हमारे लोकतंत्र में सरकारें सड़क पर जमा भीड़ से नहीं, बल्कि कतार में लगे वोटों से बदलती हैं। हमारे युवा इस बात को किसी भी अन्य व्यक्ति से बेहतर समझते हैं और जानते व मानते भी हैं। आप सभी ने चुनाव के दिन यह दृश्य देखा होगा। आपके क्षेत्र के सरकारी स्कूल के बाहर सुबह-सुबह ही एक कतार लगनी शुरू हो जाती है। एक बुजुर्ग महिला अपने पोते का हाथ थामे आती हैं। कोने की दुकान वाला दुकानदार अपनी दुकान आधी बंद करके लाइन में शामिल हो जाता है। एक युवा डिलीवरी बॉय अपनी बाइक पेड़ के नीचे खड़ी करता है और कतार में खड़ा हो जाता है और उसी कतार में कहीं उन्नीस साल की एक युवा छात्रा भी खड़ी होती है, जो थोड़ी घबराई हुई है, क्योंकि वह अपने जीवन में पहली बार वोट देने जा रही है। यही कतार ही हमारा लोकतंत्र है। वहां कोई नारे नहीं लगाता। हर कोई अपनी बारी का इंतजार करता है और दिन के अंत में, यही कतार तय करती है कि देश कौन चलाएगा।
यहां तक कि जब आपातकाल (Emergency) लगी थी और हमारे अधिकार छीन लिए गए थे, तब साधारण मतदाताओं की इसी कतार ने 1977 में लोकतंत्र को वापस ला खड़ा किया था। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वोट देने का यह अधिकार हमें आसानी से नहीं मिला। भारत के युवाओं ने इसके लिए अपने प्राणों की आहुति दी है। आज के युवा भारतीय ऊर्जा और नए विचारों से भरे हुए हैं। किसी भी कॉलेज कैंटीन में थोड़ी देर बैठिए और आप उन्हें नए स्टार्टअप्स, परीक्षाओं, क्रिकेट और राजनीति के बारे में एक साथ बात करते हुए सुनेंगे। मुझे यह पसंद है। जिज्ञासु युवा ही कल ज्ञान देने वाला बनेगा। सवाल पूछने वाला युवा देश के लिए अच्छा होता है। उनमें से कई बड़े काम कर रहे हैं। दो युवा लड़कों ने विदेश में अपनी पढ़ाई छोड़ दी, भारत वापस आए और ‘जेप्टो’ (Zepto) नाम से एक कंपनी शुरू की। 22 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उनकी कंपनी का मूल्य एक अरब डॉलर से अधिक हो गया। उनके जैसे युवा छोटे शहरों और बड़े शहरों में नए-नए व्यवसाय स्थापित कर रहे हैं और फिर हमारी कतार का वह युवा डिलीवरी बॉय है। वह आजीविका कमाने के लिए गांव से शहर आया है।
सौ से भी अधिक वर्ष पहले स्वामी विवेकानंद जी ने भारत के युवाओं से यही कहा था। आज के युवा भारतीय ठीक वही कर रहे हैं। यह पीढ़ी तब भी आवाज उठाती है जब कुछ गलत दिखता है, और उसे ऐसा करना भी चाहिए। जब इस गर्मी में परीक्षा के पेपर लीक हुए, तो छात्र आक्रोशित थे और उनका गुस्सा बिल्कुल वाजिब था। वह मामले की तह तक जानना चाहते थे। उन्होंने अपनी आवाज उठाई और सरकार ने उनकी बात सुनी। परीक्षा सुधार पर एक टास्क फोर्स का गठन किया गया और संसद में एक कड़ा कानून लाया गया। लोकतंत्र को इसी तरह काम करना चाहिए।
लेकिन अपनी आवाज उठाने और इस्तेमाल होने (दिशाभ्रमित होने) में अंतर होता है। पिछले कुछ हफ्तों में, जो विरोध प्रदर्शन परीक्षा के पेपर लीक को लेकर शुरू हुआ था, उसे धीरे-धीरे पूरी तरह से एक अलग दिशा में मोड़ दिया गया है। लोकतंत्र को हराने के लिए भीड़ तंत्र का सहारा लिया गया। युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास किया गया।
नया निशाना मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR- Special Intensive Revision) है। इसे समझने के लिए, एक बार फिर उस कतार के बारे में सोचिए। पंक्ति केवल उतनी ही शुद्ध हो सकती है जितनी कि मतदाता सूची। SIR का उद्देश्य इसे रोकना ही है। पश्चिम बंगाल में, जब अधिकारियों ने घर-घर जाकर सत्यापन किया, तो उन्होंने मतदाता सूची में 24 लाख से अधिक नामों को मृत के रूप में चिह्नित किया। ये केवल घर-घर के दौरों के दौरान दर्ज किए गए कारण थे, हर व्यक्ति पर अंतिम निर्णय नहीं था। कोई भी वास्तविक मतदाता अभी भी आपत्ति दर्ज करा सकता है और अपना नाम वापस जुड़वा सकता है। यह पूरी तरह से न्यायसंगत है। 27 मई 2026 को, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने बिहार SIR आयोजित करने के निर्वाचन आयोग के अधिकार को बरकरार रखा, साथ ही नोटिस जारी करने, जवाब देने का अवसर देने और कानूनी उपचारों तक पहुंच जैसी सुरक्षा उपायों पर भी जोर दिया। 2000 के दशक की शुरुआत में गहन पुनरीक्षण के दौरान, कंप्यूटर या ऐप के बिना, हाथों से घर-घर जाकर सत्यापन किया गया था ताकि फर्जी, दोहरी और मृत प्रविष्टियों को हटाया जा सके और चुनाव हेतु वैधता की आयु पूरी करने वाले नए युवा मतदाताओं को जोड़ा जा सके। उस दौरान बनाई गई बिहार की 2003 की मतदाता सूची उन सूचियों में से एक है जिनका उपयोग आज जांच के लिए किया जा रहा है और याद रखिए, यह काम गुप्त रूप से नहीं किया जाता है। प्रत्येक मान्यता प्राप्त दल इस प्रक्रिया पर नज़र रखने के लिए अपने बूथ-स्तरीय एजेंट (BLA) नियुक्त कर सकता है।
हममें से जो उम्र के बड़े हैं, उन्हें याद है कि देश के कुछ हिस्सों में चुनाव कैसे हुआ करते थे। बैलेट पेपर (मतपत्र) के दौर में, विशेषकर 1970 और 1980 के दशक में, सशस्त्र बाहुबल लोग मतदान केंद्र में घुस जाते थे, मतदान कर्मियों को भगा देते थे, सैकड़ों बैलेट पेपरों पर मोहर लगाते थे और उन्हें पेटियों में ठूंस देते थे। कई गांवों में गरीब लोग, बुजुर्ग और महिलाएं मतदान केंद्र पहुंचते तो उन्हें बताया जाता कि उनका वोट तो पहले ही पड़ चुका है। इसे ‘बूथ कैप्चरिंग’ (Booth Capturing) कहा जाता था। यह इतना आम हो गया था कि 1989 में संसद को इसे एक विशेष अपराध बनाना पड़ा और ऐसे बूथों पर पुनर्मतदान कराने का प्रावधान करना पड़ा। कई युवा अच्छी नीयत की चाह और राह से इन प्रदर्शनों में शामिल हुए। वे यह जानने के हकदार हैं कि अब उन्हें किस दिशा में ले जाया जा रहा है। 15 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (Cockroach Janta Party) के नेताओं के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा: “हम सभी तख्तापलट/सत्ता परिवर्तन (regime change) चाहते हैं। क्या इसमें कुछ गलत है?” उसी मंच पर बैठे एक छात्र नेता ने बांग्लादेश के युवा प्रदर्शनकारियों को “हमें रास्ता दिखाने के लिए धन्यवाद दिया। क्या नई सरकार चाहना गलत है? बिल्कुल नहीं। लेकिन भारत में सरकार कतार में खड़े होकर बदली जाती है, भीड़ द्वारा नहीं। अगला लोकसभा चुनाव 2029 में होना है। जो भी बदलाव चाहता है, वह जनता के बीच जा सकता है और उनका वोट जीत सकता है। गलत बात यह है कि कतार को लांघने की कोशिश की जाए और छात्रों का भीड़ की तरह इस्तेमाल करके उन्हीं संस्थानों पर दबाव बनाया जाए जो हर नागरिक के वोट की रक्षा करते हैं।
इससे पहले कि कोई हमारे युवाओं को किसी दूसरे देश की नकल करने की सलाह दे, आइए देखें कि वहां वास्तव में क्या हुआ था। श्रीलंका में 2022 में, उग्र भीड़ राष्ट्रपति भवन में घुस गई और राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा। बांग्लादेश में, छात्रों ने 2024 में सरकार को गिरा दिया। नेपाल में, सितंबर 2025 के प्रदर्शनों में 77 लोगों की जान चली गई। संसद भवन को आग लगा दी गई और 84 अरब रुपये से अधिक की संपत्ति नष्ट हो गई। इस शरद ऋतु (autumn) में यूरोप में भी यही स्थिति देखी गई है। फ्रांस में, स्कूल के छात्र सबसे पहले इसलिए सड़कों पर आए क्योंकि उनकी कक्षाओं में भीड़ अधिक थी और शिक्षक अनुपस्थित थे। जबकि अधिकांश छात्रों ने शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन किया, आंदोलन के कुछ हिस्से आगजनी और शिक्षकों पर हमलों में बदल गए, यहां तक कि पुलिस की कार्रवाई भी जांच के दायरे में आ गई। हमने भारत में भी ऐसा देखा है। राजनीति में कुछ लोग आग लगाने में बहुत तेज़ होते हैं और उससे दूर भागने में उससे भी तेज़। एक बार मुसीबत शुरू हो जाने पर, वे अचानक विदेश में छुट्टियों पर निकल जाते हैं, जबकि युवा लड़के-लड़कियों को पुलिस मामलों, चोटों और अदालतों का सामना करने के लिए छोड़ दिया जाता है। हमारे युवा ऐसे नेताओं से बेहतर के हकदार हैं जो उनका इस्तेमाल करते हैं और फिर छुट्टियों पर चले जाते हैं।
हमारी आजादी युवा भारतीयों के खून से जीती गई थी। हम अपनी राजनीति के लिए अपने स्वार्थ वाले कुछ लोगों को इसे हमसे छीनने नहीं दे सकते। युवाओं को भी इस बात को ठीक से समझना होगा। असली कीमत हमेशा वे लोग चुकाते हैं जो कभी भीड़ का हिस्सा ही नहीं थे। 10 अक्टूबर को दिल्ली में पुलिस के छह जवानों के घायल होने की खबर आई थी। उनमें से पिंक फोर्स की एक महिला कांस्टेबल ने मीडिया को बताया कि भीड़ में शामिल महिलाओं ने उनकी उंगली मरोड़ दी जिससे उसमें फ्रैक्चर हो गया। हर वर्दी के पीछे एक परिवार होता है। क्या इन पुलिसकर्मियों के मानव अधिकार नहीं हैं? पुलिस कर्मी के साथ ऐसे दुर्व्यवहार के सैकड़ों किस्से हैं।
और हमारी कतार के उस डिलीवरी बॉय के बारे में सोचिए। जब एक दिन के लिए सड़क बंद कर दी जाती है, तो वह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाता। वह बस एक दिन की कमाई खो देता है। वह भी निष्पक्ष परीक्षा, स्वच्छ मतदाता सूची और अधिक नौकरियां चाहता है, लेकिन वह यह सब एक काम करने वाली व्यवस्था के माध्यम से चाहता है। आंदोलन उनकी रोटी छीनता है।
हमारे संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को स्वतंत्र रूप से बोलने और “शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 51A प्रत्येक नागरिक से “सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करने और हिंसा से दूर रहने की अपेक्षा करता है। अधिकार और कर्तव्य एक साथ चलते हैं। महात्मा गांधी ने 1925 में यंग इंडिया’ में लिखा था: सरल शब्दों में कहें तो जब दरवाजा खुला हो तो दीवार तोड़ने की जरूरत नहीं असहमति ठीक है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन पत्थर फेंकना विरोध प्रदर्शन नहीं है और किसी महिला पुलिसकर्मी की उंगली तोड़ना आंदोलन नहीं है। जो लोग कानून तोड़ते हैं, उन्हें हर बार नए बहाने के साथ नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए मैं कतार में खड़ी उस उन्नीस साल की लड़की के पास वापस आता हूं। उससे और हर युवा भारतीय से मैं कहना चाहता हूं कि सवाल पूछते रहिए, और हमारी सरकार सहित हर सरकार से सवाल पूछिए। मतदाता सूची में अपना नाम जांचिए, और अपने दादा-दादी, बुजुर्गों को उनका नाम जांचने में मदद कीजिए। लोकतंत्र में हम कतार में इंतजार करते हैं और जनता का फैसला सर्वोपरि है। भीड़तंत्र में, भीड़ अपना रास्ता बनाती है और सभी के लिए फैसला थोपने का प्रयास करती है। इसका उचित अनुचित का कुछ वास्ता नहीं है। भगत सिंह और खुदीराम बोस ने अपने प्राणों की आहुति इसलिए दी ताकि हम उस कतार में खड़े हो सकें। मुझे पूरा विश्वास है कि भारत के युवा जानते हैं कि वे किस कतार से ताल्लुक रखते हैं। उनकी कतार से लोकतंत्र की शुद्ध व्यवस्थाओं का निर्माण हो, देश का कल्याण हो।
(लेखक केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख के भाजपा प्रभारी हैं। )
यह लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र है !
Summary :
हमारे लोकतंत्र में सरकारें सड़क पर जमा भीड़ से नहीं, बल्कि कतार में लगे वोटों से बदलती हैं। हमारे युवा इस बात को किसी भी अन्य व्यक्ति से बेहतर समझते हैं और जानते व मानते भी हैं। आप सभी ने चुनाव के दिन यह दृश्य देखा होगा। आपके क्षेत्र के सरकारी स्कूल के बाहर सुबह-सुबह ही एक कतार लगनी शुरू हो जाती है। एक बुजुर्ग महिला अपने पोते का हाथ थामे आती हैं। कोने की दुकान वाला दुकानदार अपनी दुकान आधी बंद करके लाइन में शामिल हो जाता है। एक युवा डिलीवरी बॉय अपनी बाइक पेड़ के नीचे खड़ी करता…


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