शिक्षा मंत्री : संघ की पहली पसंद गडकरी

Summary :

‘तेरी आरजू की छांव में नंगे पांव दूर तलक भटकते हुए, मेरे ख्वाब तुझे ढूंढते हुए, नए रास्तों पर चलते हुए, तू मिला भी तो बेगानों सा अनजाने रास्तों के मुसाफिर सा, अपनी मंजिल तलाशता इस बात से अनजाना कि मेरी मंजिल तो तू ही है!’ केंद्रीय मंत्रिमंडल का बहुप्रतीक्षित फेरबदल एक अबूझ पहेली बनता जा रहा है, दिल्ली का शीर्ष न तो पुराने चेहरों की रुखसती की इबारत ही ठीक से लिख पाया है और न ही उनकी जगह लेने को आतुर नए चेहरों की ही ठीक से ​िशनाख्त हो पाई है और न ही फेरबदल की किसी मुकम्मल…

‘तेरी आरजू की छांव में नंगे पांव
दूर तलक भटकते हुए,
मेरे ख्वाब तुझे ढूंढते हुए,
नए रास्तों पर चलते हुए,
तू मिला भी तो बेगानों सा
अनजाने रास्तों के मुसाफिर सा,
अपनी मंजिल तलाशता इस बात से अनजाना कि मेरी मंजिल तो तू ही है!’

केंद्रीय मंत्रिमंडल का बहुप्रतीक्षित फेरबदल एक अबूझ पहेली बनता जा रहा है, दिल्ली का शीर्ष न तो पुराने चेहरों की रुखसती की इबारत ही ठीक से लिख पाया है और न ही उनकी जगह लेने को आतुर नए चेहरों की ही ठीक से ​िशनाख्त हो पाई है और न ही फेरबदल की किसी मुकम्मल तारीख को ही कोई चेहरा दिया जा सका है, बावजूद इसके दिल्ली की सियासत रोज बरोज नए पेंचोखम में उलझती जा रही है। ताजा मामला केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का बताया जाता है। 2014 की एनडीए सरकार में उन्हें लकदक विभागों से लाद दिया गया था, फिर शनैः शनैः उनकी सियासी महत्वाकांक्षाओं को कुतरना जारी रखा गया, सरकार 3-0 आते आते उनके पास बस यही सड़क परिवहन मंत्रालय ही बचा रह गया।
पहले तो कयास लग रहे थे कि दिल्ली उन्हें पैदल करने की रणनीति पर काम कर रही है, जब यह शोर उठा तो संघ हरकत में आया, नागपुर गडकरी के पीछे मजबूती से खड़ा हुआ। संघ का स्पष्ट तौर पर मानना था कि ‘गडकरी एक रिजल्ट देने वाले मंत्री हैं, सो वे सजा नहीं, ईनाम के हकदार हैं।’ संघ के कड़े रुख के बाद दिल्ली का दिल पसीजा तो प्रस्ताव दिया गया कि ‘गडकरी का विभाग बदल दिया जाए,’ दिल्ली की मंशा उन्हें एक बहुत कम महत्व के मंत्रालय में शिफ्ट करने की थी। पर कहते हैं संघ प्रमुख ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए इस बात की वकालत की है कि ‘गडकरी को कोई बड़ा मंत्रालय मिलना चाहिए।’ कहते हैं इसके लिए उन्होंने शिक्षा मंत्रालय का सुझाव दिया है।
संघ का कहना है कि गडकरी अपने अभिनव व नई सोच से शिक्षा मंत्रालय का भी कायाकल्प कर सकते हैं, जैसा उन्होंने देश के सड़क परिवहन के मामले में किया है। वे पेपर लीक मामले पर भी अंकुश लगा सकते हैं और शिक्षा के क्षेत्र में अपने नए प्रयोगों के चलते देश के जेन ज़ी व अल्फा का दिल भी जीत सकते हैं।’ वैसे भी संघ के अपने सांस्कृतिक व वैचारिक विस्तार के लिए शिक्षा मंत्रालय एक अहम उपक्रम है, केंद्र में जब-जब भाजपा नीत सरकार रही है, शिक्षा मंत्री सदैव संघ की पसंद का ही रहा है, सो माना जा रहा है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल के अगले फेरबदल में दिल्ली संघ को उपकृत करने का यह मामूली सा उपक्रम साध सकता है।
काम दिखाने की होड़
दिल्ली के जंतर मंतर हुए ‘जेन ज़ी’ आंदोलन के बाद केंद्र सरकार अपनी इमेज को लेकर खासी सतर्क हो गई है। सो, तमाम केंद्रीय मंत्रियों व भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दिल्ली से हिदायत मिली है कि ‘वे अपने काम-काज के तरीकों में ज्यादा से ज्यादा आक्रामकता व पारदर्शिता लाएं।’ दिल्ली ने कहा कि ‘सिर्फ विकास परियोजनाओं की घोषणाओं से काम नहीं चलेगा बल्कि नए प्रोजेक्ट बनाते समय केंद्र व राज्य इस बात का पूरा ध्यान रखें कि ‘प्रोजेक्ट शुड बी विजिएबल’ यानी प्रोजेक्ट दिखने में भी बड़ा व असरदार हो। ताकि जनता को यह संदेश दिया जा सके कि मोदी सरकार उनके हितों के लिए काम करने को कृतसंकल्प है।’ सो, दिल्ली ने अपने तमाम मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों को यह निर्देश दिए थे कि ‘वे अपनी आगामी परियोजनाओं को लेकर एक प्रेजेंटेशन तैयार करें और एक-एक कर इसे दिल्ली को दिखाएं।’
पिछले दिनों जब अमित शाह गुजरात में थे तो असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अपना प्रेजेंटेशन लेकर सीधे अहमदाबाद ही पहुंच गए थे, बताया जाता है कि उन्होंने वहीं पर गृह मंत्री को अपना यह प्रेजेंटेशन दिया। कई और केंद्रीय मंत्रियों व सचिवों की भी अहमदाबाद पहुंचने की खबर थी। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो आनन-फानन में यूपी की 107 विधानसभा सीटों को केंद्र में रखते हुए 3200 करोड़ रुपयों की एक महत्वाकांक्षी विकास योजना की घोषणा भी कर डाली, सनद रहे कि इन 107 में से ज्यादा विधानसभा सीटें ऐसी हैं जो सपा व कांग्रेस के प्रभुत्व वाली हैं।
पहली बार सचिवों का रिपोर्ट कार्ड
2014 के बाद से जब से दिल्ली का शासन भगवा हुआ है तब से ही नौकरशाही की निकल पड़ी है, वैसे भी गुजरात के जमाने से ही नरेंद्र मोदी सरकार व शासन चलाने में ब्यूरोक्रेसी को खुला हाथ देते रहे हैं और बहुत हद तक उनकी निर्भरता भी इन पर बनी रहती है, पॉलिटिकल लीडरशिप से कहीं ज्यादा। पर अब दिल्ली को इस बात का इल्म होने लगा कि जरूरत से ज्यादा छूट और इन पर निर्भरता की वज़ह से अब देश की नौकरशाही बेलगाम होने लगी है, सो यह तय हुआ कि तमाम केंद्रीय सचिवों के काम-काज की गंभीर समीक्षा लाजिमी है, नहीं तो अब से पहले सचिवों के परफॉरमेंस को लेकर पीएम के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ही उन्हें ब्रीफ कर दिया करते थे और इसी आधार पर किसी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की जिम्मेदारी तय होती थी या उन्हें एक्सटेंशन दिया जाता था, पर कहते हैं पिछले कुछ समय से कुछ विभागों के सचिवों के काम-काज और उनके पैसा बनाने को लेकर पीएम के पास खुफिया एजेंसियों के अहम इनपुट आ रहे थे।
इसके बाद पीएम ने अपने कोर अधिकारियों की एक बैठक में तय किया कि आईबी की रिपोर्ट, पीएमओ के मूल्यांकन को आधार बना कर तमाम विभागों के सचिवों का एक रिपोर्ट कार्ड तैयार ​िकया जाए और इस रिपोर्ट कार्ड के आधार पर ही सचिवों की नई जिम्मेदारियां तय की जाएं या उन्हें सेवा विस्तार देने पर विचार किया जाए। सूत्रों की मानें तो सचिवों की यह रिपोर्ट कार्ड आने के बाद बहुत जल्द ही केंद्रीय स्तर पर एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल देखने को मिल सकता है।
लौट के बुद्धू घर आना चाहते हैं
दिल्ली से लगे इस प्रभावशाली राज्य के यह पुराने राजनेता एक राजनैतिक परिवार से संबंध रखते हैं। इनके पिता भी कई दफे राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। यह महाषय भी लगभग तमाम दलों की परिक्रमा लगा इन दिनों परिवार समेत भाजपा में पार्क है। जब इन्हें अहसास होने लगा कि भाजपा में इन्हें कुछ और नहीं मिलने वाला है तो पिछले दिनों वे कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से मिलने जा पहुंचे। दोनों नेताओं की एक बंद कमरे में लंबी बातचीत हुई। नेता जी ने कहा कि ‘अब बहुत हुआ, वे अपने पुराने घर कांग्रेस में लौटना चाहते हैं और अपना शेष राजनैतिक जीवन यहीं काटना चाहते।
इसके लिए उनकी कांग्रेस पार्टी से कोई खास डिमांड भी नहीं, बस वे इतना चाहते हैं कि वे 2029 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ें। तब तक वे प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करने में अपने बेटों के साथ पूरा दम लगा देंगे।’ केसी ने नेता जी को आश्वस्त किया कि वे इस बारे में एक बार राहुल जी से बात करेंगे। इसके बाद केसी ने दीपेंद्र हुड्डा को तलब कर इस संबंध में उनकी राय जाननी चाही तो दीपेंद्र ने कहा कि ‘इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। भाजपा में रह कर इन्होंने अपने सारे केस ठीक करा लिए हैं, सो इनका मतलब वहां सध गया है। सो, बेहतर होगा कि अभी इनको लंबा होल्ड पर डाल दिया जाए, कम से कम एक साल के लिए, फिर हम तय करेंगे कि इनका करना क्या है?’
…और अंत में
भाजपा में एक नए ‘वर्क कल्चर’ का ‘फ्रेमवर्क’ तैयार किया जा रहा है। भाजपा की कमान अपेक्षाकृत एक युवा हाथों यानी नितिन नबीन को सौंपी गई है उनसे दो टूक कहा गया है कि ‘उन्हें पार्टी के नीतिगत फैसलों के लिए कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं, वे पीएम से सीधे बात करें, उनसे मिलें और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करें।’ क्या यह एक नई भाजपा का अभ्युदय है?

त्रिदीब रमण