दीया मिर्जा और दीपावली !

Summary :

भारत आदिकाल से पंथ निरपेक्ष या धर्म निरपेक्ष राष्ट्र रहा है जिसका प्रमाण हमें लंकाधिपति रावण और भगवान ब्रह्मा की सुपुत्री वेदवती के परिसंवाद से मिलता है जिसमें दोनों के बीच ब्रह्म के अस्तित्व पर शास्त्रार्थ हुआ था। भारत की यह शाश्वत संस्कृति मुसलमान सुल्तानों व बादशाहों के आठ सौ वर्ष के शासन के दौरान भी नष्ट नहीं हुई अपितु इसने इस्लाम धर्म को ही गहरे तक प्रभावित किया। इसका प्रमुख कारण यही था कि भारत प्रकृति से लेकर जीव के अस्तित्व का उत्सव मनाने वाला देश है जिसकी वजह से मौसम में आने वाले परिवर्तन को भी यहां के…

भारत आदिकाल से पंथ निरपेक्ष या धर्म निरपेक्ष राष्ट्र रहा है जिसका प्रमाण हमें लंकाधिपति रावण और भगवान ब्रह्मा की सुपुत्री वेदवती के परिसंवाद से मिलता है जिसमें दोनों के बीच ब्रह्म के अस्तित्व पर शास्त्रार्थ हुआ था। भारत की यह शाश्वत संस्कृति मुसलमान सुल्तानों व बादशाहों के आठ सौ वर्ष के शासन के दौरान भी नष्ट नहीं हुई अपितु इसने इस्लाम धर्म को ही गहरे तक प्रभावित किया। इसका प्रमुख कारण यही था कि भारत प्रकृति से लेकर जीव के अस्तित्व का उत्सव मनाने वाला देश है जिसकी वजह से मौसम में आने वाले परिवर्तन को भी यहां के लोग उत्सव के रूप में मनाते हैं। यहां तक कि मृत्यु को अन्तिम सत्य मनाते हुए मृत्योत्सव की परंपरा भी इसी देश में अवस्थित रही। भारत की इस सतत् उत्सवपूर्ण संस्कृति से इस देश में आने वाले हर धर्म के लोग प्रभावित हुए। इसीलिए मुगलकाल में हमें रसखान व रहीम जैसे कवियों की वाणी सुनने को मिली जिन्होंने भारत की धार्मिक परंपराओं व तीज-त्यौहारों के लोकोत्सव स्वरूप का वर्णन किया।
भारत के बारे में यह उक्ति सटीक बैठती है कि “छाप तिलक सब छीनी रे मो सौ नैना मिलाय के” । इसका सबसे बड़ा और प्रमुख कारण भारत के मुख्य पर्व रहे जिन्हें भारत के रहने वाले समाज के लोग पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। ये पर्व या त्यौहार किसी विशेष जाति यह वर्ग तक सीमित नहीं थे, बल्कि इनका फलक इतना विशाल था कि इन्हें मनाने वाले लोगों का धर्म नैपथ्य में चला जाता था और इनमें भाग लेने वाले लोग ही उत्सव के प्रतीक हो जाते थे। इसके मूल में सद्भाव, करुणा, सह्रदयता, सहनशीलता व सह-अस्तित्व के होने से उत्सव मनाने वालों के बीच बन्धुत्व का भाव जागृत होना स्वाभाविक था जिसके कारण हमने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को अपना आदर्श माना। इस सन्दर्भ में दीपावली के उत्सव पर मुम्बई वृहन्महापालिका द्वारा विभिन्न सामाजिक हस्तियों की त्यौहार को शालीनता से मनाने की अपील कराना एक स्वागत योग्य कदम था परन्तु फिल्मी कलाकार ‘दीया मिर्जा’ की इस बारे में जारी की गई अपील को कुछ भाजपा नेताओं ने जिस तरह धार्मिक चश्में से देखने की चेष्टा की उसकी आलोचना करने के सिवाय कुछ और नहीं किया जा सकता है। दीपावली के बारे में दीया मिर्जा केवल इसलिए क्या कोई अपील नहीं कर सकती हैं कि वह एक मुस्लिम हैं? जब अन्य मुस्लिम महिला फिल्मी कलाकार सारा अली खान के श्री केदार नाथ मन्दिर में जाकर पूजा-अर्चना करने के कृत्य को हम भारतीय संस्कृति का अंग मान सकते हैं तो दीया मिर्जा की दीपावली त्यौहार को पर्यावरण की दृष्टि से शालीनता पूर्वक मनाने की दलील को हम भारतीय संस्कृति की समावेशी पहचान क्यों नहीं मान सकते? मुम्बई महापालिका पर भाजपा का ही कब्जा है और उसी के कहने पर उन्होंने अपील भी जारी की थी मगर कुछ भाजपा नेताओं द्वारा इसकी आलोचना करने पर मुम्बई महापालिका ने उनकी अपील की वीडियो क्लिप को इंटरनेट नेटवर्क से उतार दिया जिसका स्वतः संज्ञान बम्बई उच्च न्यायालय ने लिया और आदेश दिया कि वीडियो क्लिप को पुनः लगाया जाये। उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में साफ कहा है कि वह दीया मिर्जा की वीडियो क्लिप हटाने से व्यथित है क्योंकि भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। दीया मिर्जा ने प्रदूषण रहित दीपावली मनाने की अपील की थी मगर कुछ राजनैतिक नेताओं ने उनकी इस अपील की आलोचना की और आपत्तियां खड़ी कीं। पर्यावरणीय शोर व वायु प्रदूषण की एक जनहित याचिका का स्वयं संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति गिरीश एस. कुलकर्णी व नीला के. गोखले की पीठ ने मुम्बई महापालिका द्वारा वीडियो क्लिप को हटाने पर अपनी नाखुशी जाहिर की।
अजीब संयोग है कि भाजपा द्वारा शासित महापालिका की मेयर रितू तवाडे व मुम्बई प्रदेश भाजपा अध्यक अमीत सताम ने ही दीया मिर्जा की अपील पर आपत्तियां उठाईं। दर असल दीया मिर्जा के धर्म को लेकर इन नेताओं ने दीपावली का भी साम्प्रदायिकरण करने की हिमाकत करके भारतीय संस्कृति का ही नुक्सान किया है क्योंकि मुगलों के इतिहास के सबसे क्रूर व कट्टर मुसलमान शासक औरंगजेब ने भी कभी दीपावली त्यौहार को मुगल दरबार में मनाने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जबकि उसने होली का त्यौहार मनाने व मुहर्रम पर ताजियों का जुलूस निकालने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। इसकी वजह यह थी कि वह कट्टर सुन्नी मुस्लिम था। मगर भारत तो वह देश है जिसमें हिन्दू हुसैनी ब्राह्मण भी अपने अलग ताजिये निकालते हैं और इमाम हुसैन की याद में गम का इजहार करते हैं। हम ये भूल जाते हैं कि भारतीय त्यौहारों को हिन्दुओं के बराबर ही यहां के मुस्लिम फनकार व कारीगर भी याद रखते हैं और दीपावली तो एेसा त्यौहार है जिसमें मुस्लिम आतिशगर अपने हुनर व फनकारी का इजहार बड़ेे से बड़े करिश्माई अन्दाज में करते हैं। इसी प्रकार क्या हम दशहरे पर रावण के फूंके जाने वाले पुतले को भूल सकते हैं जिसका निर्माण कार्य 90 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम कारीगर ही करते हैं। हकीकत तो यह है कि हिन्दुओं के तीज-त्यौहार मुसलमानों की शिरकत के बिना पूरे ही नहीं हो सकते यहां तक कि हिन्दू शादियां भी बिना मुस्लिम फनकारों की सहभागिता के सम्पन्न नहीं हो सकतीं क्योंकि दूल्हे की बारात के आगे बैंड बजाने वाले 99 प्रतिशत कारिन्दे मुसलमान ही होते हैं। इससे भी ऊपर दिवाली की बिजली की लड़ियों की रोशनी को शास्त्रीय रूप देने में 50 प्रतिशत के लगभग मुस्लिम इलैक्ट्रिशियन होते हैं। फिर दीया मिर्जा ने अगर दीपावली को प्रदूषण रहित मनाने की अपील जारी कर दी तो उसे साम्प्रदायिक रंग में पेश करने की कोशिश को हम भारतीय संस्कृति का अपमान नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे?

Aditya Chopra

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