प्रिय त्यौहार दिवाली ने दस्तक दे दी है। ये वो पर्व है जो हमारे दिलों में प्रेम का उजियारा फैलाता है, हर दीपक जिंदगी के जश्न को जैसे ऊर्जा से भर देता है। वैमनस्य का अंधेरा छंटता है और शुभकामनाएं शक्ति का संचार करती हुई महसूस होती हैं। स्वाभाविक रूप से आप सभी की तरह दिवाली की ऊर्जा मेरे भीतर भी संचारित हो रही है, दिल स्पंदित हो रहा है लेकिन मन में उठ रहे ढेर सारे सवाल कहीं भीतर तक कंपन भी पैदा कर रहे हैं। यह कंपन इसलिए है क्योंकि हम वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास करने वाले लोग हैं और केवल खुद को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को आनंदित देखना चाहते हैं।
अभी दो दिन पहले एक ऐसा वीडियो मेरे सामने आया जिसने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया। वह वीडियो बम के छर्रों से घायल एक ऐसे छोटे से बच्चे का था जिसके शरीर पर केवल हड्डियां नजर आ रही थीं। पास में खड़ा डॉक्टर कह रहा था कि छर्रे तो हमने निकाल दिए हैं लेकिन ये बचेगा नहीं क्योंकि इसके शरीर में जख्म से लड़ने की ताकत ही नहीं है। ये कुपोषित है, मेरे मन में तब से यह सवाल कौंध रहा है कि उस बच्चे का गुनहगार कौन है? सवाल यह बिल्कुल नहीं है कि वो बच्चा कहां का था और बम किसने बरसाया था क्योंकि दुनिया में हर जगह ऐसे संघर्ष चल रहे हैं जहां बेगुनाह मारे जा रहे हैं।
बच्चे न केवल अनाथ हो रहे हैं बल्कि मौत के घाट भी उतारे जा रहे हैं, क्या आपको पता है कि इजराइल और हमास की जंग में 21 हजार से ज्यादा बच्चे मारे जा चुके हैं और इसका तो कोई आंकड़ा ही नहीं है कि कितने घायल हुए हैं। यूक्रेन और रूस की जंग हो या कहीं और संघर्ष, हर जगह यही हाल है। रेड क्राॅस की अंतर्राष्ट्रीय कमेटी और पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में कम से कम 130 सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं, कहीं दो देश लड़ रहे हैं, कहीं ढेर सारे सशस्त्र विद्रोही अपने ही देश की सरकार से लड़ रहे हैं या फिर आपस में ही एक-दूसरे की जान ले रहे हैं।
प्रमुख रूप से इन संघर्षों में हम रूस-यूक्रेन युद्ध, सूडान के गृह युद्ध, म्यांमार के भीतर चल रहे संघर्ष, इजराइल- हमास जंग, लेबनान, ईरान और यमन का जिक्र कर सकते हैं लेकिन ऐसे बहुत से संघर्ष हैं जिनकी खबरें दुनिया भर तक नहीं पहुंचतीं। हमें पता नहीं होता कि बोको हराम के इलाके में क्या चल रहा है। जब वह सैकड़ों स्कूली बच्चियों को अगवा करके अपने लड़ाकों के बीच बांट देता है तब दुनिया चौंकती है। आंकड़े बताते हैं कि कम से कम 20 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं जो किसी न किसी आतंकवादी या उग्रवादी संगठन के कब्जे में है। उनकी जिंदगी अंधेरे में डूब चुकी है लेकिन वे चाह कर भी वहां से नहीं निकल सकते।
जाएं तो जाएं कहां? संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि जंग वाले इलाकों में रह रहे करीब 18 करोड़ लोग भुखमरी की स्थिति में हैं। जंग ने बहुत सारे लोगों को घर-बार छोड़ कर भागने पर मजबूर कर दिया है, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग ने कहा है कि सबसे ज्यादा करीब 35 लाख अफगानी शरणार्थी ईरान में हैं। तुर्की में करीब 29 लाख सीरियाई शरणार्थी हैं तो जर्मनी में 27 लाख से ज्यादा सीरियाई, यूक्रेनी और अफगानी शरणार्थी हैं। यूरोप के कई देशों में शरणार्थियों की भीड़ है, जरा सोचिए कि अपने मुल्क से बेदखल होना कितना दर्दनाक होता होगा।
मैं सोच रहा हूं कि ये चांद पर जाना, सूरज को ललकारना, सारी शक्तियों द्वारा संयुक्त राष्ट्र का गठन, विकास की बड़ी-बड़ी बातें करना किस काम का है? जो धनवान है वह दूसरों को आंखें दिखा रहा है, कोई किसी की नहीं सुन रहा, जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति है। मुझे महसूस हो रहा है कि लोकमत के दीपोत्सव में जो विषय पैसा लिया है, वही सच है। पैसे से शक्ति और शक्ति से पैसा वाली स्थिति पूरी दुनिया में फैली है।
आज हम ऐसे माहौल में खड़े हैं जहां गरीबी हटाने का भाषण तो बहुत है लेकिन मन में यह सवाल पैदा होता है कि क्या गरीबी की जगह गरीबों को ही खत्म कर देने की स्थिति तो पैदा नहीं की जा रही? कहीं सूखा तो कहीं अतिवृष्टि यानी पर्यावरण के नाश का कारण ये जंग भी तो हैं। धरती पर बम गिरा रहे हैं, आकाश में मिसाइल छोड़ रहे हैं तो समुद्र में पनडुब्बियों की भरमार हो रही है और बारूद बिछाए जा रहे हैं। ऐसे अनगिनत प्रश्नों के साथ मैं दिवाली की परंपरा निभा रहा हूं। लोग अपने अंदर का दुख छिपा कर छोटी-मोटी खुशियां मना लेते हैं, मौजूदा दौर का यही दस्तूर है।
आसान नहीं है ड्रग्स के खिलाफ जंग…!
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब देश से नक्सलवाद के खात्मे का लक्ष्य रखा था तो सबने कहा था कि यह काम आसान नहीं है। मगर उन्होंने यह कर दिखाया। इसी साल 31 मार्च को नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा हुई, अब उन्होंने 31 दिसंबर 2029 तक भारत को नशा मुक्त यानी ड्रग्स से मुक्त कर देने का ऐलान किया है। निश्चित रूप से यह ऐलान पहले के सभी ऐलानों से बिल्कुल अलग है। ड्रग्स का कारोबार दुनिया में चेन की तरह ऐसा फैला है कि उस पर होने वाले सारे प्रहार कुछ कड़ियों को तो तोड़ते हैं लेकिन चेन नष्ट नहीं हो पाती। भारत उसी चेन का हिस्सा है।
ड्रग्स का कारोबार अपने आप में अकेला नहीं है बल्कि उसके साथ आतंकवाद और अपराध की कड़ियांं भी जुड़ी हुई हैं। मगर अमित शाह के बारे में एक बात तो तय है कि वे जब कोई ऐलान करते हैं तो वो हवा में बातें नहीं करते, पूरी तैयारी करने के बाद ही प्रहार करते हैं। मैं दुआ कर रहा हूं कि जिस तरह से नक्सलवाद के खात्मे का लक्ष्य उन्होंने हासिल किया है, वैसे ही भारत को ड्रग्स मुक्त करने का लक्ष्य भी हासिल करें।


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