1984 का सिख कत्लेआम भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसे याद करते ही हजारों परिवारों के दर्द, बिछड़े हुए अपनों और इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटनाओं की तस्वीरें आंखों के सामने आ जाती हैं। इस नरसंहार में जहां देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेताओं और उनके समर्थकों पर हिंसा भड़काने तथा दंगाइयों को संरक्षण देने के गंभीर आरोप लगे, वहीं इस भयावह दौर में ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना सिख परिवारों की रक्षा की। स्वंय सेवकों की ऐसी ही भूमिका का जिक्र आज भी कई लोग अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर करते हैं। इसका एक जीवंत उदाहरण मैं स्वयं भी हूं। उस समय मेरी उम्र महज 12 वर्ष थी। तारीख थी 1 नवंबर 1984 हम गांधी नगर के चांद मोहल्ले में रहते थे। अचानक शोर-शराबे की आवाजें सुनाई देने लगीं। पता चला कि दंगाई स्थानीय गुरुद्वारे को लूटकर लौटे हैं और अब हमारी गली में रहने वाले सिख परिवारों को निशाना बना रहे हैं। गली में सिखों के कई घर थे और हालात तेजी से भयावह होते जा रहे थे, ऐसे समय में तेज प्रकाश छाबड़ा के नेतृत्व में आरएसएस के स्वयंसेवक मजबूती से दंगाइयों के सामने खड़े हो गए। उनके प्रतिरोध के बाद दंगाई वहां से लौट गए लेकिन उनकी भूमिका केवल उस दिन दंगाइयों को रोकने तक सीमित नहीं रही। अगले चार दिनों तक उन्होंने सिख परिवारों को अपने घरों में पनाह दी, उनकी सुरक्षा की और उन्हें हर संभव मदद पहुंचाई। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस होता है कि यदि उस समय स्वयंसेवक हमारे साथ खड़े नहीं होते तो शायद हमारा परिवार भी आज इस दुनिया में नहीं होता। यह मेरे लिए कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि मेरे बचपन की आंखों से देखा हुआ सच और जीवनभर न भूलने वाला एहसान है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसे आज तक सिख समुदाय के ज्यादातर लोग अपना दुश्मन मानते हैं, उन पर सिख इतिहास से छेड़छाड़ के बेबुनियाद आरोप लगाते हैं उसी के स्वयंसेवकों ने दिल्ली सहित देश के दूसरे शहरों में भीे सिखो को बचाने, उन्हें आश्रय देने और उनकी मदद करने का काम किया। हां हो सकता है कि किसी जगह कोई स्वयंसेवक दंगाइयों का साथ देखा दिख गया हो लेकिन किसी एक व्यक्ति या घटना के आधार पर पूरे संगठन और उन हजारों स्वयंसेवकों की सेवाओं को खारिज नहीं किया जा सकता, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर निर्दोष सिखों की रक्षा की। इतिहास का मूल्यांकन तथ्यों से होना चाहिए, राजनीतिक सुविधा के हिसाब से नहीं।
42 वर्ष बाद भी 1984 के पीड़ित परिवारों के घाव भरे नहीं हैं। ऐसे समय में कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी द्वारा 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली आयोजित करने का निर्णय स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आया। आखिर जिस तारीख को हजारों सिख परिवार अपने प्रियजनों को खोने का दर्द याद करते हैं, उसी दिन राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की क्या आवश्यकता थी? क्या कांग्रेस नेतृत्व के पास इस आयोजन के लिए कोई दूसरी तारीख नहीं थी? जब तक पीड़ितों के मन में न्याय और जवाबदेही को लेकर सवाल कायम हैं, तब तक इस तारीख के चयन पर सवाल उठना बिल्कुल जायज है। जहां एक ओर राहुल गांधी रैली कर रहे थे, वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के साथ भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से लेकर अन्य कार्यकर्ता सिख समाज के साथ मिलकर पश्चिमी दिल्ली में शहीदों को श्रद्धांजलि देते दिखाए दिए।
गुरविन्दर सिंह बावा की सेवाओं को नया अवसर
तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब, नांदेड़ का प्रबन्ध सिख संगतों द्वारा चयनित बोर्ड के हवाले करने वाले फैसले ने न केवल सिख प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को दोबारा अवसर दिया है, बल्कि उन लोगों के लिए भी सेवा का नया रास्ता खोला है, जो लंबे समय से गुरु घर और संगत की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सरदार गुरविन्दर सिंह बावा की भूमिका और उनकी सेवाओं को विशेष रूप से देखा जाना चाहिए। गुरुद्वारा बोर्ड में उपाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे गुरविन्दर सिंह बावा को तत्कालीन अध्यक्ष सरदार भूपिन्दर सिंह मिन्हास के निधन के बाद प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। यह जिम्मेदारी केवल पद की नहीं, बल्कि तख्त साहिब की गौरवशाली परंपराओं, संगत की अपेक्षाओं और संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने की भी है। उनके साथ महासचिव सरदार रविन्दर सिंह बुंगई सहित अनुभवी सदस्यों की टीम मौजूद हैं ऐसे में उम्मीद की जाती है कि सामूहिक नेतृत्व अपने अनुभव के साथ प्रबन्ध को पारदर्शिता से उंचाइयों पर ले जाएगा।
बोर्ड की बहाली के बाद जिस तरह लगभग 20 से 25 करोड़ रुपये तक की विभिन्न सेवाओं और विकास कार्यों की घोषणा की गई है, वह इस बात का संकेत है कि प्रबंधन अपनी जिम्मेदारियों को केवल प्रशासनिक दायरे तक सीमित नहीं रखना चाहता। कर्मचारियों के लिए 50 प्रतिशत त्याैहार बोनस की घोषणा और बोर्ड के अनुबंधित कर्मचारियों, को दिवाली पर एक हजार रुपये की गैर-वापसी योग्य आर्थिक सौगात देना सराहनीय पहल है। गुरु घर की सेवा करने वाले कर्मचारियों का सम्मान और उनके परिवारों की खुशियों का ध्यान रखना भी सेवा भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन घोषणाओं में सबसे महत्वपूर्ण पहल स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर है। लगभग 15 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक चिकित्सा जांच सुविधाएं स्थापित करने की योजना, जिसमें एमआरआई, सीटी स्कैन, एक्स-रे, रक्त जांच और सोनोग्राफी जैसी सुविधाएं शामिल हैं, आम जनता के लिए बड़ी राहत बन सकती है। आज जब निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों में चिकित्सा जांच आम परिवारों के लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही है, तब गुरुद्वारा प्रबंधन की ऐसी पहल गुरु नानक देव जी के सरबत के भले के सिद्धांत को व्यवहार में उतारने का माध्यम बन सकती है। इसी प्रकार बावा जी के धर्म में भाई हैदराबाद निवासी सुरिन्दर सिंह सलूजा द्वारा 5 करोड़ की लागत से सोलर प्लांट लगाया जाएगा जिससे बिजली बिल बचत हो सके। गुरविन्दर सिंह बावा और उनकी टीम के सामने अवसर भी बड़ा है और जिम्मेदारी भी।
संघ स्वयंसेवक बने थे सिखों के मददगार
Summary :
1984 का सिख कत्लेआम भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसे याद करते ही हजारों परिवारों के दर्द, बिछड़े हुए अपनों और इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटनाओं की तस्वीरें आंखों के सामने आ जाती हैं। इस नरसंहार में जहां देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेताओं और उनके समर्थकों पर हिंसा भड़काने तथा दंगाइयों को संरक्षण देने के गंभीर आरोप लगे, वहीं इस भयावह दौर में ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना सिख परिवारों की रक्षा की। स्वंय सेवकों की ऐसी ही भूमिका का जिक्र आज भी कई लोग अपने व्यक्तिगत अनुभवों…


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