भारत-अमेरिका के सम्बन्धों में पिछले 20 साल के दौरान जो मूलभूत सकारात्मक बदलाव आया है उससे केवल भारतीय उपमहाद्वीप की रणनीतिक राजनीति पर ही नहीं बल्कि समूचे दक्षिण एशिया की स्थिति पर गुणात्मक प्रभाव पड़ा है। इस सन्दर्भ में 2008 में दोनों देशों के बीच हुए परमाणु करार का विशिष्ट महत्व है जिसने दोनों देशों के दौत्य सम्बन्धों को नई ऊंचाई प्रदान की। कुछ कूटनीतिक विशेषज्ञों की राय में ऐसा करना अमेरिका की मजबूरी थी क्योंकि बदलते विश्व मंच पर चीन के बढ़ते प्रभाव को अमेरिका सन्तुलित करना चाहता था। इस तर्क में वजन हो सकता है क्योंकि पिछले 20 वर्षों के दौरान ही चीन की ताकत में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है और अन्तर्राष्ट्रीय जगत में वह एक आर्थिक शक्ति बनने की तरफ तेजी से अग्रसर हुआ है। जहां तक दक्षिण एशिया का सवाल है तो चीन ने बहुत शातिर दिमाग से काम लेते हुए भारत के पड़ोसी पाकिस्तान को अपना रणनीतिक सहयोगी बनाते हुए पश्चिम एशिया तक में अपनी सैनिक शक्ति का विस्तार इस प्रकार किया है कि वह हिन्द महासागर क्षेत्र से लेकर प्रशान्त सागर क्षेत्र तक में अपना दबदबा कायम करते हुए क्षेत्र के सभी देशों से पारंपरिक अमेरिकी प्रभाव को निस्तेज कर सके। अतः ‘भारत-अमेरिका-जापान- आस्ट्रेलिया’ के बीच बने चतुष्कोणीय सैनिक सहयोग तन्त्र का महत्व हमें समझ में तब आ सकता है जब चीन की नीति और नीयत का बेबाक जायजा लें।
इस सन्दर्भ में अमेरिका के नये राष्ट्रपति बाइडेन की नीति भी समझने की जरूरत है जिन्होंने भारत के साथ सम्बन्धों को इस प्रकार वरीयता दी है कि चीन को प्रत्यक्ष रूप से अंगुली उठाने का मौका न मिले। पिछले दिनों जब श्री बाइडेन ने अपने देश की विदेश नीति की वरीयताओं को गिनाया था तो उनमें भारत का कहीं जिक्र नहीं था बल्कि चीन के बारे में उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह पिछले ट्रम्प प्रशासन की उन नीतियों को मानते रहेंगे जिनमें चीन को सुधरने और अपने व्यापारिक नजरिये में बदलाव लाने की चेतावनी तक दी गई थी। इसके बाद बाइडेन यदि अपने नये प्रशासन में यह निर्णय लेते हैं कि उनके रक्षामन्त्री श्री लायड जे आस्टिन अपनी पहली विदेश यात्रा नई दिल्ली की करेंगे तो अमेंरिका की वरीयताएं साफ पहचानी जा सकती हैं। इससे स्पष्ट सन्देश जाता है कि एशिया प्रशासन्त क्षेत्र में अमेरिका व भारत का रणनीतिक सहयोग विश्व सामरिक सन्तुलन के लिए कितना जरूरी है परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अस्सी के दशक के शुरू तक भारत हिन्द महासागर को अन्तर्राष्ट्रीय शांति क्षेत्र घोषित करने की पुरजोर वकालत करता रहा है। बेशक वह शीत युद्ध का दौर था जिसमें अमेरिका व सोवियत संघ दो विश्व शक्तियां थीं। मगर नब्बे के दशक में सोवियत संघ के बिखर जाने के बाद विश्व सैनिक सन्तुलन एक ध्रवीय हो गया और आर्थिक मोर्चे पर वैश्विक प्रतिबन्धों के समाप्त होने का दौर शुरू हो जाने पर चीन ने एक आर्थिक ताकत बनने की तरफ अपने कदम बढ़ा दिये जिससे एक ध्रुवीय सैनिक विश्व की वरीयताओं में अन्तर आने लगा और शक्ति का पर्याय अर्थव्यवस्था बनती चली गई। एक विश्व व्यापार संगठन का सदस्य देश बन जाने के बाद चीन ने अपना आर्थिक विस्तार युद्ध स्तर पर करना शुरू किया जिससे इस मोर्चे पर एक नया असन्तुलन पैदा होने का खतरा पैदा हो गया। सबसे पहले इसे अमेरिका ने पहचाना और दक्षिण एशिया में उसने अपनी रणनीति में बदलाव किया तथा पाकिस्तान का हाथ छोड़ कर भारत से सहयोग करना हितकारी माना।
2008 में परमाणु करार के रूप में इसका एक अध्याय पूरा हुआ और उसके बाद दोनों देशों के बीच में सैनिक सहयोग का दौर शुरू हुआ जिसमें अमेरिका के सैनिक सामग्री के बाजार को भारत के लिए खोला जाना कम महत्वपूर्ण नहीं था। भारत ने रक्षा सामग्री क्षेत्र में विदेशी निवेश को जिस तरह खोलना शुरू किया उसे भी हम इसी दायरे में रख कर देखेंगे। अतः यह अकारण नहीं है कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति श्री बाइडेन ने अपने रक्षामन्त्री के रूप में श्री आश्टिन को चुना तो उन्होंने सबसे पहले विगत 27 जनवरी को भारत के रक्षामन्त्री श्री राजनाथ सिंह से टेलीफोन पर वार्ता की और दोहराया कि उनका देश भारत के साथ सैनिक सहयोग के वादे पर बाकायदा डटा हुआ है जो कि इस सिद्धान्त पर खड़ा किया गया है कि भारत-प्रशान्त क्षेत्र स्वतन्त्र और सभी के लिए खुला रहे। जाहिर है कि इस क्षेत्र में चीन ने अपने सैनिक जहाजी बेड़ों की तैनाती इस हिसाब से कर रखी है कि सागर के बीच में उसकी दादागिरी की धाक का सिक्का चलता रहे। अभी तक जो खबरें मिल रही हैं उनके अनुसार चतुष्कोणीय सहयोग के चारों देशों भारत-अमेरिका-जापान-आस्ट्रेलिया के शासन मुखियाओं की बैठक आगामी 12 मार्च को होगी। इस बैठक में क्या निष्कर्ष निकलता है यह तो अभी नहीं कहा जा सकता मगर इतना जरूर कहा जा सकता है कि अमेरिका इस बैठक के बाद के तारों को सिलसिले से जोड़ने की गरज से अपने रक्षामन्त्री को मार्च महीने के अंत से पहले भारत भेज कर सहयोग के व्यावहारिक पक्ष को औऱ मजबूती देना चाहेगा। इसका कूटनीतिक अर्थ यह निकालने में कोई दिक्कत नहीं है कि अमेरिका को अब भारत की जितनी जरूरत है उतनी संभवतः भारत को अमेरिका की नहीं है। यही तथ्य ऐसा है जिसे पकड़ कर भारत एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में अपनी भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण बना सकता है। वह चीन व अमेरिका के बीच उदासीन उत्प्रेरक (बफर मीडियम) की भूमिका निभा सकता है। हिन्द महासागर व प्रशान्त सागर क्षेत्र के सैनिक स्पर्धा मुक्त होने से भारत की शक्ति में जो अंतः स्फूर्त इजाफा होगा उसका आकलन फिलहाल लगाना सम्भव नहीं है।


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