अमेरिकी मिडटर्म पोल्स का भारत में क्या प्रभाव होगा ?

Summary :

अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों (मिड-टर्म पोल्स) ने कुछ दिलचस्प रुझान दिखाए हैं, जो भारत में भी प्रासंगिक लगते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डेमोक्रेट्स को ‘जेन जेड’ से भारी समर्थन मिला। अमेरिकी विश्लेषकों के अनुसार, 18-24 साल के आयु वर्ग में 76% लोगों ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को वोट दिया। वहीं, 25-29 साल के आयु वर्ग में 68% लोगों ने इसी पार्टी को वोट दिया। भारत की राजनीतिक पार्टियों को इस पर ध्यान देना चाहिए। यह वही आयु वर्ग है जो ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ द्वारा बुलाए गए ‘जंतर-मंतर 1.0’ विरोध प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में शामिल हुआ…

अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों (मिड-टर्म पोल्स) ने कुछ दिलचस्प रुझान दिखाए हैं, जो भारत में भी प्रासंगिक लगते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डेमोक्रेट्स को ‘जेन जेड’ से भारी समर्थन मिला। अमेरिकी विश्लेषकों के अनुसार, 18-24 साल के आयु वर्ग में 76% लोगों ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को वोट दिया। वहीं, 25-29 साल के आयु वर्ग में 68% लोगों ने इसी पार्टी को वोट दिया। भारत की राजनीतिक पार्टियों को इस पर ध्यान देना चाहिए। यह वही आयु वर्ग है जो ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ द्वारा बुलाए गए ‘जंतर-मंतर 1.0’ विरोध प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में शामिल हुआ था।
सड़कों पर शुरू हुआ यह आंदोलन मूल रूप से नीट परीक्षा के पेपर लीक होने के खिलाफ था। लेकिन जल्द ही यह ‘जेन जेड’ की कई अन्य चिंताओं को समेटते हुए एक बड़े विरोध प्रदर्शन में बदल गया, जिसमें बेरोजगारी, महंगाई, सरकार की जवाबदेही की कमी, गिरता जीवन स्तर और यहां तक कि लोकतंत्र से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे। इनमें से कई मुद्दे डेमोक्रेटिक पार्टी के चुनाव प्रचार का मुख्य आधार बने, जिससे उन्हें युवाओं का भारी समर्थन मिला। एक और दिलचस्प रुझान यह है कि अमेरिका में शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच का अंतर कम हो गया है। डेमोक्रेट्स ने उन ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी पैठ बनाई, जहां दशकों से रिपब्लिकन पार्टी को वोट मिलता रहा है। साफ है कि ग्रामीण युवाओं की चिंताएं भी शहरी युवाओं जैसी ही हैं। चूंकि हर देश की राजनीति अलग होती है, इसलिए भारत में मतदान के रुझानों को लेकर जल्दबाजी में किसी नतीजे पर पहुंचना समझदारी नहीं होगी। हालांकि, ‘जंतर-मंतर 1.0’ विरोध प्रदर्शनों से यह स्पष्ट है कि भारत के ‘जेन जेड’ की चिंताएं भी अमेरिका के ‘जेन जेड’ जैसी ही हैं।
भारतीय राजनीति में एक और अहम पहलू है जो इस देश के लिए खास है: जाति। यहां मतदाताओं की पसंद को प्रभावित करने में जाति एक बड़ी भूमिका निभाती है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। और यही यहाँ ‘एक्स-फैक्टर’ साबित हो सकता है। फिर भी, अमेरिका से भारत की राजनीतिक पार्टियों बीजेपी और विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन’ के लिए एक संदेश है। पूरी दुनिया में युवाओं का गुस्सा एक हकीकत है। भारत में भी ऐसा ही है। भारतीय राजनीतिक पार्टियों को इस पर ध्यान देना चाहिए।
आप की तरह सीजेपी भी कांग्रेस को पहुंचाएगी नुक्सान ?
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के सौरव दास ने दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित अपने फार्महाउस पर दिवाली से पहले एक पार्टी का आयोजन किया। उनकी मेहमानों की सूची दिलचस्प थी क्योंकि उन्होंने इंडिया गठबंधन के उन सभी सदस्यों को आमंत्रित किया था जो कांग्रेस से नहीं जुड़े हैं। इसमें एनसीपी की सुप्रिया सुले, सीपीआई (एम) की वृंदा करात, टीएमसी के डेरेक ओ’ब्रायन, सीपीआई (एम) के जॉन ब्रिटास, निर्दलीय राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव। और हां, आम आदमी पार्टी भी पूरी ताकत के साथ मौजूद थी अरविंद केजरीवाल से लेकर संजय सिंह और कुछ अन्य नेता वहां थे। सच कहें तो, इन सभी नेताओं ने जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी के पहले विरोध प्रदर्शन से ही उसका समर्थन किया है, जबकि कांग्रेस ने इससे दूरी बनाए रखी। हालांकि, कांग्रेस के हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि उनकी पार्टी से किसी एक भी नेता को क्यों नहीं बुलाया गया, खासकर तब जब राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन के सुप्रीम कोर्ट मार्च से पहले, अपने आवास पर आयोजित ‘हाई टी’ (चाय पर चर्चा) में शामिल होने के लिए सीजेपी को आमंत्रित किया था।
सीजेपी ने राहुल गांधी की चाय पार्टी में जाने से परहेज किया। गौरतलब है कि सौरव दास का दिवाली-पूर्व डिनर, इंडिया गठबंधन की रामलीला मैदान रैली की पूर्व संध्या पर आयोजित किया गया था। हालांकि सीजेपी ने इस रैली का समर्थन किया था, लेकिन ऐसा लगता है कि उसने कांग्रेस का समर्थन नहीं किया है। इससे यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या सीजेपी भी आम आदमी पार्टी की तरह कांग्रेस के वोट काटने का काम करने जा रही है? या फिर इसके पीछे कुछ और ही बात है?
पंजाब में भाजपा की तरफ हो रहा पलायन किसको फायदा देगा ?
दिलचस्प बात यह है कि पंजाब में, कांग्रेस के मुकाबले भाजपा अन्य दलों से आने वाले नेताओं को ज्यादा आकर्षित कर रही है, जबकि कांग्रेस को उम्मीद है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में मतदाता स्वाभाविक रूप से उसे ही चुनेंगे। हाल के महीनों में, अलग-अलग विचारधाराओं वाले कई नेता भाजपा में शामिल हुए हैं। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों को चौंका दिया है, क्योंकि पंजाब में भाजपा कभी भी कोई बड़ी ताकत नहीं रही है। हाल ही में, आम आदमी पार्टी के तीन मौजूदा विधायक भाजपा में शामिल हो गए।
इससे पहले, इस साल की शुरुआत में राघव चड्ढा के नेतृत्व में नौ राज्यसभा सांसदों ने भी अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। उससे पहले, इस साल मार्च में, भाजपा की पूर्व सहयोगी अकाली दल के तीन नेता भी भाजपा में शामिल हो गए थे। ऐसा लगता है कि कांग्रेस के बजाय भाजपा को चुनने का एक बड़ा कारण यह है कि यह पार्टी अभी छोटी है और इसमें अभी कई नए लोगों के शामिल होने की गुंजाइश है। दूसरी ओर, कांग्रेस में ऐसे नेताओं की भरमार है जो चुनाव के ठीक पहले पार्टी में शामिल होने की कोशिश करने वाले किसी भी व्यक्ति को रोक देंगे। सवाल यह है कि क्या बीजेपी की ओर हो रहा यह पलायन, चुनाव के समय मतदाताओं पर कोई असर डालेगा?

R R Jairath