हिंदू-सिखों को भिड़ाने की नापाक कोशिश?

Summary :

उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में बीते दिनों दो व्यक्तियों के बीच हुए झगड़े को जिस प्रकार से दो समुदायों में टकराव बनाकर सोशल मीडिया पर पेश किया गया जा रहा है उससे साफ जाहिर होता है कि इसके पीछे बहुत बड़ी साजिश काम कर रही है जो लोग नहीं चाहते कि हिन्दू-सिख एकता कायम रहे। उन्हीं के द्वारा ही मामले को बिना वजह तूल दिया जा रहा है। असल में दोनों ही समुदायों के जो कट्टरपंथी हैं वह इसका फायदा लेकर दोनों समुदायों को आपस में भिड़ाने की फिराक में हैं। अब इनके पीछे कौन सी एजेन्सियां कार्यरत हैं यह भी…

उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में बीते दिनों दो व्यक्तियों के बीच हुए झगड़े को जिस प्रकार से दो समुदायों में टकराव बनाकर सोशल मीडिया पर पेश किया गया जा रहा है उससे साफ जाहिर होता है कि इसके पीछे बहुत बड़ी साजिश काम कर रही है जो लोग नहीं चाहते कि हिन्दू-सिख एकता कायम रहे। उन्हीं के द्वारा ही मामले को बिना वजह तूल दिया जा रहा है। असल में दोनों ही समुदायों के जो कट्टरपंथी हैं वह इसका फायदा लेकर दोनों समुदायों को आपस में भिड़ाने की फिराक में हैं। अब इनके पीछे कौन सी एजेन्सियां कार्यरत हैं यह भी जांच का विषय है। ऐसा नहीं है कि यह कोई पहली बार हेमकुण्ड साहिब के दर्शनों के लिए जा रहे थे, वर्षों से लाखों सिख हर साल हेमकुण्ड साहिब दर्शनों के लिए जाते हैं मगर कभी किसी को स्थानीय लोगों द्वारा किसी तरह का नुक्सान नहीं पहुंचाया, फिर इस बार ही यह मामला क्यों सुर्खियों में बना। जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है उसमें साफ देखा जा सकता है कि कुछ लोग पूरी प्लानिंग के साथ पहले से ही हाथ में डंडे आदि लिए झगड़े की तैयारी किए बैठे थे जिनके द्वारा इस घटना को अंजाम दिया गया और दूसरी ओर निहंग सिखों के द्वारा अपने बचाव में कृपाण से वार किए जिसमें उन लोगों को नुक्सान हुआ। अब यह प्रशासन की जिम्मेवारी बनती थी कि सारी घटना की गंभीरता से जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करता, मगर उनके द्वारा एकतरफा कार्रवाई करते हुए निहंग सिखों को ना सिर्फ बेरहमी से पीटा, बल्कि उन्हें बिना दस्तार के कोर्ट में पेश किया जिससे सिख समुदाय का गुस्सा फूटना स्वभाविक था क्योंकि यह सिख मर्यादा के विपरीत है। अब जब प्रशासन के उच्च अधिकारियों, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी प्रधान हरमीत सिंह कालका, महासचिव जगदीप सिंह काहलो सहित अन्य सिख जत्थेबंदियों ने संपर्क किया तो उन्होंने बिना किसी भेदभाव के दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन भी दिया पर कुछ लोग इसके खिलाफ जाकर भी स्थानीय लोगों को भड़काकर विवाद को बढ़ावा देते दिख रहे हैं जिनसे बचने की आवश्यकता है।
ऐसे समय में समाज के बुद्धिजीवियों, धार्मिक नेताओं और सामाजिक संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी क्षेत्र में तनाव की स्थिति बनती है तो सबसे पहले संवाद स्थापित होना चाहिए। धार्मिक मंचों से शांति, संयम और कानून के पालन का संदेश दिया जाना चाहिए। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन सामाजिक सौहार्द उनसे ऊपर होना चाहिए। किसी भी विवाद को हिंदू बनाम सिख का स्वरूप देना दोनों समुदायों के हित में नहीं है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था भी बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं पर निर्भर करती है। इसी संदर्भ में सिख ब्रदरहुड इंटरनेशनल के प्रमुख अमनजीत सिंह बक्शी ने उत्तराखंड प्रशासन से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने, अफवाह फैलाने या हिंसा भड़काने का प्रयास कर रहा है तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों समुदायों के जिम्मेदार और सम्मानित लोग आगे आकर संवाद स्थापित करें तथा लोगों को उकसावे में आने से रोकें। साथ ही स्थानीय लोगों से भी उन्होंने आग्रह किया कि वे अफवाहों से दूर रहें और सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में प्रशासन का सहयोग करें। भारत की शक्ति उसकी एकता में है।
पंजाब और पंजाबी समाज को लेकर भाजपा की रणनीति में बदलाव : भारतीय जनता पार्टी लंबे समय तक पंजाब और दिल्ली की पंजाबी राजनीति में अपेक्षित प्रभाव नहीं बना सकी। विशेष रूप से दिल्ली में एक समय ऐसा भी था जब पार्टी के भीतर यह धारणा बन गई थी कि पंजाबी समाज को संगठन और नेतृत्व में पहले जैसी प्राथमिकता नहीं मिल रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना रहा कि इसका असर चुनावी परिणामों पर भी पड़ा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के कदमों को देखें तो यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि पार्टी ने इस समीकरण पर गंभीरता से काम करना शुरू किया है। दिल्ली भाजपा की कमान जब वीरेंद्र सचदेवा को सौंपी गई, तब इसे केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा गया। दिल्ली में पंजाबी और सिख मतदाता लंबे समय से भाजपा के पारंपरिक समर्थक रहे हैं। ऐसे में संगठन के शीर्ष पर एक पंजाबी चेहरे को लाना पार्टी की उस रणनीति का हिस्सा माना गया, जिसके जरिए वह अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करना चाहती थी। इसके बाद दिल्ली में भाजपा की चुनावी सफलता ने इस रणनीति को और मजबूती दी। चुनावों के बाद वीरेन्द्र सचदेवा के स्थान पर हर्ष मल्होत्रा को लाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
अब भाजपा की निगाह वर्ष 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव पर है। पार्टी भले अभी पंजाब में सत्ता से दूर हो, लेकिन उसके कदम यह संकेत देते हैं कि वह भविष्य की तैयारी अभी से कर रही है। इसी क्रम में भाजपा के वरिष्ठ नेता तरुण चुघ को राज्यसभा भेजा जाना, पंजाब भाजपा की कमान केवल सिंह ढिल्लों को सौंपना और दिल्ली के उपराज्यपाल के रूप में एक पंजाबी चेहरे की नियुक्ति जैसे निर्णयों को व्यापक राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। इन नियुक्तियों के माध्यम से पार्टी यह संदेश देने की कोशिश करती दिखाई देती है कि पंजाब और पंजाबी समाज उसकी प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
श्री अकाल तख्त की निष्पक्षता पर उठते सवाल : श्री अकाल तख्त साहिब सिख पंथ की सर्वाेच्च धार्मिक संस्था है। यही कारण है कि यहां से लिया गया हर निर्णय केवल एक व्यक्ति या सरकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी सिख कौम के विश्वास, मर्यादा और एकता से जुड़ जाता है। इसलिए श्री अकाल तख्त के प्रत्येक कदम में निष्पक्षता केवल अपेक्षित नहीं, बल्कि अनिवार्य है। हाल ही में पंजाब सरकार द्वारा बनाए गए बेअदबी कानून में आपत्तियों को दूर करने के लिए श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ने सरकार को एक महीने का समय दिया। इससे पहले मुख्यमंत्री भगवंत मान को तलब किया गया और बाद में सिख विधायकों को बुलाकर कानून में आवश्यक संशोधन करने के निर्देश दिए गए। बेअदबी जैसे गंभीर विषय पर धार्मिक नेतृत्व की चिंता स्वाभाविक है और यदि कानून में कमियां हैं तो उन्हें दूर किया जाना भी आवश्यक है। लेकिन इसी के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा होता है, क्या श्री अकाल तख्त का रवैया हर मामले में समान रहा है? जब सुखबीर सिंह बादल के विरुद्ध धार्मिक कार्रवाई हुई, तब सार्वजनिक मंच पर दिखाई गई भाषा और व्यवहार तथा वर्तमान घटनाक्रम में अपनाए गए रुख की तुलना आज व्यापक चर्चा का विषय है। अनेक लोगों का मानना है कि दोनों परिस्थितियों में सार्वजनिक संदेश अलग-अलग दिखाई दिया। यदि ऐसा महसूस होता है, तो यह स्वयं श्री अकाल तख्त की छवि के लिए चिंता का विषय है। इसी प्रकार मुख्यमंत्री भगवंत मान के विरुद्ध धार्मिक निर्णय के बाद संबंधित सूचना और पोस्टर सभी गुरुद्वारों में लगाने के निर्देश भी चर्चा का विषय बने। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या अतीत के अन्य मामलों में भी समान प्रक्रिया अपनाई गई थी? यदि नहीं, तो इस अंतर का कारण क्या था? धार्मिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उनके निर्णय और प्रक्रियाएं सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होती दिखाई दें। सिख इतिहास हमें सिखाता है कि श्री अकाल तख्त किसी दल, सरकार या परिवार का नहीं, बल्कि पूरी सिख कौम का है।

Team Desk