ट्रंप की प्रतिष्ठा दाव पर

Summary :

अमेरिका में मंगलवार को मिडटर्म चुनावों के लिए मतदान हुआ। इन चुनावों पर दुनियाभर की नजरें लगी हुई हैं। अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में एक ही चर्चा है कि कोई भी नेता दुनिया बदलने के बड़े-बड़े दावे कर ले, कितना भी कोई ताकतवर क्यों न हो, कोई कितना भी वर्ल्ड आर्डर को अपनी चाबुक से चलाने का प्रयास करे उसका सबसे पहला मकसद अपनी सत्ता को बचाना होता है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस नियम से अलग नहीं है। यह मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता की परीक्षा तो है ही साथ ही अमेरिकी…

अमेरिका में मंगलवार को मिडटर्म चुनावों के लिए मतदान हुआ। इन चुनावों पर दुनियाभर की नजरें लगी हुई हैं। अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में एक ही चर्चा है कि कोई भी नेता दुनिया बदलने के बड़े-बड़े दावे कर ले, कितना भी कोई ताकतवर क्यों न हो, कोई कितना भी वर्ल्ड आर्डर को अपनी चाबुक से चलाने का प्रयास करे उसका सबसे पहला मकसद अपनी सत्ता को बचाना होता है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस नियम से अलग नहीं है। यह मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता की परीक्षा तो है ही साथ ही अमेरिकी कांग्रेस में उनके नियंत्रण की भी परीक्षा है। मिडटर्म चुनाव इस बात की दिशा तय करते हैं कि राष्ट्रपति के बाकी कार्यकाल में संसद का रुख क्या रहेगा। हालांकि अधिकांश चुनाव पूर्व किए गए सर्वेक्षणों में ट्रंप की पार्टी की पराजय की भविष्यवाणी की गई है। देखना यह है कि क्या ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में बहुमत गंवा देती है या नहीं। क्या ट्रंप की घटी हुई लोकप्रिया का फायदा डेमोक्रेट्स उठा पाते हैं या नहीं। भारत की नजर भी इन चुनावों पर लगी हुई है। क्योंकि इन चुनावों का सीधा असर अमेरिका के सत्ता समीकरणों पर तो पड़ेगा ही, बल्कि भारत पर भी इसका असर देखने को ​मिला है। अमेरिकी जनता इस वक्त कई मोर्चों पर ट्रंप से परेशान है।
अमेरिकी वोटरों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हमेशा उनकी जेब होती है। साल 2025 और 2026 की शुरुआत में मिडिल ईस्ट में फैले तनाव और ईरान के साथ बढ़ी तल्खी की वजह से अमेरिका में गैस, तेल और बिजली की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं, आम अमेरिकी नागरिक इस बात से परेशान है कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी लगातार महंगी होती जा रही है। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ‘अफोर्डेबिलिटी’ यानी चीजों का बजट में होना ही इस चुनाव का सबसे बड़ा निर्णायक फैक्टर बनने जा रहा है। साल 2026 के शुरुआती महीनों में आई सर्वे रिपोर्ट बताती है कि राष्ट्रपति ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग यानी लोकप्रियता में बड़ी गिरावट आई है। सबसे चिंता की बात यह है कि ग्रामीण अमेरिका, जो हमेशा से ट्रंप का सबसे मजबूत वोट बैंक रहा है, वहां भी उनके समर्थन में भारी कमी देखी गई है। ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ये घबराहट है कि अगर उनके अपने पारंपरिक वोटर ही नाराज हो गए तो संसद की बची-खुची सीटें भी हाथ से निकल जाएंगी।
सच तो यह है कि अमेरिका के लोग युद्धों से तंग आ चुके हैं। ईरान के साथ ​पिछले एक साल से चल रही तनातनी और सैन्य टकराव ने अमेरिकी जनता के मन में यह डर पैदा कर दिया है कि कहीं उनका देश अंतहीन युद्ध में न फंस जाए। मतदाता चाहते हैं कि उनकी सरकार विदेशों में लड़ने की जगह अपने देश की अंदरूनी समस्याओं पर ध्यान दे। आवर्जन और सीमा सुरक्षा भी चुनावी मुद्दा है लेकिन सरकार और प्रशासनिक तंत्र के प्रति जनता का घटता भरोसा एक चुनावी मुद्दा रहा है। मिडटर्म चुनावों को देखते हुए ट्रंप ने बहुत तिकड़में भिड़ाई। गिरगिट की तरह रंग बदला और मतदान शुरू होने से पहले ईरान के केश्म द्वीप पर हमले भी किए। इन चुनावों में भारतीय मूल के कुल 57 उम्मीदवार अलग-अलग पदों के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। 22 राज्यों में 36 भारतीय मूल के प्रत्याशी राज्य विधानसभाओं के​ लिए चुनाव लड़ रहे हैं। एक उम्मीदवार सीनेट के लिए, 11 प्रतिनिधि सभा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। इन चुनावों के जरिए भारतीय अमेरिकी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व की नई तस्वीर सामने आ सकती है।
इन मध्यावधि चुनावों को मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन और उनकी नीतियों पर एक बड़े ‘ जनमत संग्रह’ के रूप में देखा जा रहा है। यदि विपक्षी डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा या सीनेट पर नियंत्रण हासिल करने में सफल हो जाते हैं तो ट्रंप प्रशासन के लिए अपने एजेंडे और विधेयकों को पारित कराना बेहद कठिन हो जाएगा। कांग्रेस में बहुमत खोने का मतलब है कि विपक्षी दल राष्ट्रपति के फैसलों की कड़ी जांच शुरू कर सकते हैं, समन जारी कर सकते हैं और कई मामलों में प्रशासनिक नीतियों पर लगाम कस सकते हैं। यह चुनाव इस बात की भी रूपरेखा तय करेंगे कि आने वाले समय में व्हाइट हाउस और आगामी राष्ट्रपति चुनावों के लिए रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति कितनी मजबूत या कमजोर रहेगी। अमेरिका के ये मिडटर्म चुनाव भले ही घरेलू मुद्दों पर केंद्रित हों, लेकिन इसके भू-राजनीतिक और आर्थिक परिणाम भारत जैसे देशों पर भी गहरा असर डालते हैं। यदि डेमोक्रेट पार्टी संसद में मजबूत होती है तो वे राष्ट्रपति ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीतियों और व्यापार समझौतों की और अधिक सूक्ष्म जांच कर सकते हैं। इससे भारत के साथ होने वाली व्यापारिक वार्ताओं और शुल्कों पर असर पड़ सकता है।
आवर्जन और एच-1बी वीजा से जुड़े नियम भी भारतीय पेशेवरों और छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं। कांग्रेस में बदलते समीकरण इन नीतियों में फेरबदल का कारण बन सकते हैं। ट्रंप लगातार चेतावनियां दे रहे हैं कि अगर वे हारे तो वह वीटो राष्ट्रपति बन जाएंगे। हो सकता है कि वे ईरान को लेकर भी कड़ा रुख अपनाएं। कुल मिलाकर चुनाव परिणाम ही अमेरिकी लोकतंत्र की दिशा और वैश्विक कूटनीति की चाल तय करने के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे।

Aditya Chopra

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