अमेरिका में भारतीय निशाने पर

Summary :

अमेरिका भारतीयों के लिए असुरक्षित होता जा रहा है। ट्रम्प प्रशासन भारत विरोधी नीतियां तो लागू कर ही रहे हैं लेकिन वहां भारतीयों को नस्लीय आधार पर भी निशाना बनाया जा रहा है। हाल ही में लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं जिससे पता चलता है कि वहां नस्लवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं। अमेरिका में नस्लवाद का लम्बा इतिहास रहा है। कभी वहां अश्वेतों को मार दिया जाता है तो कभी एशियाई लोगों पर अत्याचार किए जाते हैं। नस्लीय भेदभाव पर आधारित पुलिस की क्रूरता के भयावह रूप कई बार सामने आ चुके हैं। कुछ दिन पहले अमेरिकी डिपार्टमैंट…

अमेरिका भारतीयों के लिए असुरक्षित होता जा रहा है। ट्रम्प प्रशासन भारत विरोधी नीतियां तो लागू कर ही रहे हैं लेकिन वहां भारतीयों को नस्लीय आधार पर भी निशाना बनाया जा रहा है। हाल ही में लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं जिससे पता चलता है कि वहां नस्लवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं। अमेरिका में नस्लवाद का लम्बा इतिहास रहा है। कभी वहां अश्वेतों को मार दिया जाता है तो कभी एशियाई लोगों पर अत्याचार किए जाते हैं। नस्लीय भेदभाव पर आधारित पुलिस की क्रूरता के भयावह रूप कई बार सामने आ चुके हैं। कुछ दिन पहले अमेरिकी डिपार्टमैंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने ‘‘मिस्टर सिंह” को निशाना बनाते हुए सोशल मीडिया पर एक विज्ञापन पोस्ट किया था। इस विज्ञापन में अमेरिका में बिना लाइसैंस वाले कमर्शियल ड्राइवरों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के चलते एक दाढ़ी वाले व्यक्ति की तस्वीर लगाई गई थी और चेतावनी वाला संदेश लिखा था कि हमारी सड़कों से दफा हो जाओ। तुम्हें गाड़ी चलाना नहीं आता ‘‘मिस्टर सिंह’’। यह धमकी भी दी गई थी कि तुम खुद देश छोड़ कर चले जाओ या अंजाम भुगतो।
अमेरिका दुनिया भर में दूसरे देशों को मानवता, मौलिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता जैसे न जाने कितने शब्दों से उपदेश देता रहता है लेकिन वहां का प्रशासन भारतीयों से रंग और धर्म या उपनाम के आधार पर भेदभाव करता रहा है। एक दौर था जब अमेरिका में श्वेत स्टेलर सोसायटी का दबदबा हुआ करता था। उपनिवेशवाद के दौर में नस्लवाद अमेरिका में एक बड़ा मुद्दा हुआ करता था। इसका सबसे अधिक असर मूल अमेरिकियों, एशियाई अमेरिकियों, अफ्रीकी अमेरिकियों के अलावा लेटिन अमेरिकियों पर भी पड़ा। उनके लिए अमेरिका में एक अलग समाज था। उनके लिए अपने ही देश में हर चीज अलग थी। इस समाज में अश्वेत गुलाम होते थे। ये भेदभाव रोजगार पाने से लेकर शिक्षा हासिल करने और घर बनाने तक में दिखाई देता था। इसको लेकर अमेरिका में समय-समय पर आंदोलन भी हुए।
अमेरिका के ​िहन्दू-सिख संगठनों आैर डेमोक्रेट नेताओं ने जब मिस्टर सिंह के विज्ञापन का विरोध ​िकया तो विभाग ने ​पोस्ट को हटा लिया। अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन अप्रवासन कानूनों को सख्ती से लागू कर रहा है और खतरनाक तरीके से वाहन चलाने वालों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। यह भी वास्तविकता है कि प्रवासी भारतीय ड्राइवरों की लापरवाही आैर आपरा​िधक व्यवहार के कारण हादसे हुए हैं। उनके ​िखलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए लेकिन धर्म या उपनाम के आधार पर नस्लवादी टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए। एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि अमेरिका में​ पिछले वर्षों से लगभग सभी भारतीयों को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। भेदभाव करने वाले आमतौर पर श्वेत लोग हैं। सोशल मीडिया पर भारतीयों के खिलाफ टिप्पणियां तेजी से बढ़ी हैं। इंटरनेट पर भारतीयों को नौकरी चुराने वाला या बाहरी बताया जा रहा है। कुुछ ऐसे वीडियोज भी सामने आए जिनमें भारतीय जोड़ों को सार्वजनिक रूप से देश छोड़ने की धमकियां दी गई हैं। एच-1बी वीजा और अप्रवासी नीतियों को लेकर होने वाली राजनीतिक बहसों के दौरान कई बार भारतीय प्रवासियों को निशाना बनाया जाता है। ट्रम्प प्रशसन एच-1 बी वीजा को लेकर बड़ा बदलाव करने जा रहा है।
बदलाव यह है कि एच-1बी वीजा पर अमेरिका में नौकरी करने वाले विदेशियों को नौकरी जाने के बाद नई नौकरी ढूंढने के लिए 60 दिन का समय नहीं मिलेगा। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो नौकरी जाने के बाद विदेशियों को तुरन्त अमेरिका छोड़ना होगा। इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय टेक कर्मचारियों पर पड़ेगा। अमेरिका में 2016 में 60 दिन के ग्रेस पीरियड की शुरूआत हुई थी। इसका मकसद हाई स्किल विदेशी कर्मचारियों को नौकरी बदलने के लिए ज्यादा स्थिरता और सुविधा देना था। इससे कम्पनियों के लिए भी ​िवदेशी कर्मचारियों को ​िनयुक्त करना और उनके ट्रांजिशन को आसान बनाना सम्भव हुआ था। एच-1बी वीजा अमेरिकी टेक इंडस्ट्री के लिए अहम है। भारत और चीन से बड़ी संख्या में कर्मचारी अमेरिका जाते हैं। इनमें भारतीयों की संख्या काफी ज्यादा है। टीसीएस, इन्फोसिस और एचसीएल टेक जैसी कंपनियां एच-1बी वीजा स्पॉन्सर करती हैं। एलटीआईमाइंडट्री भी इनमें शामिल है। डेलॉयट, पीडब्ल्यूसी और अर्नस्ट एंड यंग भी बड़े स्पॉन्सर हैं। नया नियम लागू हुआ तो भारतीय कर्मचारियों की मुश्किल बढ़ सकती है। नौकरी जाने के बाद नई कंपनी तलाशना कठिन होगा। कम समय में नया स्पॉन्सर ढूंढना होगा। यह ट्रंप प्रशासन का नया कदम है। प्रशासन कानूनी प्रवास के नियम सख्त कर रहा है। जनवरी 2025 में ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बने थे। इसके बाद कई इमिग्रेशन नियम बदले गए हैं। कुशल विदेशी कर्मचारियों से जुड़े वीजा शुल्क भी बढ़ाए गए हैं। सरकार का कहना है कि कंपनियों को अमेरिकी कर्मचारियों को मौका देना चाहिए। प्रभावित पदों पर समान योग्यता वाले अमेरिकी कर्मचारियों को रखा जा सकता है।
प्रवासी भारतीयों ने अमेरिका के कानूनों का पालन करते हुए मेहनत से वहां की समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया। व्यापार उद्योग, मेडिकल क्षेत्र आैर कई अन्य क्षेत्रों में भारतीयों ने अपनी मेहनत से ऊंचा मुकाम हासिल किया है। ट्रम्प प्रशासन प्रवासी भारतीयों को अपमानित करने में लगा हुआ है। अगर कुशल पेशेवर भारतीय अमेरिका से निकाल दिए गए तो इसका खामियाजा खुद अमेरिका को ही भुगतना पड़ सकता है। अमे​िरका प्रथम के नारे को सार्थक बनाने के लिए ट्रम्प के प्रयासों को गलत नहीं ठहराया जा सकता लेकिन भारतीय समुदाय के साथ भेदभावपूर्ण नीतियों को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। ट्रम्प प्रशासन को अपनी नीतियों पर गौर करना होगा।

Aditya Chopra

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