घटना लखनऊ से है। पिछले सप्ताह एक ख़ाली जगह पर पार्किंग को लेकर झगड़ा हो गया। एक ने दूसरे को ईंट मारी तो दूसरे ने पिस्तौल निकाल कर दो गोली दाग दी, फिर पिस्तौल को रिलोड कर तीन और गोलियां चलाईं। तीन लोग मारे गए। हत्यारा मर्चेंट नेवी में अफ़सर है। इतनी सी बात पर तीन लोग अपनी जान गंवा बैठे। दु:ख है कि ऐसे मामले अक्सर सुनने को मिल रहे हैं जहां उत्तेजित होकर लोग मरने-मारने पर उतर आते हैं। देश की सड़कों पर रोज़ाना ऐसा हो रहा है जहां प्रतिक्रिया उत्तेजना से कहीं अधिक हो रही है, कहीं कोई रोकने पर सिक्योरिटी गार्ड पर हमला कर रहा है, तो कोई डिलीवरी ब्वाय को लेट आने पर थप्पड़ मार रही है। पति-पत्नी के झगड़े हिंसक होने के समाचार भी आम मिल रहे हैं।
मेरठ में एक व्यक्ति कई महीने स्कूटर पर सवार होकर आते-जाते लोगों को थप्पड़ मारता रहा। उसका बहाना था कि पिता की मौत हो गई और मां ने दूसरी शादी कर ली है इसलिए वह डिप्रेशन में है। पिछले महीने गुजरात के गांधीनगर में सड़क क्रास करने को लेकर झगड़े के बाद ग़ुस्से में एक आदमी ने दूसरे का दांया कान ही काट लिया। जून में मुम्बई की लोकल ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास डिब्बे का दरवाज़ा बंद करने से शुरू हुआ टकराव जल्द हिंसक हो गया जब एक ने चाकू निकाल कर दूसरे को मार डाला। दिल्ली की मैट्रो में सीनियर सिटीज़न के लिए रिसर्व सीट को लेकर टकराव ने बदसूरत मोड़ ले लिया, जब एक ने दूसरे को धक्का मारा। उसके िसर को जानलेवा चोट पहुंची और उसकी मौत हो गई। उल्लेखनीय है कि धक्का मारने वाला रिटायर्ड आईएएस अधिकारी है। पंजाब में हाल ही में बड़ा क़िस्सा होकर हटा है जब मानसा में एक सामाजिक कार्यकर्ता एक कैमिस्ट को नशा बेचने से रोकने के लिए गया तो कैमिस्ट ने अपनी पिस्तौल निकाल कर उसे गोली मार दी। ऐसी मिसालों से देश भरा हुआ हो। हम अनुशासनहीन, गुस्सैल, हिंसक, उन्मादी और धर्मांध बनते जा रहे हैं। दूसरे के प्रति असहनशील है। ग़ुस्सा इतना है कि ऑन लाइन गालियां निकालना आम हो गया है। स्वस्थ मतभेद की तो गुंजाइश ही नहीं रही। लगता है हम नकारात्मक भावनाओं से भरे हुए हैं। नफ़रत टपक रही है। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि लोगों में जब बहुत तनाव और बेचैनी हो तो वह जल्द क्रोधित हो जाते हैं। इसके कई कारण लगते हैं। सबसे बड़ा कारण है कि लोग महसूस कर रहे हैं कि उनकी ‘क्वालिटी ऑफ़ लाइफ’ कमजोर हो गई है, जो अपनी ज़िंदगी से संतुष्ट हैं उनकी बहुत कम संभावना है कि वह क्रोधित होंगे या हिंसा का सहारा लेंगे। हिंसा का अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण करने वाली संस्था एसीएलडी के अनुसार 2026 भारत में सबसे अधिक प्रदर्शनों का साल रहा है। इसका अर्थ यह है कि आम भारतीय अपनी ज़िंदगी से संतुष्ट नहीं है और उसकी हताशा बार-बार फूट रही है। अब तो दिल्ली पुलिस के कुछ अफ़सर और जवान प्रदर्शन कर हटे हैं। यह भी दिलचस्प है कि समाज का जो वर्ग अधिक असंतुष्ट और क्रोधित हैं वह पढ़े-लिखे और तुलनात्मक समृद्ध लोग हैं। जिन्हें कमजोर वर्ग कहा जाता है इनमें ऐसी बेचैनी कम है।
समस्या परिवार से शुरू होती है जिसकी तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। पंचकूला की हाल की घटना सब को शॉक करने वाली है। तीसरी जमात के आठ साल के एक बच्चे ने केजी की छह साल की लड़की को मार-मार कर अधमरा कर दिया। लड़के की शिकायत थी कि बच्ची ने उसे ‘पागल’ कहा है। यह लड़का इतना क्रोधित और आक्रामक कैसे बन गया? उसके अंकल का कहना है कि बच्चा ऑनलाइन गेम PUBG पर अक्सर व्यस्त रहता था जिसने उसमें क्रोध भर दिया। परिवार को क्यों नहीं पता चला कि उनका बच्चा ऐसी ख़तरनाक मानसिक हालत में है? जब कोई बच्चा अनियंत्रित हो जाता है या कानून अपनी हाथ में लेने लगता है तो समाज और शिक्षा संस्थानों को इसके लिए दोषी ठहराया जाता है, पर समस्या घर से शुरू होती है। केरल में एक 17 साल के लड़के ने अपने बाप की मर्सडीज़ कार एक सकूटरिस्ट पर चढ़ा दी जिसकी मौत हो गई। मां-बाप ने इस बच्चे को गाड़ी चलाने की इजाज़त क्यों दी? हैरानी ये भी है कि बच्चे का बाप एक जज है, अगर जज साहब आपने बच्चे को नहीं सम्भाल सके तो वह लोगों की समस्याओं का निपटारा कैसे करेंगे? हमारे जमाने में भी बच्चे ग़लतियां करते थे, पर मां-बाप का कंट्रोल था। आज यह नियंत्रण ढीला पड़ चुका है और कई बार तो मां-बाप ही बच्चे को ही आक्रामक होना सिखाते हैं। मां-बाप भी ज़रूरत से अधिक उदार हो चुके हैं। पेरंटिंग एक बड़ी समस्या बन गई है। सोशल मीडिया के कारण समाज में बहुत उत्तेजना है, क्योंकि बहुत सही और ग़लत दिखाया जा रहा है। मनोवैज्ञानिक जोनाथन हैदित जिन्होंने ‘चिन्तित पीढ़ी’ पर किताब लिखी है, का कहना है, “जिस नज़रिए से युवा ज़िन्दगी का पहले अनुभव करते थे, स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया ने उस नजरिये को बदल दिया है, जो भी मिलता है उस पर तत्काल प्रतिक्रिया हो जाती है, अगर कोई गलती करता है तो उसे माफ नहीं किया जाता, क्योंकि इंटरनेट कभी नहीं भूलता”। सोशल मीडिया के द्वारा जो नफ़रत फैलाई जाती है वह स्थाई बन जाती है, क्योंकि उसे हटाया नहीं जा सकता।
सोशल मीडिया के साथ ही लोगों को लड़ाने में टीवी न्यूज़ का बहुत बड़ा योगदान है। किसी भी मुद्दे पर दोनों पक्षों को बुलाकर मुर्गों की तरह लड़ाया जाता है। दुनिया के प्रमुख चैनल विशेषज्ञों और प्रमुख लोगों को बुलाकर उनकी बात आराम से सुनते हैं पर हमारे यहां टीआरपी को बढ़ाने के लिए उत्तेजना फैलाई जाती है। एक चैनल तो अपनी स्क्रीन पर उठती लपटें दिखाता रहा है। ऐसे लोग नफ़रत बांट रहे हैं जिसके कारण समाज में भयंकर तनाव हो गए हैं। आज क्रोधित होना या किसी मामले को लेकर उत्तेजित होना सांस्कृतिक तौर पर स्वीकार किया जा रहा है। 500 साल पहले की औरंगजेब की कब्र को उखाड़ने का प्रयास किया गया। विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता आगे थे। क्या सोच है? देश के बाक़ी सब मसले हल हो गए कि आप गड़ी कब्रें उखाड़ना चाह रहे हो? सिनेमा भी आगे से अधिक हिंसक और आक्रामक हो गया है जिसका असर समाज पर हो रहा है। ‘धुरंधर’ जैसी फ़िल्में सुपरहिट हो रही हैं। अमिताभ बच्चन को ‘एंग्रीयंग मैन’ की भूमिका में सब से अधिक पसंद किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने शिकायत की है कि अब लड़कियां भी गाली देने लगी हैं। यह शिकायत बिल्कुल जायज़ है। राहुल गांधी का कहना था कि अगर लड़के गालियां दे सकते हैं तो लड़कियां क्यों नहीं ? यह फ़िज़ूल तर्क है।
मेरा मानना है किसी को भी गाली नहीं देनी चाहिए। हमारी लड़कियों और महिलाओं के अलग संस्कार रहे हैं। ज़रूरी नहीं कि उन्हें हर मामले में पुरुषों की बराबरी करनी है। अब तो फ़िल्मों में भी मां-बहन की गाली निकालना आम हो गया है। नो वन किल्ड जेसिका फ़िल्म में रानी मुखर्जी को बहन की गाली निकालते दिखाया गया है। क्या यह ज़रूरी था? गाली के बिना फ़िल्म नहीं बन सकती?
देश को क्रोधित बनाने में सबसे बड़ी भूमिका राजनीति की है। नेताओं के भाषण भड़काऊ हो गए हैं। आस्था के नाम पर लोगों में नफ़रत भरी जा रही है। ‘लव जेहाद’ जैसे शब्दों के द्वारा धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रयास किया जाता है। इससे लोगों में आपसी द्वेष बढ़ा है। धर्म और विचारधारा को लेकर मतभेद खुलेआम सड़क पर नज़र आते हैं। मिलजुलकर धार्मिक उत्सव मनाने की परंपरा अब धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है। गुजरात में इस बार मुसलमान लड़के-लड़कियों को नवरात्रि पर गरबा से दूर रखा गया। कहना था कि गरबा दुर्गा की पूजा है जिसमें मुसलमान नहीं आ सकते, पर कई दशकों से सभी समुदाय मिलकर यह खूबसूरत उत्सव मनाते रहे हैं। यह वीडियो भी है जिसमें वियतनाम के किसी हवाई अड्डे पर गुजरात से गए लोग हवाई जहाज़ के सामने हवाई पट्टी पर ही गरबा कर रहे हैं। क्या जहाज़ की पूजा हो रही थी? चीन की ग्रेट वॉल पर गरबा हो चुका है। राजनीति हमारे लोगों को बुरी तरह बांट रही है। बड़े-बड़े नेता अपने बोल पर नियंत्रण खो रहे हैं। ‘मोदी का बाप’, ‘दिमाग़ी नक्सल’,‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’,‘मौत का सौदागर’ जैसे कटाक्ष लोगों को अधिक लड़ाका बना रहे हैं। लोग अपने दैनिक जीवन और रोज़ के संघर्ष से परेशान हैं। बेरोज़गारी,प्रदूषण, भीड़भाड़, आर्थिक दबाव, दैनिक तनाव ने बहुत नाज़ुक स्थिति बना दी है, यहां बहुत कानून हैं, बहुत नियम हैं, बहुत टैक्स है, पर आम आदमी को मिलता क्या है? सड़कें टूटी हुईं हैं, ट्रैफिक पर कोई नियंत्रण नहीं है, किसी भी सरकारी दफ्तर में पैसे के बिना काम नहीं होता।
जवाबदेही नहीं रही। अदालतों पर कम होता विश्वास भी लोगों को क़ानून हाथ में लेने को प्रेरित कर रहा है। उत्तर प्रदेश के ‘बुलडोज़र जस्टिस’ और ‘एनकाउंटर’ की पालिसी के पीछे भी यह भावना है कि अदालतों पर बहुत विश्वास नहीं है। लोगों में नकारात्मक भावना बढ़ती जा रही है।
देश का तापमान कम करने की जरूरत है। बड़ी ज़िम्मेवारी बड़े लोगों पर है जो इस समय देश के सामने बहुत ग़लत मिशाल खड़ी कर रहे हैं, लक्ष्य प्राप्ति के लिए किसी भी साधन का उपयोग जायज़ है।
भारत एक क्रोधित राष्ट्र क्यों बन रहा है?
Summary :
घटना लखनऊ से है। पिछले सप्ताह एक ख़ाली जगह पर पार्किंग को लेकर झगड़ा हो गया। एक ने दूसरे को ईंट मारी तो दूसरे ने पिस्तौल निकाल कर दो गोली दाग दी, फिर पिस्तौल को रिलोड कर तीन और गोलियां चलाईं। तीन लोग मारे गए। हत्यारा मर्चेंट नेवी में अफ़सर है। इतनी सी बात पर तीन लोग अपनी जान गंवा बैठे। दु:ख है कि ऐसे मामले अक्सर सुनने को मिल रहे हैं जहां उत्तेजित होकर लोग मरने-मारने पर उतर आते हैं। देश की सड़कों पर रोज़ाना ऐसा हो रहा है जहां प्रतिक्रिया उत्तेजना से कहीं अधिक हो रही है, कहीं…


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