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अम्बेडकर का दर्शन और भारत

वर्तमान भारत के इतिहास से यदि हम आधुनिक युग के किसी भी चिन्तक द्वारा देश के उत्थान में किये गये योगदान को युवा पीढ़ी की आंखों से औझल रखने का कोई भी प्रयास प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भी करते हैं तो राष्ट्रहित के विरुद्ध तो समझा ही जायेगा

वर्तमान भारत के इतिहास से यदि हम आधुनिक युग के किसी भी चिन्तक द्वारा देश के उत्थान में किये गये योगदान को युवा पीढ़ी की आंखों से औझल रखने का कोई भी प्रयास प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भी करते हैं तो राष्ट्रहित के विरुद्ध तो समझा ही जायेगा बल्कि आने वाली पीढि़यों को अज्ञानी बनाये रखने की साजिश के रूप में भी देखा जायेगा। हमारे विश्वविद्यालय ज्ञान के भंडार होते हैं। इनमें पढ़ने वाले युवक-युवती ही भविष्य के भारत की तस्वीर बनाते हैं, यदि इन्हें हम एक पक्षीय इतिहास या दर्शन पढ़ायेंगे तो भारत किसी भी सूरत में वैश्विक प्रतियोगिता में बहुत पीछे छूट जायेगा। महात्मा गांधी और डा. भीमराव अम्बेडकर भारत के एेसे दो मनीषी दर्शन शास्त्री हुए हैं जिन्होंने भारतीय समाज को न केवल राजनैतिक रूप से दासता से मुक्त कराने में अपना सर्वस्व होम किया बल्कि पूरे भारतीय समाज के भीतर की दासता परक और गुलाम परस्ती की मानसिकता पर हर दृष्टि से करारी चोट की और भारतीयों को उनके नागरिक अधिकारों के प्रति सचेत किया। डा. अम्बेडकर का नाम इस मामले में विशिष्ट स्थान रखता है क्योंकि हिन्दू समाज के भीतर मौजूद जातिगत ताने-बाने की वजह से शूद्र कहे जाने वाले नागरिकों में जागरण का मन्त्र फूंका और उन्हें अपने मानवीय अधिकारों के प्रति सचेत किया एवं मनुष्य को जानवर से भी बदतर समझने की हिन्दू धार्मिक परंपराओं को चुनौती दी और स्थापित किया कि एक विशेष वर्ग ने अपनी सत्ता व आर्थिक हितों के पोषण के लिए ही शूद्रों को पशुओं से भी बदतर तरीके से रहने के लिए हजारों वर्षों तक मजबूर किया। 
डा. अम्बेडकर इतने गंभीर व शोधी चिन्तक थे कि उन्होंने हिन्दू धर्म के लोगों के बीच फैली जाति व्यवस्था का धार्मिक व एेतिहासिक दृष्टि से अध्ययन करते हुए इसे सकल समाज के समग्र विकास के साथ जोड़ा। यदि उनके दर्शन को ही दिल्ली विश्वविद्यालय का दर्शनशास्त्र विभाग स्नातक परीधारियों के पाठ्यक्रम से बाहर करने के बारे में सोचने का काम करता है तो इसे सिर्फ हमारे विद्वानों का दिमागी दिवालियापन ही कहा जा सकता है। यदि भारत की युवा पीढ़ी को हम यह ही नहीं बतायेंगे कि आधुनिक भारत के समाज में जो द्वन्द चल रहे हैं उनके मूल कारण क्या रहे हैं और इनकी वजह से उपजी राजनीति का समूचे राजनैतिक तन्त्र पर क्या प्रभाव पड़ा है तो हम वास्तविकता से आंखें मूंदने का काम ही करेंगे। गांधी यदि इस देश की आत्मा हैं तो डा. अम्बेकर शरीर में बहता हुआ लहू हैं। उन्होंने हमारे समाज को जब आइना दिखाया और शूद्रों के मानवीय अधिकारों के लिए संघर्ष किया और इसके लिए ऐशो- आराम की बड़ौदा महाराज की नौकरी छोड़कर हाथों में कलम पकड़ने से लेकर सड़कों पर प्रदर्शन आदि तक किये तो गुलाम भारत में अंग्रेजों की सत्ता और भी ज्यादा डगमग होने लगी। 
डा. अम्बेडकर व्यावहारिक व मानसिक तथा चिन्तन की दृष्टि से सच्चे दार्शनिक थे। इसीलिए वह अपने समय के हर नेता से बहुत आगे थे। केवल गांधी ही उनकी प्रतिभा को समझते थे, इसी वजह से उन्होंने 1931 से 1936 तक पूरे भारत में अछूत व्यवस्था को समाप्त करने के लिए जन आन्दोलन चलाये। मगर अम्बेडकर भारतीय हिन्दू समाज में शूद्रों के प्रति स्थापित मानसिकता को जड़ से ही समाप्त कर देना चाहते थे और मानव- मानव के बीच जन्म के आधार पर ऊंचे-नीचे की गणना करने वाले इस धर्म की रीतियों और नीतियों को अपनी वैज्ञानिक दृष्टि से मानवता विरोधी सिद्ध कर देना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने तीस के दशक में मनुस्मृति की प्रतियां सार्वजनिक रूप से जलाई  क्योंकि यही पुस्तक हिन्दुओं में वर्ण व्यवस्था के तहत शूद्रों के साथ पशुवत व्यवहार करने की ताकीद करती थी। दार्शनिक विद्रोही भी होता है क्योंकि वह स्थापित मान्यताओं को अर्थहीन साबित करता है। बाबा साहेब ने जब अपनी यह पुस्तक लिखी कि ‘शूद्र कौन थे’? तो खुद को धर्म का मठाधीश कहलाने वालों की गद्दियां हिल गईं। वह यही नहीं ठहरे उन्होंने हिन्दू समाज में शूद्रों को अछूत मानने की परंपरा पर भी शोध किया और अपनी पुस्तक  ‘दि अनटचेबिलिटी’ में धार्मिक महन्तों के होश उड़ा दिये।
उन्होंने भारत में जाति प्रथा व जाति प्रथा का उन्मूलन जैसी पुस्तकें लिख कर भारत के हिन्दू समाज की पोंगापंथी ताकतों के मुंह से नकाब उठाने का काम किया और जब उन्होंने ‘बुद्ध व कार्ल मार्क्स’ पुस्तक लिखी तो पूरी दुनिया के राजनैतिक चिन्तकों को ही भारत के महान दर्शन के गांभीर्य व सामाजिक- राजनैतिक सम्बन्धों व सन्दर्भों के बारे में विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ। क्योंकि इससे पहले कार्ल मार्क्स की तुलना इस तरह करने की किसी ने हिम्मत नहीं की थी। यह पढ़कर कुछ सान्त्वना जरूर मिली है कि दिल्ली विश्वविद्यालय  की विद्वत परिषद ने फिलहाल डा. अम्बेडकर को बीएस के पाठ्यक्रम में ही रहने देने पर सहमति दी है परन्तु ऐसे विचार किस तरह और क्यों कुछ लोगों के दिमाग में आते हैं। यह शोध का विषय जरूर है क्योंकि विद्यार्थियों को अपने इतिहास के बारे में जानने का पूरा अधिकार होता है चाहे वह मुगलकाल हो या आधुनिक काल।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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