मां-बाप की सम्पत्ति और संतान

Summary :

आज हमारे समाज में एक चिंता बढ़ती जा रही है। कई बार माता-पिता आैर बच्चों के बीच प्यार से ज्यादा सम्पत्ति का सवाल बड़ा हो जाता है। माता-पिता अपनी पूरी जिन्दगी बच्चों के भविष्य के लिए लगा देते हैं, अपनी जरूरतें रोकते हैं, बच्चों की पढ़ाई, घर, शादी और सुख के लिए मेहनत करते हैं लेकिन जब वही माता-पिता उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचते हैं जब उन्हें सबसे ज्यादा समय और सम्मान तथा सहारे की जरूरत होती है, तब कभी-कभी सवाल उठता है मुझे क्या मिलेगा? उनके लिए माता-पिता की सम्पत्ति विरासत हो सकती है लेकिन माता-पिता स्वयं विरासत…

आज हमारे समाज में एक चिंता बढ़ती जा रही है। कई बार माता-पिता आैर बच्चों के बीच प्यार से ज्यादा सम्पत्ति का सवाल बड़ा हो जाता है। माता-पिता अपनी पूरी जिन्दगी बच्चों के भविष्य के लिए लगा देते हैं, अपनी जरूरतें रोकते हैं, बच्चों की पढ़ाई, घर, शादी और सुख के लिए मेहनत करते हैं लेकिन जब वही माता-पिता उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचते हैं जब उन्हें सबसे ज्यादा समय और सम्मान तथा सहारे की जरूरत होती है, तब कभी-कभी सवाल उठता है मुझे क्या मिलेगा? उनके लिए माता-पिता की सम्पत्ति विरासत हो सकती है लेकिन माता-पिता स्वयं विरासत नहीं हैं। माता-पिता को अपनी सम्पत्ति बच्चों को देने में खुशी होती है लेकिन उन्हें यह भी अधिकार है कि वह अपनी सम्पत्ति का निर्णय अपने जीवन की सुरक्षा और जरूरतों को ध्यान में रखकर करें। ऐसे में कई सम्पत्ति विवाद आैर केस कोर्ट में चल पड़ते हैं।
यह सच है कि देश में लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में करोड़ों केस लगभग दो-दो दशकों से चल रहे हैं। न्याय प्रणाली पर काम करने वाले एक रिसर्च ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार कम से कम डेढ़ करोड़ से ज्यादा केस मां-बाप व औलाद तथा अन्य ​िरश्तेदारों के बीच प्रोपर्टी विवाद से जुड़े हैं। कहीं लोन के नाम पर नकदी लेना तथा बाद में रकम वापस न लौटाने से जुड़े केस हैं तो कहीं पोतों ने दादा की जमीन व प्रोपर्टी में अपना हक जताते हुए माता-पिता के खिलाफ केस दायर कर रखा है, कहीं तलाक होने के बावजूद पत्नी को तय मुआवजा न देेने से जुड़े केस हैं तो कहीं बच्चों ने मां-बाप की प्रोपर्टी अपने नाम धोखे से करवा ली है।
ऐसे केसों का समाधान होगा? यह मामला चिन्तनीय तो है ही लेकिन उससे भी दुखदायी बात यह है कि बच्चे अपने माता-पिता को गारंटर बना कर लोन ले रहे हैं और अपनी फर्म को घाटे में दिखाकर यह धन वापस नहीं कर रहे हैं, लिहाजा मां-बाप के खिलाफ बैंक अब केस कर रहे हैं। इन बातों को देख कर यही सवाल पैदा हो रहा है कि आखिर रिश्ते कहां चले गए। माता-पिता व बच्चों का रिश्ता संस्कारों की पटरी से उतर कर लोभ के फास्ट ट्रैक पर कैसे पहुंच गया? स्वार्थ और अपनी सुख-सुविधाओं के चक्कर में रिश्तों की यह दरार गहरी खाई कैसे बन गई यह, सवाल बड़े भयावह हैं। श्रीराम आैर कृष्ण तथा श्रवण कुुमार जैसे पुत्रों वाले आैर अपने माता-पिता की सेवाओं के लिए प्रसिद्ध भारत देश से यह संस्कार आैर ​िरश्ते क्यों टूट रहे हैं, इसका जवाब और फैसले देश की अदालतों में होने लगे तो इसे क्या कहेंगे?
ताजा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचे एक केस का है जहां बेटे ने इस बात पर मां-बाप के ​खिलाफ प्रोपर्टी में हकदारी का केस इसलिए दर्ज कर दिया है कि माता-पिता ने उसे अपनी प्रोपर्टी से बेदखल कर दिया था। माता-पिता से बेटे और उसकी बहू ने अनुरोध किया कि हमें पहली मंजिल पर रहने की अनुमति दी जाए। मां-बाप ने इजाजत दे दी। इसके बाद बेटे व बहू ने माता-पिता पर दबाव बनाया कि पहली मंजिल हमारे नाम कर दो। सुप्रीम कोर्ट में दर्ज इस केस के अनुसार बेटे ने फर्जी दस्तावेजों के दम पर इस प्रोपर्टी पर मालिकाना हक भी जता दिया तो इस पर मां-बाप ने उसे अपनी प्रोपर्टी से बेदखल करते हुए नोटिस जारी करवाया।
इसके बाद उसे घर खाली करवाने का नोटिस दिया गया तो बेटा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इस सम्पत्ति विवाद पर जस्टिस सतीश चंद शर्मा ने बेटे को मां-बाप के संवेदनशील रिश्ते की अहमियत याद दिलाई। योग्य जज ने बेटे से कहा कि जो आप कर रहे हैं वह पाप है और बेटे को मां के पैर छूकर माफी मांगनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस केस में माता-पिता ने जो किया वह सही है और बेटा दोषी है। बेटे की याचिका खा​रिज कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि ‘‘माता-पिता प्रोपर्टी के मालिक हैं और बेटा तो ​िसर्फ लाइसैंसी है, लिहाजा यह केस खारिज किया जाता है।’’ यह छोटा सा उदाहरण पांच दिन पुराना है लेकिन निचली अदालतों में ऐसे केसों व शिकायतों की संख्या लाखों में है और हाईकोर्ट, सेशन कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में भी यही स्थिति है। मां-बाप को अपनी प्रोपर्टी पर अपने हक के लिए अपने ही बच्चों से जूझना पड़ रहा है, आखिरकार ये रिश्ते इस कदर तार-तार कैसे हो गए। मेरा स्टैंड यही है कि बच्चों में संस्कार जगाने वाले दादा-दादी, नाना-नानी आजकल कहां हैं? कुछ प्रतिशत को छोड़ दिया जाए तो जेन-जी यानि नई पीढ़ी अपनी जिन्दगी अपने ढंग से जीने की चाह में आगे बढ़ रह​ी है मगर नैतिकता और संस्कार पीछे छूट रहे हैं।
सीनियर सिटीजन यानि माता-पिता को बुढ़ापे में अकेले छोड़ देने की घटनाएं बहुत ज्यादा हैं और कोर्टों में केसों की संख्या इससे भी ज्यादा है लेकिन दुःख इस बात का है कि हम अपनी जड़ों को भूल रहे हैं। आज जमाना मोबाइल व रील से जुड़ चुका है और नई पीढ़ी सब कुछ अपने दम पर प्राप्त करना चाहती है और खुद को महान समझने वाली नई पीढ़ी को नई दुनिया के बीच समझाने वाले दादा-दादी की कोई जगह नहीं रह गई। पहले घरों में तीन-तीन बहुएं रहती थी। बच्चों में बड़े होने पर चाचा-चाची, ताया-ताई के रिश्ते स्थापित हो जाते थे, पर अब अकेले रह कर सुख भोगने की औलाद की चाहत एक फैशन बन गई है और संस्कार खत्म हो रहे हैं। हालत यह है कि जो चीजें बच्चों को खुद सीखनी चाहिए वह सब अदालतें सिखाने लगी हैं। मिलकर पर्व मनाना, मां-बाप के पैर छूना, यह काम संतान को फर्ज और संस्कार के तौर पर निभाना चाहिए। जब मां-बाप अपने बुजुर्ग माता-पिता की इज्जत नहीं करेंगे तो आपके बच्चे भी आगे चलकर आपको नजरअंदाज करेंगे। जो आप बोएंगे आगे चलकर वही काटना पड़ेगा।
माता-पिता को भगवान की तरह पूजे जाने वाले वेद-पुराणों की कथाएं सुनने-सुनाने की परम्पराएं खत्म हो गई हैं। घरों में संस्कार बचाने व नैतिकता को ध्यान में लाते हुए स्कूलों में जमीनी स्तर पर मां-बाप व पारिवारिक रिश्तों को पाठ्यक्रम में शामिल करना जरूरी है, यह काम सरकार का है और अनुरोध है कि वह ऐसा जरूर करें लेकिन मेरा मानना है कि शुरुआत तो हमें खुद ही करनी होगी। ये देश तभी अपने संस्कार व संस्कृति सुरक्षित रख पाएगा, हमारे परिवार संस्कारवान हों यही सच्ची भारतीयता है।

Kiran Chopra