स्वतन्त्र भारत में इसकी लोकतान्त्रिक बहुदलीय राजनीति ने विभिन्न रंग देखे हैं जिनमें एक रंग विपक्षी एकता और विखंडता का भी रहा है। आजादी के तुरन्त बाद देश को स्वतन्त्रता दिलाने वाली कांग्रेस पार्टी से ही कई नई पार्टियां निकलीं जिनमें समाजवादी गुट की पार्टियां प्रमुख थीं और 1952 के प्रथम आम चुनावों में कुल 53 राजनीतिक दलों ने चुनाव लड़ा जिनमें कांग्रेस पार्टी को लगभग 45 प्रतिशत वोट मिले और 489 लोकसभा सीटों में से 364 सीटें मिलीं, जिसके बाद सबसे ज्यादा 16 सीटें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को मिलीं,
मगर वोट केवल 3.29 प्रतिशत मिले जबकि कांग्रेस से अलग हुए आचार्य नरेन्द्र देव की समाजवादी पार्टी को 10.59 प्रतिशत वोट और 12 सीटें मिलीं और 1947 में कांग्रेस अध्यक्ष रहे आचार्य कृपलानी की कृषक मजदूर प्रजा पार्टी को 5.79 प्रतिशत वोट और 9 सीटें मिलीं, मगर आजादी के बाद बने प. जवाहर लाल नेहरू के मन्त्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले उद्योगमन्त्री डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 1951 में अपनी अलग पार्टी जनसंघ बनाई और इसे 3 सीटें मिलीं, जबकि वोट केवल 3.06 प्रतिशत मिले।
इसी प्रकार नेहरू मंत्रिमंडल के कानून मन्त्री डा. भीमराव अम्बेडकर ने इस्तीफा देकर अपनी पुरानी पार्टी अनुसूचित जाति महासंघ पार्टी को पुनर्जीवित किया और चुनाव लड़ा जिसे दो सीटें और 2.38 प्रतिशत वोट मिले। बाद में महासंघ का नाम बदल कर भारतीय रिपब्लिकन पार्टी हो गया। इस प्रकार देश के पहले चुनाव में ही विपक्षी पार्टियों को 55 प्रतिशत वोट प्राप्त हो गये थे। उस समय लोकसभा की कुल 489 सीटें होती थीं जिनमें से 314 पर एक प्रत्याशी का चुनाव हुआ और 86 में दो-दो प्रत्याशी चुने गये।
इनमें एक-एक प्रत्याशी आरक्षित अनुसूचित वर्ग से था और एक सीट पर तीन प्रत्याशी चुने गये, जिनमें एक समाज के पिछड़े वर्ग से थे, जबकि दो एंग्लो इंडियन समाज के प्रतिनिधियों को राष्ट्रपति ने नामांकित किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि पहले चुनाव में ही विपक्ष का मत प्रतिशत सत्ताधारी कांग्रेस से अधिक था। इसके बाद केवल 1984 के चुनावों में ही कांग्रेस पार्टी को 50 प्रतिशत के आसपास वोट मिले। ये चुनाव तब प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद हुए थे।
संयोग से इन चुनावों में भी कुल लड़ी गई सीटों की संख्या 500 से कम थी, क्योंकि तब असम व पंजाब में कलह व आतंकवाद की वजह से लोकसभा चुनावों को मुल्तवी रखा गया था। बाद में आचार्य नरेन्द्र देव की समाजवादी पार्टी के साथ उनके ही एक साथी और क्रान्तिकारी गांधीवादी स्वतन्त्रता सेनानी डा. राम मनोहर लोहिया के मतभेद हो जाने की वजह से अलग संयुक्त समाजवादी पार्टी बनी और आचार्य नरेन्द्र देव की पार्टी का नाम समाजवादी पार्टी से बदल कर प्रजा समाजवादी पार्टी हो गया।
अतः हम देखते हैं कि विपक्षी मतों की संख्या स्वतन्त्र भारत में 1967 तक आते- आते अपेक्षाकृत रूप से इस प्रकार बढ़ी कि इस साल हुए चुनावों में कांग्रेस का मत-प्रतिशत गिरकर 37 प्रतिशत से कुछ ऊपर रह गया। इसी वर्ष में डा. राम मनोहर लोहिया ने चुनावों से पहले यह तजवीज रखी कि यदि समूचा विपक्ष इकट्ठा होकर चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़े तो वह उसे हरा सकता है। इस बारे में उन्होंने तब भारतीय जनसंघ के नेता पं. दीन दयाल उपाध्याय से भी विचार-विमर्श किया, मगर विपक्षी दलों का महागठबन्धन नहीं बन सका और चुनावों में गैर कांग्रेसवाद का नारा गूंजता रहा।
उस समय तक लोकसभा व विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते थे। जब 1967 में चुनाव नतीजे आये तो देश के नौ राज्यों में कांग्रेस पार्टी बहुमत लाने में असमर्थ रही। अतः गैर कांग्रेसवाद के चलते इन राज्यों में कांग्रेस के ही कुछ विधायकों के विद्रोह करने के बाद उन्हीं के नेतृत्व में सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन संयुक्त विधायक दल बना कर हुआ, जिसमें धुर विरोधी दलों जैसे कम्युनिस्टों व जनसंघ के नेता मन्त्री के तौर पर एक साथ शामिल हुए।
केवल ओडिशा व पंजाब में विपक्षी दल अपने बूते पर सरकारें बनाने में सफल रहे। ओडिशा में स्वतन्त्र पार्टी के स्व. आर.पी.एन. सिंहदेव व पंजाब में अकाली दल के स्व. गुरुनाम सिंह के नेतृत्व में जनसंघ के सहयोग से सरकार बनी, परन्तु एक साल पूरा होते-होते केवल ओडिशा को छोड़कर शेष आठ राज्यों की विपक्षी गठजोड़ की सरकारें अपने ही आपसी अन्तर्द्वन्द की वजह से गिर गईं। इस प्रकार पहला विपक्षी एकता का प्रयोग भारत में पूरी तरह असफल रहा। इसके बाद जिस राज्य में भी मध्यावधि चुनाव हुए वहां लगभग सभी में कांग्रेस पार्टी को 1967 की अपेक्षा बढ़त मिली।
तब देश में इन्दिरा गांधी की कांग्रेस सरकार थी जिन्होंने 1969 में अपनी ही पार्टी का महाविभाजन राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर कर डाला था और कांग्रेस कार्य समिति के द्वारा घोषित राष्ट्रपति प्रत्याशी के खिलाफ अपना ही राष्ट्रपति प्रत्याशी मैदान में उतार दिया था। इसके बाद उन्होंने 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके और राजा-महाराजाओं का प्रविपर्स खत्म करके आम जनता में गरीबों की मदद के लिए सरकारी नीतियां बनाने का सन्देश दिया और कांग्रेस विभाजन की वजह से केन्द्र में अपनी नई विभाजित कांग्रेस की सरकार के अल्पमत में आने की वजह से 1971 के शुरू में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा कर दी।
तब उनकी पार्टी को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन प्राप्त था जिसके नेता स्व. कामरेड श्रीपद अमृत डांगे थे। इन चुनावों से पहले भी देश के सभी प्रमुख विपक्षी दलों ने संगठित होकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई और चुनाव में अपने संगठित प्रत्याशी उतारे, परन्तु तब जनमत इन्दिरा जी की समाजवादी नीतियों के पक्ष में इतना प्रबल था कि संयुक्त विपक्ष को लोकसभा की 520 सीटों में से 70 के नीचे ही सीटें मिलीं और शेष पर इन्दिरा गांधी की कांग्रेस व उनके सहयोगी दलों को सफलता मिलीं।
इस प्रकार 1971 में भी विपक्षी एकता का प्रयास असफल रहा, मगर अभी तक एकमात्र उदाहरण 1977 का है, जबकि विपक्षी एकता को सशर्त सफलता मिली। वह शर्त यह थी कि सभी विपक्षी दलों ने एक दल जनता पार्टी में अपना विलय कर लिया था। यह विलय भी मजबूरी में 1975 में इन्दिरा जी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के विरुद्ध उपजे जनरोष को संघीभूत करने की दृष्टि से स्व. जय प्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी की निगरानी में किया गया था, मगर यह पंचमेल खिचड़ी जनता पार्टी केवल दो साल ही चल पाई और इसकी सरकार ताश के पत्तों की तरह बिखर गई।
इसका सबक यही है कि विभिन्न विचारधारा वाले दल एक जगह इकट्ठा तो हो सकते हैं मगर विलयित होकर भी एकात्म नहीं हो सकते। अतः फिलहाल जिस विपक्षी एकता की बात की जा रही हैं उसे हमें अपने देश की राजनीति के तेवरों पर ही परखना होगा।


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