क्या अमेरिका की ताक़त उतार पर है?

Summary :

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे की वार्ता बेनतीजा रही। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि यह युद्ध ख़त्म होना चाहिए, नहीं तो बहुत तबाही होगी। करोड़ों लोगों का रोज़गार और वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य इस क्षेत्र में शान्ति पर निर्भर है। हाेर्मुज जलमार्ग, परमाणु कार्यक्रम,लेबनान आदि मसलों को लेकर मतभेद ख़त्म नहीं हुए। ईरान के फ्रीज की हुई अरबों डालर की जायदाद को खोलने की ईरान की मांग भी है। वह चाहते हैं कि उन पर लगे प्रतिबंध वापिस लिए जाएं। वार्ता क्यों असफल रही वह लेख का विषय नहीं है। यह वार्ता इसलिए भी महत्वपूर्ण है…

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे की वार्ता बेनतीजा रही। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि यह युद्ध ख़त्म होना चाहिए, नहीं तो बहुत तबाही होगी। करोड़ों लोगों का रोज़गार और वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य इस क्षेत्र में शान्ति पर निर्भर है। हाेर्मुज जलमार्ग, परमाणु कार्यक्रम,लेबनान आदि मसलों को लेकर मतभेद ख़त्म नहीं हुए। ईरान के फ्रीज की हुई अरबों डालर की जायदाद को खोलने की ईरान की मांग भी है। वह चाहते हैं कि उन पर लगे प्रतिबंध वापिस लिए जाएं। वार्ता क्यों असफल रही वह लेख का विषय नहीं है। यह वार्ता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान ने अमेरिका को आइना दिखा दिया।

जिस देश की सभ्यता को रातोंरात नष्ट करने की अमेरिका के राष्ट्रपति ने धमकी दी थी, उसी देश को मनाने के लिए उन्हें अपने उपराष्ट्रपति को पाकिस्तान भेजना पड़ा। बुरी तरह से जख्मी ईरान ने महान अमेरिका के आगे झुकने से इंकार कर दिया और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को बेरंग वापिस भेज दिया। क्या बाहुबली अमेरिका की शक्ति और प्रभाव का ह्रास हो रहा है? इस युद्ध से सबसे बड़ी चोट अमेरिका की विश्वसनीयता को पहुंची है। हाेर्मुज जलमार्ग युद्ध से पहले खुला था। वह तो इस अनावश्यक युद्ध के कारण बंद है। किस की बेवक़ूफ़ी के कारण यह हुआ है? छह सप्ताह के युद्ध के बाद एक भी लक्ष्य हासिल नहीं हुआ। द इकानमिस्ट ने लिखा है, “युद्ध में अमेरिका की ताक़त बेअसर साबित हुई”।

अमेरिका में मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर शिबले तेलहामी हाेर्मुज की नाकाबंदी के अमेरिका के निर्णय पर लिखते हैं “भ्रमित करने वाला और आत्म विनाशकारी… अमेरिका की विश्वसनीयता का बचा क्या है”? ईरान ने ग़ैर परम्परागत ढंग से सीमित हथियारों से युद्ध लड़ा। वह जीते नहीं तो हारे भी नहीं। अमेरिका के मुख्य हितों में सदा रहा है कि उनके और ग्लोबल व्यापार के लिए समुद्री मार्ग खुले रहे। मध्य पूर्व में यह और भी महत्व रखता है क्योंकि वहां से तेल आता है। अमेरिका पूरा ज़ोर लगा चुका है, पर यह जलमार्ग ईरान की सेना के नियंत्रण में है। खाड़ी के देश सवाल कर रहे हैं कि अगर अमेरिका हाेर्मुज नहीं खोल सकता तो अमेरिका की उस क्षेत्र में ज़रूरत क्या है? खाड़ी के देशों की ईरानी मिसाइलों और ड्रोन से रक्षा करने में अमेरिका की असफलता उसकी क्षमता पर सवालिया निशान लगा रही है।

जिस तरह युद्ध में दुबई को निशाना बनाया गया और अमेरिका बचाव नहीं कर सका, को लेकर रिश्तों में खटास आ गई है। पाकिस्तान ने साऊदी अरब की मांग पर उनकी सुरक्षा के लिए 13000 सैनिक और लड़ाकू जहाज़ भेज दिए हैं। खाड़ी के देश समझते हैं कि एक संरक्षक के तौर पर डाेनाल्ड ट्रम्प सरकार बेकार है। खाड़ी के देशों में अड्डे अमेरिका की ताक़त के प्रतीक थे। ईरान ने उनके 13 अड्डे तबाह कर दिए। इतनी बुरी तरह तबाह किए कि न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार इनका इस्तेमाल नहीं हो सकता। जार्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में मध्य पूर्व के विशेषज्ञों ने बताया है, “वहां अमेरिका की ताक़त का जो पूरा ढांचा था उसे ईरान ने एक महीने में नष्ट कर दिया”। यह ठिकाने सुरक्षा देने की बजाए हमलों का निशाना बन गए, जो शिकायत खाड़ी के देश कर रहे हैं। बेहरीन में अमेरिका की नौसेना के 5वें बेड़े का मुख्यालय है। इसे बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया।

अमेरिकी इतिहासकार एलफर्ड मैककॉय ने इसे अमेरिका का ‘स्वेज क्षण’ कहा है। जैसे 1956 के स्वेज नहर विवाद के बाद इंग्लैंड और फ्रांस की साम्राज्यवादी ताक़त का ह्रास हो गया था, उसी तरह हाेर्मुज का विवाद अमेरिका की ताक़त की सीमा निर्धारित कर सकता है। मैककॉय लिखते हैं, “एक प्रभुत्वशाली सैन्य शक्ति एकदृढ़ निश्चयी पर कमजोर ताक़त ईरान,को मजबूर नहीं कर सकी। वह सजा दे सकती है, पर हर बार नतीजे पर नियंत्रण नहीं कर सकती”। हाेर्मुज का विवाद अमेरिका की कम होती ताक़त और विश्वसनीयता का संकेत समझा जा रहा है। दुनिया को बहुत कष्ट हो रहा है। पर सुपरपावर अभी तक कुछ नहीं कर सका। अकतूबर 1956 का स्वेज नहर विवाद एक एेतिहासिक मोड़ था। यह नहर मिस्त्र की ज़मीन से निकलती है।

इस पर ब्रिटेन और फ्रांस का नियंत्रण था। मिस्त्र के नए राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर ने इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर ब्रिटेन, फ्रांस और इज़राइल ने हमला कर दिया ताकि स्वेज को खोला जा सके। पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़नहॉवर ने उन्हें युद्ध रोकने का आदेश दे दिया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंथनी ईडीन ने इस्तीफ़ा दे दिया और नासिर अपने देश में हीरो बन गए। इसे वह क्षण समझा जाता है जब द्वितीय विश्वयुद्ध से थके हुए ब्रिटेन ने वैश्विक शक्ति का ख़िताब अमेरिका को खो दिया।

यह योरूप के साम्राज्यवाद का अंत था। इसी के बाद शीत युद्ध की शुरूआत हुई और अमेरिका और रूस प्रमुख ताक़तें बन गए। स्वेज और हाेर्मुज विवादों में मूल अंतर है। ईरान ज़रूर नासिर की भूमिका निभा रहा है पर अमेरिका कोई थकी हुई साम्राज्यवादी ताक़त नहीं है जो नए बॉस के लिए जगह छोड़ रही है। स्वेज़ मिस्त्र की ज़मीन से निकलती है जबकि हाेर्मुज अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग है जिसे ईरान ज़बरदस्ती रोक कर बैठ गया है।

1956 का ब्रिटेन दिवालिया था जबकि अमेरिका की ताक़त का दुनिया में कोई बराबर नहीं है। रूस बहुत पीछे रह गया है। चीन नज़दीक आया है, पर अमेरिका की सैनिक ताक़त का मुक़ाबला नहीं है जो चीन से तीन गुना है। 2026 में अमेरिका की जीडीपी32 ट्रिलियन डॉलर रहने की सम्भावना है जबकि चीन की 21 ट्रिलियन डालर के क़रीब रहेगी। चीन की प्रगति प्रभावशाली है और अमेरिका इसे रोक नहीं सका, पर चीन नज़दीक नहीं फटक रहा। तेल के मामले में अमेरिका आत्मनिर्भर है जबकि चीन हमारी तरह दूसरों पर निर्भर है। हाेर्मुज को रोकने से उन्हें भी हमारे बराबर तकलीफ़ हो रही है। डालर अभी भी प्रमुख मुद्रा है, युआन बराबरी नहीं कर सकता,पर इसके बावजूद यह तो स्पष्ट है कि अमेरिका के प्रभाव का ह्रास हुआ है।

वास्तव में पिछले कुछ दशकों से अमेरिका का प्रभाव कम हो रहा है। वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान से भारी नुक्सान सहने के बाद अमेरिका को भागना पड़ा था। ईराक़, सीरिया और लीबिया जैसे देशों में सैन्य अभियान बेकार रहा। उन देशों को और अस्थिर कर छोड़ा गया और अब ईरान क़ाबू नहीं आ रहा। इस वक्त अमेरिका दुनिया में अकेला है। एक भी देश साथ नहीं। ट्रम्प ने खुद कहा है,”जापान ने हमारी मदद नहीं की। आस्ट्रेलिया ने हमारी मदद नहीं की। दक्षिण कोरिया ने हमारी मदद नहीं की”। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने तो नई विश्व व्यवस्था का आह्वान किया है। अमेरिका दुनिया को स्थायित्व देता था, पर ट्रम्प का अमेरिका तो सब अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को उखाड़ने लगा है।

ईरान के साथ टकराव में किसी नाटो देश ने साथ नहीं दिया, स्पेन और इटली जैसे देशों ने खाड़ी की तरफ़ जाते अमरीकी विमानों को अपने आकाश से उड़ने से इजाज़त देने से इंकार कर दिया। स्पेन के राष्ट्रपति पेडरो सांचेज़ ने तो स्पष्ट कहा है, “हम उनका समर्थन नहीं करेंगे जिन्होंने दुनिया में आग लगा दी”। फ्रांस और इंग्लैंड कह चुके हैं कि ‘यह हमारा युद्ध नहीं है’।

खाड़ी के देश, योरूप के देश और ताइवान जैसे देश सब अब अपनी-अपनी सुरक्षा को लेकर चिन्तित है। कैनेडा जो अमेरिका का जुड़वां देश था, बड़ा आलोचक बन चुका है। अगर खाड़ी में टकराव और चलता है तो अमेरिका की प्रतिष्ठा में और गिरावट आएगी। अमेरिका की मनमानियों से पुरानी व्यवस्था चरमरा गई है। नई बहुध्रुवीय व्यवस्था उभर सकती है। भारत, ब्राज़ील, साऊदी अरब, कैनेडा, दक्षिण अफ्रीका, जापान, जर्मनी जैसे देश सक्रिय हो सकते हैं। इस साल भारत में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने वाला है। सबकी नज़र उस पर रहेगी। आशा है कि भारत अपनी आवाज़ बुलंद करेगा और हाल की लगभग खामोशी को तोड़ेगा। हम दर्शक गैलरी में बैठ कर तमाशा नहीं देख सकते। दुनिया में हमारी नैतिक प्रतिष्ठा थी जिस में कमी आई है। हमारा बहुत कुछ दांव पर है। चीनी विशेषज्ञ आइनर टेनजेन ने कटाक्ष किया है, “भारत को ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना चाहिए।

यही नहीं देखते रहना कि दूसरे क्या कर रहे हैं”। अमेरिका अभी भी सुपरपावर है, और रहेगा। पर यह वह सुपरपावर है जो पावर के नशे में गलती पर गलती कर रहा है। नवीनतम मूर्खता हाेर्मुज की नाकेबंदी की घोषणा है। जो पहले से बंद है उसे और बंद किया जा रह है। यहां से दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है। क्या ट्रम्प ने सोचा है कि अगर आप दुनिया का तेल रोक दोगे तो अमेरिका समेत विश्व व्यवस्था पर इसका क्या असर होगा ? और किस अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के नीचे यह किया जा रहा है? जिस तरह अमेरिका विश्व राय की अवहेलना कर रहा है और अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर रहा है उससे उसका प्रभाव और कम हो रहा है।

यूएई में हमारे पूर्व राजदूत नवदीप सूरी ने कहा है, “ जब हम इस समय पर नज़र दौड़ाएंगे, यह याद रखा जाएगा कि यह वह समय था जब कभी ग्रेट रही अमेरिकी सभ्यता और शक्ति का पतन शुरू हुआ था”। अब फिर शायद शान्ति वार्ता शुरू हो रही है। आशा करनी चाहिए कि यह नतीजे पर पहुंचेगी, पर यह सवाल तो खड़ा रहेगा कि आख़िर यह युद्ध शुरू किया ही क्यों गया? अरबों डालर खर्च करने, हज़ारों लोगों को मरवाने और भारी तबाही से हासिल क्या हुआ है? चीन और रूस जो घटनाक्रम पर नज़र रखे हैं, ज़रूर खुश होंगे। नेपोलियन बोनापार्ट कह गए हैं, ‘जब तुम्हारा दुश्मन गलती कर रहा हो तो उसमें रुकावट मत डालो’।

चन्द्रमोहन