बचपन की दीपावली और ‘ख्याली राम’

Summary :

भारतीय संस्कृति में जितने भी हिन्दू तीज-त्यौहार व पर्व मनाये जाते हैं उनमें दीपावली का उत्सव सर्वाधिक गरीबोन्मुख व समाजवादी पुट लिये हुए है। बेशक कुछ लोग इसे अमीरों का पर्व कह सकते हैं परन्तु इसके मूल में गरीब से गरीब के घर में भी रोशनी का दीया जलाने का है। गरीब के घर में रोशनी करके ही समाज को प्रकाश की तरफ ले जाया जा सकता है। प्रकाश का मतलब सिर्फ रोशनी से ही नहीं है बल्कि इसका मूल अर्थ प्रसन्नता से है और प्रसन्नता तभी आती है जब भौतिक रूप से व्यक्ति का जीवन सुख सुविधाओं से सम्पन्न…

भारतीय संस्कृति में जितने भी हिन्दू तीज-त्यौहार व पर्व मनाये जाते हैं उनमें दीपावली का उत्सव सर्वाधिक गरीबोन्मुख व समाजवादी पुट लिये हुए है। बेशक कुछ लोग इसे अमीरों का पर्व कह सकते हैं परन्तु इसके मूल में गरीब से गरीब के घर में भी रोशनी का दीया जलाने का है। गरीब के घर में रोशनी करके ही समाज को प्रकाश की तरफ ले जाया जा सकता है। प्रकाश का मतलब सिर्फ रोशनी से ही नहीं है बल्कि इसका मूल अर्थ प्रसन्नता से है और प्रसन्नता तभी आती है जब भौतिक रूप से व्यक्ति का जीवन सुख सुविधाओं से सम्पन्न होता है और कर्महीन व्यक्ति कभी ये सुख–सुविधाएं नहीं जुटा सकता। इसीलिए दीपावली पर पूजा के समय जो कहानी सुनाई जाती है उसमें एक गरीब व्यक्ति की कथा होती है जिसकी सन्तान कर्महीन व आलसी होती है।
एक पुत्र का विवाह होने पर जब गरीब व्यक्ति की पुत्रवधू घर के प्रत्येक सदस्य को कर्मशील होने के लिए प्रेरित करती है तो दैवीय चमत्कार से उसकी गरीबी दूर हो जाती है। बेशक इस पूरी कहानी को धार्मिक रंग दे दिया गया है और देवी लक्ष्मी की कृपा से जोड़ दिया गया है मगर इसके मूल में व्यक्ति की कर्मशीलता ही है। कर्मशीलता से व्यक्ति अपनी गरीबी को दूर करने की क्षमता रखता है बशर्तें कि उसके परिवार में सद्बुद्धि बनी रहे। इसका वर्णन गोस्वामी तुलसी दास ने भी श्री राम चरितमानस में किया है।
जहां सुमति वहां सम्पत्ति नाना
जहां कुमति वहां विपत्ति विधाना
दीपावली त्यौहार मनाने की मुझे अपने बचपन की यादें अभी तक ताजा हैं। मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के कस्बे नजीबाबाद के जिस मुहल्ले में हुआ था उसमें नगर के एक बड़े सेठ रंधर जी का परिवार भी रहता था। वह स्वतन्त्रता सेनानियों का कांग्रेसी परिवार था। उस परिवार के सभी युवा खादी या खद्दर के कपड़े सेठ होने के बावजूद पहनते थे। अतः उनके घर को बोलचाल में खद्दर जी का घर भी कहा जाता था। दीपावली का पर्व आने पर उनके घर में भारी रौनक रहती थी और लोगों का आना-जाना लगा रहता था। उनके परिवार के कुछ लोग ऊंची सरकारी नौकरियों में भी थे। दिवाली की छुट्टी पर सभी सदस्य नजीबाबाद आते थे और परिवार के मुखिया महाशय बालमुकुन्द रंधर का सानिध्य प्राप्त करते थे। महाशय जी मोहल्ले की गरीब घरों के लोगों में खास तौर पर अच्छी खासी मिठाई बंटवाते थे वैसे कस्बे में और भी बड़े-बड़े जमींदार व सेठ थे।
एक जैन बिरादरी के जमींदार साहब तो स्वयं मिठाई बांटने अपने मिलने–चिलने वाले गरीबों के घरों तक अपनी सवारी में बैठ कर जाते थे और मिठाई की भेंट देते थे। मगर मेरे मुहल्ले के सेठ महाशय रंधर जी यह ध्यान रखते थे कि किसी गरीब का घर मिठाई प्राप्त करने से वंचित न रहे। एक सेठ जी और थे जो उस दिन सभी हिन्दू–मुसलमान रिक्शावालों को मिठाई खुले हाथ से बांटते थे। रंधर जी का कत्था उत्पादन और अनाज का थोक व्यापार था। शहर के बाजार कल्लूगंज में उनकी बहुत बड़ी दुकान थी। दीपावली पर सभी मजदूर व कर्मचारियों को मुक्त हस्त से मिठाई व नकद ईनाम बांटा जाता था। उनके घर से गरीब लोगों को गर्म कपड़े भी दिये जाते थे। मगर दीपावली का एक दूसरा पहलू भी था कि दिवाली से पहले दशहरे का त्यौहार गुजर चुका होता था। उसमें रामलीला का जोर रहता था।
50 के दशक तक टेलीविजन नाम मात्र को ही था। अतः दशहरे पर रामलीला के पात्रों के बारे में बच्चों की उत्सुकता बनी रहती थी और जब अगले दिन वे उन पात्रों को उनकी साधारण वेशभूषा में देखते थे तो उन्हें रामलीला के पात्रों के नाम से पुकार कर मुहल्ले के सारे बच्चों को इकट्ठा कर लेते थे। एेसा ही एक पात्र ख्याली राम था। वह शहर के एक जैन साहू साहब के बाग में माली की नौकरी करता था। रामलीला में वह जोकर की भूमिका निभाता था। रामलीला के मंच पर उसके अजीब वेषभूषा में पहुंचते ही दर्शकों में बैठे बच्चे तालियां बजाने लगते थे। अगले दिन जब वह शहर में कहीं जा रहा होता था तो जिस भी मुहल्ले से वह गुजरता था उसी में बच्चे इकट्ठे होकर उसके पीछे-पीछे जुलूस बना कर ख्याली–ख्याली कहते हुए उससे रामलीला में निभायी गई भूमिका को दोहराने की मांग करते थे। इस प्रकार ख्याली बच्चों में बहुत लोकप्रिय था। परन्तु वह गरीब आदमी था एेसा उसके वस्त्रों को देखकर बच्चे भी अन्दाजा लगा सकते थे।
दीपावली के दिनों में जब वह किसी मुहल्ले में जाता तो बच्चे अपने घरों में जिद करके अपनी माताओं से उसके लिए मिठाई मांग कर लाते और उसे देते। वह प्रसन्न होकर मां-बाप को दुआ देता। हद तो यह थी कि मुहल्ले का गरीब से गरीब बच्चा भी अपने घर से मिठाई का कोई अदद लेकर आता और उससे दुआएं पाता। इसी प्रकार का दूसरा पात्र हद्दू था। वह खत्री परिवार से था और उसके पुरखे पंजाब से 1736 के करीब जब रुहेला सरदार नवाब नजीबुद्दौला ने नजीबाबाद बसाया तो यहां आये। ये लोग कांसे के बर्तन बनाने में माहिर थे। उसका पूरा परिवार यही काम करता था। मगर हद्दू मस्त- मलंग था और उसका मन खानदानी पेशे में नहीं लगा। कद-काठी में वह बहुत बलिष्ठ था। प्रायः वह सड़कों पर व्यर्थ में ही घूमता हुआ देखा जा सकता था। बच्चे व बुजुर्ग तक उससे मजाक किया करते थे।
दशहरे पर जब अखाड़े निकलते थे तो हद्दू उनमें अपनी कांसे की थाली लेकर बैठ जाता और लकड़ी के डंडों से सस्वर उन्हें बजाता। बस यही कला उसको आती थी और लोग भी उसकी इसी कला के दीवाने थे। दीपावली पर वह मुहल्ले-मुहल्ले जाता और आवाज लगाता कि दिवाली की बहार है और लोग उसे मिठाई व कपड़ों की भेंट देते। दिवाली के दिन जब रात को किसी के घर के आगे रखे दीयों में तेल कम होने लगता या वे बुझने लगते तो हद्दू घर की सांकल बजाकर घर वालों को सचेत करता चलता। दीपावली का यह समाजवादी स्वरूप आज भी मेरे दिलो- दिमाग पर छाया रहता है और वर्तमान में शहरों की चकाचौंध भरी दीपावली की रोशनी में भी वह चमक मस्तिष्क में नहीं कौंधती जो बचपन की याद आते ही कौंधने लगती है। महानगरों ने तेल के दीपकों की जगह बिजली की लड़ियों ने ले ली है और गरीबों के घर मिठाई भिजवाने का स्थान पटाखेबाजी में लाखों रुपये फूंकने ने ले लिया है। औसतन जितना खर्च एक आम रईस या खाता–पीता परिवार पटाखेबाजी पर खर्च करता है उतने धन से वह कई गरीबों के घरों में दीपावली मनवा सकता है।
दीपावली का असली सन्देश यही था जो हमारे बुजुर्ग हमंे देकर गये और समझा कर गये कि यह पर्व वास्तविक अर्थों में समाजवादी पर्व है क्योंकि दीपावली पर गरीब से गरीब के घर में भी खुशियां बांटना लक्ष्मी देवी को प्रसन्न बनाये रखने के लिए जरूरी है। यह उसी समाज को कुछ वापस करने का भी पर्व है जिसके सहारे हम साल भर कमाई करते हैं। दीपावली पर छोटे शहरों में आज भी मुस्लिम जान-पहचान वालों को भी बराबर मिठाई बांटने का चलन जारी है अतः इससे बड़ा समाजवादी पर्व भी क्या कोई दूसरा हो सकता है। समाजवादी चिन्तक डा. राम मनोहर लोहिया ने इस पर्व के बारे में लिखते हुए भारतीय समाज की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लोक पक्ष का बखूबी वर्णन भी किया है।

Team Desk