो या 9,999 एक सूची तैयार कर लीजिए और फिर समय तय कर लीजिए। जैसे वंदे मातरम् पर दस घंटे बहस हो रही है, वैसे ही इस पर भी जितनी देर चाहें, बहस कर लीजिए लेकिन संसद के इस बहुमूल्य समय का उपयोग उस काम के लिए होना चाहिए जिसके लिए जनता ने प्रतिनिधियों को चुना है। एक बार और हमेशा के लिए इस अध्याय को बंद कर देना चाहिए, यह कहते हुए उन्होंने विपक्षी बेंचों की जोरदार तालियां बटोरीं।
उन्होंने आगे कहा, “देश ये सारी शिकायतें सुन लेगा, इंदिरा जी ने क्या किया, राजीव जी ने क्या किया, वंशवाद की राजनीति क्या है, नेहरू की क्या गलतियां रहीं-इन सब पर बात कर लेते हैं और यहीं खत्म कर देते हैं। उसके बाद बेरोजगारी और महंगाई पर चर्चा कर लेंगे लेकिन जो भाषण वास्तव में वायरल हुआ, वह प्रियंका गांधी का था, विषयवस्तु और प्रस्तुति, दोनों के लिहाज़ से। भाषण की सामग्री सशक्त, प्रासंगिक और नपी-तुली थी लेकिन सबसे अधिक सराहना उनकी प्रस्तुति ने बटोरी। प्रियंका गांधी का आकर्षक व्यक्तित्व सर्वविदित है। संसद में उन्होंने अपने व्यवहार और शैली से एक अलग पहचान बनाई है। उनकी मुस्कान सहज है और उनका स्त्रीत्व जो वे स्वाभाविक रूप से व्यक्त करती हैं, पूरी तरह निरस्त्र कर देने वाला है। वे प्रहार करती हैं लेकिन शहद में डूबे तीरों से। यदि उनकी तुलना उनके भाई राहुल गांधी से की जाए तो चमक प्रियंका की ही अधिक दिखाई देती है। वर्तमान सत्र में दोनों ने भाषण दिए लेकिन सुर्खियों में सिर्फ प्रियंका गांधी का वक्तव्य रहा। राहुल गांधी ने क्या कहा या क्या नहीं कहा, इस पर लगभग कोई चर्चा नहीं हुई। हां, इतना अवश्य रहा कि इस बार उन्होंने अपनी पहचान बन चुके टी-शर्ट के बजाय कुर्ता-पायजामा पहना शायद इसलिए कि उनकी शुरुआती टिप्पणी खादी और महात्मा गांधी पर केंद्रित थी, जो चुनाव सुधारों की चर्चा से कुछ हटकर थी। इसलिए तुलना को एक ओर भी रख दें तो भी अपने स्तर पर राहुल गांधी ऐसा एक भी ठोस तर्क या बिंदु नहीं रख पाए जिसे याद रखा जाए, सिवाय ‘वोट चोरी’ और ‘धांधली’ के उनके लगातार दोहराए गए आरोपों के। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसकी उपयोगिता अब समाप्त हो चुकी है और जो आम जनता के बीच कोई खास प्रतिध्वनि नहीं पैदा करता। बिहार के चुनाव परिणाम इसका स्पष्ट प्रमाण हैं, लेकिन चर्चा फिर लौटती है प्रियंका गांधी पर और वंदे मातरम् की बहस के दौरान उनके उस प्रदर्शन पर, जिसे अब “शानदार” कहा जा रहा है। जिस रफ्तार से वे आगे बढ़ रही हैं, उसमें जल्द ही वे अपने भाई राहुल गांधी से भी आगे निकल सकती हैं। यहीं से पारिवारिक राजनीति का प्रश्न सामने आता है। परिवार के भीतर भी यही सोच वर्षों तक प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति से दूर रखे रही। राहुल गांधी के राजनीति में स्थापित होने के बाद ही उन्होंने, अपने भाई के संसद में प्रवेश के लगभग बीस वर्ष बाद पहला चुनाव लड़ा और एक वर्ष से भी कम समय में उन्होंने वह दूरी बड़ी सहजता से तय कर ली, जो उनके भाई दो दशकों में भी तय नहीं कर पाए।
यहीं से असली सवाल खड़ा होता है। क्या उनसे भी यही अपेक्षा की जाएगी कि वे पीछे रहें और अपने भाई को आगे बढ़ने दें, जिन्हें उनके समर्थक ‘प्रधानमंत्री पद का दावेदार’ मानकर पेश कर रहे हैं? क्या उन्हें भी किनारे किया जाएगा और उनका राजनीतिक भविष्य राहुल गांधी के लिए दांव पर लगा दिया जाएगा? और क्या उनका हश्र भी 2004 की युवा ब्रिगेड के उन होनहार नेताओं जैसा होगा, जिनकी चमक समय से पहले फीकी पड़ गई ? इसका जवाब तो समय ही देगा लेकिन यदि ऐसा हुआ तो इसकी कीमत पार्टी को चुकानी पड़ेगी, एक ऐसी पार्टी को, जिसे मौजूदा संकट से उबारने के लिए प्रतिभाशाली और भरोसेमंद नेतृत्व की सख्त जरूरत है। फिलहाल कांग्रेस को राजनीतिक पुनर्जीवन के लिए एक नहीं, एक से कहीं अधिक राहुल गांधी जैसे चेहरों की आवश्यकता है।
प्रियंका का डंका
Summary :
‘पिछले सप्ताह समाप्त हुआ तीन सप्ताह का संसद सत्र अनुमान के अनुरूप ही रहा: हंगामा, तीखी नोकझोंक, बार-बार व्यवधान और अंततः स्थगन। आज के दौर में संसदीय कार्यवाही की यह स्थिति लगभग स्थायी हो चुकी है। सत्र के दौरान विपक्ष और सत्तापक्ष आमने-सामने रहे। विपक्ष स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) अभ्यास पर चर्चा की मांग पर अड़ा रहा, जबकि सरकार का कहना था कि यह विषय भारत निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसलिए सरकार के दायरे से बाहर है। लंबे गतिरोध के बाद मामला तब सुलझा जब, विपक्ष के शब्दों में, सरकार ने एसआईआर पर चर्चा की…


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