अमेरिका के मिडटर्म चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में जनता जनार्दन ही सर्वोच्च है। अमेरिका की जनता ने सर्वशक्तिमान डोनाल्ड ट्रंप को दिन में ही तारे दिखा दिए। डोनाल्ड ट्रंप अब ऐसी लेम डक (लंगड़ी बत्तख) बन गए हैं जिनके अधिकारों पर अंकुश तो लगा है लेकिन बादशाहत बरकरार है। उन्होंने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत खो दिया है। अमेरिकी मिडटर्म चुनावों का असर घरेलू राजनीति पर तो पड़ेगा ही लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। इस हार से वैश्विक राजनीति और वर्ल्ड आर्डर पर प्रभाव पड़ना तय है। भारत पर बार-बार टैरिफ लगाने वाले, भारत आैर पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिन्दूर जैसे सीमित युद्ध को रुकवाने का दावा करने वाले, पाक के सेना प्रमुख मुनीर को व्हाइट हाउस में बुलाकर उसकी पीठ थपथपाने वाले और भारत पर रूस से तेल की खरीद न करने के लिए दबाव बनाने वाले ट्रंप अब कमजोर हो चुके हैं।
अमेरिकी लोगों ने ट्रंप की नीतियों को पूरी तरह से नकार दिया है। हार की वजह पूरी तरह से साफ है। मतदाताओं ने ईरान से युद्ध को सही नहीं माना क्योंकि युद्ध के चलते ही देश में महंगाई बढ़ी, रोजगार कम हुए, पैट्रोल आैर डीजल की कीमतें रोजाना बढ़ीं। अमेरिकी भोजन, ईंधन, घर और हैल्थ केयर के बढ़ते खर्चों से परेशान हो उठे और उन्होंने वोट के जरिए रिपब्लिकन के गढ़ ध्वस्त कर िदए। यद्यपि घरेलू राजनीति में ट्रंप के हर कदम पर बैरिकेड्स लग चुके हैं लेकिन विदेशी मोर्चे पर अभी भी उन्हें अधिकार प्राप्त हैं। संसद से कोई बिल पास कराना हो, बजट आवंटन कराना हो, कोई जंग शुरू करनी हो, प्रवासियों का कोई मसला हो अब डेमोक्रेट्स हाउस और सीनेट में उनके हर कदम पर अड़ंगा लगा सकते हैं। देखना यह होगा कि ट्रंप बचे हुए 2 साल 2 महीने में गुस्सैल और आक्रामक बने रहते हैं या विपक्ष के साथ मिलकर काम करते हैं। हो सकता है कि वह ईरान के विरुद्ध फिर से आक्रमक रुख दिखाए। यद्यपि चुनाव नतीजों ने ट्रंप के खिलाफ एक और महाभियोग का रास्ता खोल दिया है लेकिन इसके लिए डेमोक्रेट्स के पास दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है। प्रतिनिधिसभा में डेमोक्रेट्स ने साधारण बहुमत के लिए जरूरी 218 सीटों से ज्यादा सीटें जीत ली हैं। अगर सभी डेमोक्रेट्स सांसद महाभियोग के प्रस्ताव के समर्थन में वोटिंग करते हैं तो इसे पास कराया जा सकता है। अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप को महाभियोग के दो प्रस्तावों का सामना करना पड़ा था लेकिन दोनों ही बार सीनेट से आरोपों से बरी हो गए थे। हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत के प्रति ट्रंप का रवैया क्या रहता है।
लेम-डक प्रेसिडेंट आम तौर पर वह होता है जिसे अब दूसरे चुनाव से नहीं जीतना पड़ता। इस कहावत का इतिहास पुराना है। इसका इस्तेमाल पहली बार 18वीं सदी में एक स्टॉकब्रोकर के लिए किया गया था जो अपना कर्ज नहीं चुका पाता था और फिर 19वीं सदी में यह अमेरिकी पॉलिटिकल डिक्शनरी में हारे हुए या पॉलिटिकल रूप से कमज़ोर ऑफिस होल्डर्स के लिए आया। संयुक्त राज्य अमेरिका में चुनाव और नए चुने गए अधिकारियों के शपथ ग्रहण के बीच के समय को लेम-डक अवधि के नाम से जाना जाने लगा। 1933 में मंजूर हुए ट्वेंटिथ संशोधन ने इस बदलाव को छोटा कर दिया, क्योंकि इससे नई कांग्रेस की शुरुआत 3 जनवरी और राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण 20 जनवरी को हो गया लेकिन दूसरी बार के राष्ट्रपति ज़रूरी नहीं कि कमज़ोर हों। कैंपेन की ज़रूरत से आज़ाद होकर वे कभी-कभी पॉलिटिकल रूप से मुश्किल फ़ैसले ले सकते हैं या ऐसे डिप्लोमैटिक कदम उठा सकते हैं जो पहले करना शायद मुश्किल होता। चुनावी दबाव न होने से वे विदेश में रिस्क लेने के लिए ज़्यादा तैयार हो सकते हैं, भले ही उनकी घरेलू पॉलिटिकल कैपिटल कम हो जाए। लंगड़ेपन के इस दौर में देखना यह है कि इसका असर भारत पर कितना पड़ता है। क्यास लगाए जा रहे हैं कि भारत और अमेरिका के बीच अब रक्षा सहयोग आैर कूटनीति के मोर्चे पर कई नए समीकरण बन सकते हैं। भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर बातचीत चार साल से जारी है।
केन्द्र की मोदी सरकार सख्त रुख अपनाए हुए है। डेयरी और कृषि उत्पादों के मामले में वह झुकने को तैयार नहीं है। ट्रंप की ताकत घटने से डील की शर्तें भी बदल सकती हैं या फिर इन्हें नए सिरे से तय िकया जा सकता है। अगर ट्रेड डील होती है तो ट्रंप को पहले इसे संसद से पास कराना होगा लेकिन बहुमत न होने से ट्रंप की मनमानी पर लगाम लगेगी। ट्रंप की अप्रवासन नीतियों को लेकर भारतीय आईटी पेशेवर काफी परेशान हैं। एच-1बी वीजा नियम सख्त होने से उनकी मुश्किलें बढ़ गई हैं। यही कारण है कि भारतीय मूल के प्रवासी भारतीयों में से 62 प्रतिशत ने डेमोक्रेट्स के समर्थन में वोट दिया है। हो सकता है कि डेमोक्रेट्स के दबाव में इन नियमों को सरल बनाया जाए। रूस से तेल की खरीद का अमेरिकी दबाव का कोई औचित्य नहीं रहा क्योंकि अमेरिका खुद रूस से डीजल खरीद रहा है। ट्रंप की हार अमेरिका के दोस्तों आैर दुश्मनों दोनों के लिए राहत की बात है क्योंकि कोई उनकी टैरिफ पॉलिसी से नहीं बचा। रिपब्लिकन आैर डेमोक्रेट्स दोनों ही भारत को इंडोपैसिफिक में चीन के असर को संतुलित करने के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार के तौर पर देखते हैं। ऐसी उम्मीद है कि अमेरिका-भारत रिश्ते ज्यादा भरोसेमंद हो सकते हैं। अमेरिकी मिड टर्म चुनावों में भारतीय मूल के उम्मीदवारों ने अपना अच्छा खासा दम दिखाया है। पिया डांडिया, रो खन्ना, सुहास सुब्रामण्यिम, प्रतिमा जयपाल ने जीत हासिल की है जबकि अरुणा मिलर, मेरीलैंड की लेफ्टीनेंट गवर्नर के पद पर बनी रही। 30 से अधिक भारतीय मूल के लोगों ने जीत हासिल की है। देखना होगा कि अब नया वर्ल्ड आर्डर क्या रूप लेता है।
लेम-डक ट्रंप और भारत
Summary :
अमेरिका के मिडटर्म चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में जनता जनार्दन ही सर्वोच्च है। अमेरिका की जनता ने सर्वशक्तिमान डोनाल्ड ट्रंप को दिन में ही तारे दिखा दिए। डोनाल्ड ट्रंप अब ऐसी लेम डक (लंगड़ी बत्तख) बन गए हैं जिनके अधिकारों पर अंकुश तो लगा है लेकिन बादशाहत बरकरार है। उन्होंने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत खो दिया है। अमेरिकी मिडटर्म चुनावों का असर घरेलू राजनीति पर तो पड़ेगा ही लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। इस हार से वैश्विक राजनीति और वर्ल्ड आर्डर पर प्रभाव पड़ना तय…


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