घटती मासूमियत, बढ़ती हिंसा

Summary :

किसी भी समाज में पनपती हिंसक प्रवृत्ति चिंता का विषय होती है। पर अगर कम उम्र के कुछ बच्चे भी मामूली बात पर हिंसक होने लगे, यहां तक कि जानलेवा हमला और हत्या तक करने लगें, तो इसे गंभीर चेतावनी के तौर पर देखा जाना चाहिए। दरअसल, पिछले दिनों देश के दो अलग-अलग प्रदेशों में हुई दो घटनाएं कई बातों पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं। बीती 28 अक्तूबर को हरियाणा के पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में 6 वर्षीय छात्रा पर आठ वर्षीय छात्र द्वारा किया गया बेरहम हमला वास्तव में बेहद विचलित करने वाला और झकझोर देने…

किसी भी समाज में पनपती हिंसक प्रवृत्ति चिंता का विषय होती है। पर अगर कम उम्र के कुछ बच्चे भी मामूली बात पर हिंसक होने लगे, यहां तक कि जानलेवा हमला और हत्या तक करने लगें, तो इसे गंभीर चेतावनी के तौर पर देखा जाना चाहिए। दरअसल, पिछले दिनों देश के दो अलग-अलग प्रदेशों में हुई दो घटनाएं कई बातों पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं।
बीती 28 अक्तूबर को हरियाणा के पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में 6 वर्षीय छात्रा पर आठ वर्षीय छात्र द्वारा किया गया बेरहम हमला वास्तव में बेहद विचलित करने वाला और झकझोर देने वाला है। स्कूल परिसर के भीतर हुई इस हिंसक घटना और सामने आए सीसीटीवी फुटेज ने न केवल प्रशासन, बल्कि पूरे समाज, माता-पिता और शिक्षा व्यवस्था को आत्मचिंतन करने पर मजबूर कर दिया है। विगत 31 अक्तूबर को आंध्र प्रदेश के राप्ताडु में एक सरकारी स्कूल में 21 साल के हेमंत ने स्कूल की कक्षा में घुसकर 10वीं की दो छात्राओं पर चेनसॉ (आरी) से हमला कर दिया था। इस हमले में दोनों छात्राएं गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। दोनों घटनाएं समाज के लिए चेतावनी के तौर पर देखी जानी चाहिए। विशेषकर बच्चों का हिंसक व्यवहार और प्रवृत्ति चिंता का बड़ा विषय है।
पंचकूला की घटना ने बच्चों की परवरिश और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इतनी कम उम्र में बच्चे के अंदर इस तरह का गुस्सा और हिंसक व्यवहार होना चिंता की बात है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। अगर बच्चे को घर में मारपीट का सामना करना पड़ता है या वह माता-पिता के बीच हिंसा देखता है तो उसके मन में यह बात बैठ सकती है कि गुस्सा आने पर मारपीट करना सामान्य है।
आंध्र प्रदेश के सरकारी स्कूल में दिनदहाड़े भरी हुई क्लास में ऐसा हमला सभी अभिभावकों के हौसले पस्त करता है। अभी तक स्कूल में बाहर से आकर ऐसी हिंसा सिर्फ अमरीका जैसे देश में सुनाई पड़ती थी जहां बंदूकों से लोगों को थोक में मारने की एक सिरफिरी संस्कृति है। लेकिन बैटरी से चलने वाली पेड़ तक काट डालने वाली ऐसी भयानक आरा मशीन से किसी पर हमले का ऐसा मामला तो स्कूल तो छोड़ दें, किसी और जगह भी सुनाई नहीं देता है।
आज हमारा समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां बच्चों का मासूम चेहरा धीरे-धीरे आक्रोश और आक्रामकता की परत के पीछे छिपता जा रहा है। अखबारों और सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसी खबरें देखने को मिलती हैं जहां स्कूली बच्चे आपसी विवाद में एक-दूसरे पर जानलेवा हमला कर देते हैं या छोटी सी बात पर माता-पिता से हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। बच्चों में बढ़ती यह हिंसक प्रवृत्ति न केवल उनके भविष्य को अंधकार में धकेल रही है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। आखिर हमारे नौनिहाल इतने आक्रामक क्यों हो रहे हैं? इस समस्या की जड़ों को समझना आज बेहद जरूरी हो गया है।
आज के दौर में बच्चों का एक बड़ा समय स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी के सामने बीतता है। ‘पबजी’ और ‘फ्री फायर’ जैसे मारधाड़ वाले हिंसक वीडियो गेम्स और वेब सीरीज बच्चों के कोमल मन पर गहरा असर छोड़ रही हैं। लगातार स्क्रीन पर खून-खराबा और लड़ाई देखने से बच्चों के भीतर का संवेदी तंत्र सुन्न हो जाता है और वे असल जिंदगी में भी हिंसा को एक सामान्य समाधान मानने लगते हैं। अब हरियाणा के उस छोटे बच्चे पर लौटें, जो कि अपनी ही स्कूल की छोटी सी बच्ची पर इतनी भयानक हिंसा का मजा ले रहा था, तो उसके बारे में आई शुरुआती जानकारी बताती है कि वह कोई हिंसक वीडियो गेम खेलने का शौकीन था।
आजकल मोबाइल पर रील, फिल्मों और सीरियल में दिखाई जाने वाली हिंसक सामग्री का भी बच्चों पर असर पड़ रहा है। कई बार उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझ नहीं आता और वे ऐसी चीजों को सामान्य व्यवहार मानने लगते हैं। आज जिन लोगों को अपने बच्चों को पिस्तौल, मशीनगन, तलवार, गदा, त्रिशूल, या दूसरे किस्म के हथियारों के खिलौने देने में कुछ अटपटा नहीं लगता है, उन्हें भी यह समझने की जरूरत है कि न तो बड़ों के देखे जाने वाले हर किस्म के हिंसक टीवी सीरियल या सिनेमा बच्चों के लायक रहते हैं, और न ही हथियारों वाले खिलौनों का असर मासूम रहता है। रिसर्च से पता चलता है कि अगर कारण को खत्म कर दिया जाए तो उनके हिंसक व्यवहार को काफी कम या फिर खत्म किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिंसा से ही हिंसा होती है। इसलिए बच्चों को हिंसक चीजों, टेलिविजन शोज आदि से दूर रखना चाहिए।
बच्चे अपने आसपास जो देखते हैं, वही सीखते हैं। यदि घर का माहौल तनावपूर्ण है, माता-पिता के बीच लगातार झगड़े होते हैं या बच्चों को सुधारने के नाम पर उन पर गंभीर शारीरिक व मानसिक दंड (मारपीट) का प्रयोग किया जाता है, तो बच्चे भी गुस्से को व्यक्त करने के लिए इसी हिंसक रास्ते को अपना लेते हैं। समाज विज्ञानियों और मनोचिकित्सकों के मुताबिक, माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के डिजिटल कंटेंट पर नजर रखें। उन्हें हिंसक गेम्स की जगह रचनात्मक और ज्ञानवर्धक गतिविधियों से जोड़ें। बच्चों के साथ रोजाना समय बिताएं और उनसे खुलकर बात करें। घर के माहौल को शांतिपूर्ण रखें ताकि वे असुरक्षित महसूस न करें। स्कूलों और परिवारों में बच्चों को नैतिक मूल्यों, सहानुभूति और क्रोध नियंत्रण के तरीके सिखाए जाने चाहिए। योग और खेलकूद भी उनकी ऊर्जा को सही दिशा देने में मददगार हैं।
पंचकूला के एक स्कूल में 8 साल के बच्चे द्वारा 6 साल की मासूम पर किया गया जानलेवा हमला कोई मामूली घटना नहीं, हमारे समाज के सड़ चुके सिस्टम का लाइव सबूत है। जब एक तीसरी क्लास का बच्चा इतनी क्रूरता से सिर फोड़ने लगे, तो समझ जाइए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है। हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को जिस अंधेरे में धकेल रहे हैं, उसके तीन बड़े जिम्मेदार हम खुद हैं। रोते बच्चे को चुप कराने के लिए जो मोबाइल आपने थमाया था, उसके हिंसक गेम्स ने उनके भीतर के ‘इंसान’ को मारकर उन्हें असंवेदनशील रोबोट बना दिया है। बच्चे वही उगलते हैं जो घरों में निगलते हैं। अगर माता-पिता की पृष्ठभूमि, उनकी बातचीत और सोशल मीडिया फीड में नफरत, गुस्सा और जहर भरा होगा, तो बच्चे कभी शांत नहीं हो सकते। मैदान छूट गए, नैतिक कहानियां खत्म हो गईं। अब बच्चों के पास स्क्रीन है, संस्कार नहीं।
बच्चे देश का भविष्य और समाज का आईना होते हैं। यदि वे हिंसक हो रहे हैं, तो इसके लिए कहीं न कहीं हमारी आधुनिक जीवनशैली, ढीली पड़ती पारिवारिक व्यवस्था और सामाजिक उपेक्षा जिम्मेदार है। इस संकट से निपटने के लिए माता-पिता, शिक्षकों और पूरे समाज को मिलकर प्रयास करने होंगे। हमें बच्चों को एक ऐसा सुरक्षित और प्यार भरा माहौल देना होगा जहां वे अपने गुस्से को रचनात्मकता में बदल सकें, न कि हिंसा में।

राजेश माहेश्वरी