महिला आरक्षण का ‘आकर्षण’

Summary :

एक तरफ जहां पूरी दुनिया पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध पर चीत्कार कर रही है तो वहीं दूसरी ओर भारत के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और केन्द्र की मोदी सरकार संसद के चालू बजट सत्र की तीन विशेष बैठकें 16 से लेकर 18 अप्रैल तक बुला रही है। इससे भारत के लोकतन्त्र की उस अजीम ताकत का पता चला है जिसे संविधान के माध्यम से हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने हमें अता फरमाई थी। आज से यह त्रि​दिव​सिय बैठक शुरू हो रही है जिसमें महिला आरक्षण विधेयक को नये सिरे से पारित कराया जायेगा। यह संविधान…

एक तरफ जहां पूरी दुनिया पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध पर चीत्कार कर रही है तो वहीं दूसरी ओर भारत के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और केन्द्र की मोदी सरकार संसद के चालू बजट सत्र की तीन विशेष बैठकें 16 से लेकर 18 अप्रैल तक बुला रही है। इससे भारत के लोकतन्त्र की उस अजीम ताकत का पता चला है जिसे संविधान के माध्यम से हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने हमें अता फरमाई थी। आज से यह त्रि​दिव​सिय बैठक शुरू हो रही है जिसमें महिला आरक्षण विधेयक को नये सिरे से पारित कराया जायेगा। यह संविधान संशोधन होगा जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी।

सत्तारूढ़ भाजपा की मोदी सरकार को विश्वास है कि दोनों ही सदनों में विपक्ष की प्रमुख पार्टियां भी इसका समर्थन करेंगी क्योंकि देश की आधी आबादी को दिये जाने वाले अधिकार का विरोध करके वे अपने राजनीतिक भविष्य को अंधेरे में नहीं धकेल सकतीं। परन्तु महिलाओं को विधानसभाओं व लोकसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने वाले इस विधेयक के साथ ही दो और विधेयक भी पारित किये जायेंगे जो चुनाव क्षेत्र परिसीमन व केन्द्र प्रशासित राज्यों से सम्बन्धित होंगे।

फिलहाल परिसीमन में पूर्ण राज्य व केन्द्र प्रशासित राज्य समन्वित रूप से ही अपने लोकसभा चुनाव करते हैं। चुनाव तो अब भी समन्वित रूप से होंगे मगर केन्द्र प्रशासित राज्यों से अब कुल 35 लोकसभा सांसद चुने जायेंगे जबकि राज्यों से 815 लोकसभा सांसद होंगे। इस प्रकार वर्तमान लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 850 हो जायेगी जो कि वर्तमान संख्या से 50 प्रतिशत अधिक होगी। कुल 850 सांसदों में अनुसूचित जातियों व जनजातियों का आरक्षण रहेगा। अतः महिलाओं के लिए जो 33 प्रतिशत आरक्षण होगा उसमें भी अनुसूचित जातियों व जनजातियों की महिलाओं के लिए आरक्षण रहेगा।

हालांकि कुछ विपक्षी दल मांग कर रहे हैं कि पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए भी 33 प्रतिशत आरक्षण में उनकी जनसंख्या को देखते हुए जरूरी आरक्षण कोटा दिया जाये। सरकार परिसीमन के लिए अलग से एक विधेयक ला रही है जिसमें इस शर्त को हटा दिया जायेगा कि दस वर्ष के अन्तराल पर होने वाली जनगणना के बाद परिसीमन आयोग का गठन होगा जो बढ़ी हुई जनसंख्या के आधार पर लोकसभा व विधानसभाओं में सदस्यों की संख्या में वृद्धि करेगा। भारत में पिछला परिसीमन 1971 की जनगणना के बाद हुआ था जिसमें लोकसभा की लगभग दो दर्जन सीटें बढ़ाकर 543 कर दी गई थीं। इसके बाद संसद में इसी संख्या को स्थिर करने हेतु आवश्यक संविधान संशोधन कानून बनते रहे। एेसा सबसे पिछला कानून भाजपा नीत एनडीए की वाजपेयी सरकार के दौरान बना था जिसमें आगामी 20 वर्षों के लिए सदस्य संख्या पर जाम लगा दिया गया था।

मगर देश में 1990 के बाद से ही महिला आरक्षण की मांग तेज होने लगी थी। जिसकी वजह से 1989 से लेकर 2010 तक कई बार इस विधेयक को तत्कालीन सरकारों ने संसद के पटल पर रखा मगर हर बार प्रयास अधूरा रहा कभी राज्यसभा में बहुमत नहीं मिला तो कभी लोकसभा में। मगर मोदी सरकार में जब इसे करने की राजनीतिक इच्छा शक्ति प्रबल हुई तो सभी बाधायें समाप्त होने के कगार पर पहुंच गईं। वर्ष 2023 में मोदी सरकार ने संसद के दोनों सदनों में इसे पारित कराने में सफलता प्राप्त कर ली मगर इसे जमीन पर उतारने के बारे में शर्त लगा दी कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जबकि देश में नई जनगणना हो जाये। इसके आधार पर परिसीमन आयोग गठित होगा जो लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने की अनुशंसा करेगा।

मोदी सरकार नया संविधान संशोधन लाकर यही शर्त हटाना चाहती है। अतः नये संशोधन में प्रस्ताव किया गया है कि परिसीमन आयोग सबसे ताजा हुई जनगणना के आधार पर ही चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन कर देगा। भारत में पूर्व सबसे ताजी जनगणना 2011 में मनमोहन सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई थी। अतः लोकसभा के सदस्यों की संख्या अब इसी आधार पर 850 तक बढ़ाई जायेगी जो आगामी 15 वर्षों तक यथावत रहेगी परन्तु विपक्षी पार्टियां विशेष कर कांग्रेस व द्रमुक इस मुद्दे पर कह रही हैं कि नये परिसीमन में लोकसभा में भारत के किसी एक विशेष भूभाग के लोगों का वर्चस्व नहीं होना चाहिए और परिसीमन इस प्रकार होना चाहिए कि उत्तर व दक्षिण के सभी राज्यों को अपना-अपना वाजिब हिस्सा मिले।

बेशक फिलहाल उत्तर भारत व पश्चिमी भारत के विभिन्न राज्यों में भाजपा का सिक्का चल रहा है परन्तु कर्नाटक को छोड़ कर सभी दक्षिणी राज्यों में यह पार्टी बहुत कमजोर मानी जाती है। इसलिए दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक दलों को आशंका है कि कहीं संसद के भीतर उनकी राजनीतिक शक्ति संशोधन के बाद हल्की न पड़ जाये। अतः द्रमुक व वामपंथी पार्टियां मांग कर रही हैं कि परिसीमन में उनके साथ भेदभाव हो सकता है। मगर मोदी सरकार ने अब इस शंका का समूल नाश ही कर दिया है और कहा है कि परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर होगा।

इसकी वजह यह थी कि दक्षिण भारत के राज्यों ने जनसंख्या नियन्त्रण में बहुत बेहतर काम किया है जबकि उत्तर भारत के राज्य इसमें पिछड़े रहे हैं लेकिन अब तो परिसीमन 2011 के आंकड़ों के आधार पर होगा और गृहमन्त्री श्री अमित शाह वचन दे चुके हैं कि नई सदस्य संख्या में उतर-दक्षिण के पुराने संख्या समीकरण बने रहेंगे। हालांकि जब 2023 में मोदी सरकार ने संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित कराया था तो विपक्षी दलों ने ही मांग की थी कि इसे तुरन्त लागू क्यों नहीं किया जा सकता और सरकार इसके साथ जनगणना व परिसीमन की शर्त क्यों लगा रही है। एक मायने में मोदी सरकार ने नये संशोधन में विपक्षी दलों की मांग को ही मंजूर करते हुए इसे 2011 की जनगणना से जोड़ दिया है जिससे परिसीमन आयोग अपना काम जल्दी ही शुरू कर सके।

इसे देखते हुए यदि विपक्षी दल अब भी नये संशोधन विधेयक को पारित करने से पीछे हटते हैं तो उन्हें भारी राजनीतिक नुक्सान हो सकता है। जब परिसीमन से सम्बन्धित विधेयक में सरकार यह शर्त लगा रही है कि इसके बाद हर जनगणना के बाद परिसीमन कराना जरूरी नहीं होगा तो किस बात का विरोध है ? जहां तक 850 सांसदों के लोकसभा में बैठने का सवाल है तो नये लोकसभा भवन में 888 सांसद आराम से बैठ सकते हैं जिनकी संख्या 1100 के करीब तक भी पहुंच सकती है जिससे संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र भी जरूरत पड़ने पर हो सके।

Aditya Chopra

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