मुसीबत बनती दिवाली ?

Summary :

मुझे बचपन की दिवाली बहुत याद आती है। साल के सबसे अच्छे त्यौहारों में एक। पहले बड़ा दीया जलता था, फिर छोटी दिवाली आती थी और उसके बाद बड़ी दिवाली। कई दिन पहले से घर में उत्साह शुरू हो जाता था। नए कपड़े आएंगे, रिश्तेदार आएंगे, मिठाइयां आएंगी, पटाखे चलाएंगे। बच्चों के लिए तो जैसे खुशियों का खजाना खुल जाता था। मिट्टी के दीये लाने, उनमें तेल और बाती डालने, फिर घर के कोने-कोने में सजाने का अपना आनंद था। हर कमरे में एक दीया जरूर रखना है। कभी तेल नीचे गिर गया, कभी बाती ठीक से नहीं जल रही,…

मुझे बचपन की दिवाली बहुत याद आती है। साल के सबसे अच्छे त्यौहारों में एक। पहले बड़ा दीया जलता था, फिर छोटी दिवाली आती थी और उसके बाद बड़ी दिवाली। कई दिन पहले से घर में उत्साह शुरू हो जाता था। नए कपड़े आएंगे, रिश्तेदार आएंगे, मिठाइयां आएंगी, पटाखे चलाएंगे। बच्चों के लिए तो जैसे खुशियों का खजाना खुल जाता था। मिट्टी के दीये लाने, उनमें तेल और बाती डालने, फिर घर के कोने-कोने में सजाने का अपना आनंद था। हर कमरे में एक दीया जरूर रखना है। कभी तेल नीचे गिर गया, कभी बाती ठीक से नहीं जल रही, कभी हवा से दीया बुझ गया तो उसे दोबारा जलाना है। इन सब कामों में पूरा परिवार लगा रहता था। आज जिन्हें हम झंझट कहते हैं, उन्हीं में तो त्यौहार का आनंद छिपा था।
रात को लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती थी। सब साथ बैठते थे। आरती के बाद कई भजन और गा लेते थे। कोई जल्दी नहीं कि बस पूजा खत्म करो और अगला काम पकड़ो। फिर मिठाई खाते और पटाखे चलाने निकल जाते। दिवाली की राह देखते थे। आज कई बार लगता है कि लोग ​दिवाली की जिम्मेदारियां निपटाने में लगे हैं। सबसे पहले तो यही चर्चा होने लगती है कि दिवाली किस दिन है। कोई कहता है आज है, कोई कहता है कल। पूजा का समय भी अलग-अलग बताया जाता है। आम आदमी सोचता रह जाता है कि आखिर सही किसकी मानें। पंचांग और तिथि की अपनी गणना होगी, लेकिन समाज को सरल और स्पष्ट जानकारी मिले, इसकी व्यवस्था तो होनी चाहिए। उसके बाद शुरू होता है गिफ्ट का हिसाब। किसको देना है? किसने पिछले साल दिया था? किससे अभी काम पड़ रहा है और किससे आगे पड़ सकता है? किसको छोटा गिफ्ट चलेगा और किसको बड़ा देना पड़ेगा? किसी को पिछले साल दिया था तो इस साल कैसे छोड़ दें? किसी नए व्यक्ति को देना शुरू कर दिया तो कहीं हर साल की जिम्मेदारी न बन जाए। त्यौहार आने से पहले ही मन में बही खाता खुल जाता है।
पहले उपहार में कुछ सोच-विचार होता था। सामने वाले के काम की चीज हो, उसकी पसंद की हो, उसे देखकर खुशी हो। अब कई जगह सबसे बड़ी चिंता यही है कि पैकेट कितना बड़ा है और कीमत कितनी होगी। सामने वाला भी कभी-कभी यही देखता है कि दूसरे को क्या दिया और मुझे क्या मिला। जिस उपहार से अपनापन बढ़ना था, उसी से तुलना और नाराजगी पैदा होने लगती है। पहले मिठाई के डिब्बे चलते थे। फिर ड्राई फ्रूट आए। उसके बाद जूस और शीतल पेय के पैक भी दिवाली के उपहार बन गए। दीयों की जगह भी अब बिजली की झालरों ने ले ली है। सजावट सुंदर लगती है, पर मिट्टी के दीये जलाने के लिए समय किसके पास है? कौन दीये लाए, कौन बाती बनाए, कौन तेल डाले? मगर बच्चों को त्यौहार से जोड़ने का अवसर भी तो इन्हीं छोटे-छोटे कामों में मिलता था। अब उन्हें तैयार सजावट दिखती है, उसे मिलकर करने का आनंद कम मिलता है।
पूजा के समय भी परिवार पूरा हो जाए तो बड़ी बात है। कोई गिफ्ट देने गया है, कोई दफ्तर से नहीं लौटा, कोई रास्ते में फंसा है। सबका इंतजार करते-करते देर होती रहती है। घर की पूजा करनी है, दफ्तर की पूजा करनी है और बीच में फोन भी लगातार बज रहा है। मन पूजा में लगे तो कैसे? फिर प्रदूषण की चिंता है। बचपन में हमने कभी इस तरह हवा का हिसाब लगाकर दिवाली नहीं मनाई थी। आज बच्चों और बुजुर्गों की सांस की तकलीफ देखकर चिंता होना स्वाभाविक है। पहले हम इस विषय पर कम सुनते थे, इसका अर्थ यह नहीं कि धुएं का असर नहीं होता था लेकिन आज समस्या इतनी गंभीर क्यों होने दी गई?
जनता से कहा जाता है कि गाड़ी कम चलाओ, निर्माण रोक दो, यह मत करो, वह मत करो। नागरिकों की जिम्मेदारी जरूर है लेकिन सरकार और संबंधित एजेंसियों की साल भर की तैयारी का हिसाब भी होना चाहिए। सड़क की धूल, कूड़ा जलना, वाहनों और उद्योगों का धुआं, पराली -हर स्रोत पर लगातार काम होना चाहिए। दिवाली के पास आकर केवल पाबंदियों की चर्चा से लोगों का भरोसा नहीं बनेगा। परिवार भी आखिरी समय तक असमंजस में रहते हैं कि पटाखों को लेकर क्या अनुमति होगी, क्या रोक होगी। स्पष्ट नियम समय रहते बताइए और उनका पालन कराइए। त्यौहार की खुशी और लोगों की सेहत, दोनों की चिंता करनी होगी।
एक और बदलाव देखता हूं, पहले आदमी कहीं भी हो, कोशिश करता था कि दिवाली पर घर जरूर पहुंचे। अब छुट्टियां जोड़कर बाहर जाने की योजना बनती है। घूमने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन साल में एक बार परिवार को साथ बैठाने वाला यह अवसर भी निकल गया तो बच्चों को अपने रीति-रिवाजों से कौन जोड़ेगा? वे पूजा, दीये, परिवार और बड़ों के साथ बैठने की यादें कहां से पाएंगे? सबसे ज्यादा अखरता है जब दिवाली को केवल पीआर बढ़ाने का अवसर बना दिया जाता है। उपहार की आड़ में किसी को प्रभावित करना, अपना काम निकलवाना या अनुचित लाभ पहुंचाना त्यौहार के भाव को चोट पहुंचाता है। स्नेह से दिया गया छोटा-सा उपहार और स्वार्थ से भेजा गया महंगा पैकेट, दोनों में फर्क है।
हमें इस दबाव को कम करना होगा। परिवार, मित्र और सोसाइटी मिलकर तय कर सकते हैं कि महंगे उपहार नहीं देंगे। कोई सीमा रख सकते हैं। कोई गिफ्ट न दे पाए तो उससे संबंध नहीं बदलेंगे। मिठाई का छोटा डिब्बा लेकर बैठिए, दो बातें कीजिए। किसी जरूरतमंद परिवार की दिवाली रोशन कर दीजिए। स्थानीय कुम्हार से कुछ दीये खरीद लीजिए। ​दिवाली पर घर की सफाई के साथ अपने मन का यह हिसाब भी साफ करना होगा कि किसने कितना दिया और हमें बदले में कितना देना है। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे और पोते-पोतियां भी दिवाली को उसी खुशी से याद करें, जैसे मैं अपने बचपन की दिवाली को करता हूं। उन्हें गिफ्ट की सूची और ट्रैफिक जाम से ज्यादा याद रहे कि उस रात पूरा परिवार साथ बैठा था, सब ने मिलकर दीये जलाए थे और घर में खूब हंसी गूंजी थी। दिवाली ऐसी हो कि उसके आने की खुशी हो उसकी तैयारियों से घबराहट न हो।

Team Desk