राहुल की सियासी चुनौती

Summary :

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से जब यह कहा कि यदि उन्हें प्रधानमंत्री बनना है तो वे जीवनभर प्रतीकात्मक संसद में ही बने रहें, क्योंकि वास्तविक संसद में उनका नंबर कभी नहीं आएगा, तो उनकी टिप्पणी पूरी तरह निराधार नहीं थी। शाह ने कहा था, यदि आप प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, तो पूरी जिंदगी नकली संसद में बिताइए। आपका नंबर कभी नहीं आएगा। गौरतलब है कि हाल ही में विपक्षी गठबंधन ने प्रतीकात्मक संसद का आयोजन किया था। इसका उद्देश्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सांकेतिक रूप से महाभियोग की…

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से जब यह कहा कि यदि उन्हें प्रधानमंत्री बनना है तो वे जीवनभर प्रतीकात्मक संसद में ही बने रहें, क्योंकि वास्तविक संसद में उनका नंबर कभी नहीं आएगा, तो उनकी टिप्पणी पूरी तरह निराधार नहीं थी। शाह ने कहा था, यदि आप प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, तो पूरी जिंदगी नकली संसद में बिताइए। आपका नंबर कभी नहीं आएगा।
गौरतलब है कि हाल ही में विपक्षी गठबंधन ने प्रतीकात्मक संसद का आयोजन किया था। इसका उद्देश्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सांकेतिक रूप से महाभियोग की कार्रवाई करना था। विपक्ष ने उन पर चुनावी प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए दावा किया था कि चुनावों को प्रभावित करने के लिए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इसके एक दिन बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तेलंगाना के हैदराबाद में भाजपा की ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा का नेतृत्व किया। इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी और उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाओं पर कटाक्ष किया।
शाह ने कहा था ‘राहुल जी मेरी बात सुनिए। दो दिन पहले आपने प्रतीकात्मक संसद का आयोजन किया था। यदि आप मुझसे सलाह लेते तो मैं आपको सुझाव देता कि इस प्रतीकात्मक संसद में आप एक बार प्रधानमंत्री बन जाइए। इसके लिए आपको नेता प्रतिपक्ष बनने की भी आवश्यकता नहीं होगी। ऐसा क्यों? क्योंकि आप वास्तविक संसद में कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे। प्रतीकात्मक संसद में तो यह संभव है और इससे शायद सोनिया जी के मन को भी शांति मिल जाए। चुनावी नतीजे अप्रत्याशित होते हैं और मतदाताओं का रुझान किसी भी दिशा में जा सकता है लेकिन शाह की इस टिप्पणी को सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता। बेशक, शाह की यह बात उनकी अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करती हो और भाजपा के लिए सुनने में सुखद हो। संभव है कि विपक्ष का एक वर्ग भी इससे सहमत हो। लेकिन फिलहाल जमीनी हकीकत शाह के तर्क को बल देती दिखाई देती है। हालांकि शाह की टिप्पणी का एक तार्किक आधार भी है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी के व्यक्तित्व और राजनीतिक नेतृत्व में उल्लेखनीय निखार आया है, लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि उन्हें अभी लंबा रास्ता तय करना है।
यदि राहुल गांधी की राजनीतिक उपलब्धियों और कमियों का विश्लेषण किया जाए तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने एक ऐसे विपक्ष में नई जान फूंकने का काम किया है, जो अन्यथा काफी निष्क्रिय दिखाई देता था। भले ही विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में व्यापक एकजुटता को लेकर कई कमियां हों लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्षी दल एकजुट नजर आते हैं।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों को याद कीजिए जब राहुल गांधी की जेब में रखी लाल रंग की संविधान पुस्तिका ने भाजपा के ‘अबकी बार 400 पार’ के नारे की हवा निकाल दी थी। जिन लोगों को इसकी जानकारी नहीं है, उनके लिए बता दें कि यह लाल पुस्तिका भारतीय संविधान का संक्षिप्त जेब में रखकर ले जाने योग्य संस्करण है, जिसे गांधी अपने पूरे चुनाव प्रचार अभियान के दौरान नियमित रूप से साथ रखते थे। उन्होंने लगातार यह मुद्दा उठाया कि यदि भाजपा दोबारा सत्ता में आती है तो वह अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप संविधान में बदलाव करेगी, जिससे पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और समाज के वंचित एवं कमजोर तबकों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
राहुल गांधी का यह संदेश काफी प्रभावी साबित हुआ। 400 से अधिक सीटें जीतने की उम्मीद लगाए बैठी भाजपा बहुमत के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच सकी। सभी को याद होगा कि सत्ता बरकरार रखने और नरेंद्र मोदी को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को गठबंधन सहयोगियों के साथ काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्ष 2024 में भाजपा अपनी राजनीतिक लोकप्रियता के शिखर पर थी। ऐसे में महज 240 सीटों पर सिमट जाना उसके लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था। इसके मुकाबले विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ने 234 सीटें हासिल कीं, जो भाजपा की कुल सीटों से महज सात कम थीं। इससे भी अहम यह रहा कि कांग्रेस ने 99 सीटों पर जीत दर्ज की।
लेकिन यहीं ठहरकर एक बात समझने की जरूरत है। भाजपा को चुनौती देना सत्ता में आने या प्रधानमंत्री पद पर नजरें गड़ाने के समान नहीं है। इन दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गांधी भाजपा की कथित गलत नीतियों और कार्यों को लगातार उजागर करके जनमानस में अपनी जगह बनाने में सफल रहे हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मुकाबला राहुल गांधी बनाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हो गया है। इस मोर्चे पर दोनों के बीच कोई सीधी प्रतिस्पर्धा नहीं दिखाई देती।
यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी के कट्टर आलोचक भी इस बात को स्वीकार करेंगे कि देश का नेतृत्व करने, परिपक्व निर्णय लेने और देश को स्थिरता की दिशा में आगे ले जाने की क्षमता और दृढ़ संकल्प मोदी में है। इसके विपरीत, राहुल गांधी अब तक एक कुशल, दूरदर्शी और विवेकपूर्ण राजनेता की छवि प्रस्तुत करने में सफल नहीं हो पाए हैं। यही कारण है कि यदि आम आदमी से पूछा जाए कि क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने योग्य हैं, तो संभवतः उसका जवाब नकारात्मक होगा। लेकिन क्या वह एक सफल नेता प्रतिपक्ष हैं, जिन्होंने भाजपा को प्रभावी ढंग से चुनौती दी है? इसका जवाब निश्चित रूप से हां है। कम से कम फिलहाल तो यही सच्चाई है।

Team Desk